सुठेली गाँव में चूल्हा नहीं जलता था किसी की मृत्यु होने पर!

लेखक डॉ बालाराम परमार
मेरा जन्म 1960 में हुआ। मैं जब 14 वर्ष का था तब आगर मालवा पढ़ने चला गया था। मैंने 15 वर्ष की आयु में पाँचवी पास की थी। बीच में 3 वर्ष मेरी पढ़ाई छूट गई थी, और मेरे साथी आठवीं कक्षा में पहुंच गए थे।जब मैं अगस्त 1974 में आगर में पाँचवी की पढ़ाई के लिए गया था, उसी वर्ष मेरे बड़े भाई साहब सेवाराम जी सुठेली गाॅंव छोड़कर धुरासिया गाँव उनके ससुराल रहने के लिए चले गए थे। मैं पाँचवी पास करने के बाद धुरासिया ही अपने भाई के साथ रहने के लिए चला गया था। वहीं से आगे की पढ़ाई के लिए बुआ के गाँव लिम्बादित, पोस्ट कपेली, तहसील तराना चला गया था और मेरी बड़ी बुआजी के बड़े बेटे अमरजी मालवीय ने मुझे तराना छात्रवास में भर्ती करवा दिया था।
मैंने 6वीं से 11वीं तक की पढ़ाई तराना में की है।पर मेरा मन, मेरी स्मृति, मेरा सौहार्दपूर्ण भाव आज भी सुठेली के उन 15 वर्षों में ही अटका हुआ है। उन 15 वर्षों में मैंने अपने गाँव में चार-पाँच मृत्यु देखी थी। और उन्हीं चार-पाँच मृत्युओं ने मुझे सिखाया कि गाँव किसे कहते हैं।
पहली मृत्यु मेरे घर निवास करने वाली, दूर के रिश्ते में मेती माँ की देखी थी। उनका संबंध गाँव थड़ोदा में था। वे पन्नालाल मालवीय के रिश्ते में कुछ लगतीं थीं । पन्नालाल पूर्व विधायक श्री लालजीराम मालवीय के पिताजी थे। दूसरी मृत्यु मेरे ताऊजी भेरा बा की देखी थी। मैं 6-7 साल का था जब उनकी मृत्यु हुई थी। उनकी उम्र 65-70 साल रही होगी। पिताजी ने मेरे द्वारा ही उनका दाह संस्कार और 13वीं पिंडदान संपन्न करवाया था।तीसरी मृत्यु मैंने मूलचंद दादा के पुत्र शंकर की देखी थी। शंकर कोई 3 से 4 साल का रहा होगा। उसके दहा संस्कार के समय मेरा छोटा भाई मदन जो लगभग डेढ़ साल का रहा होगा। शव यात्रा के पीछे-पीछे श्मशान तक आ गया था। जिसको गांव के बड़े बुजुर्गों ने पूर्व जन्म की दोस्ती बताया था।
चौथी मृत्यु मैंने छित्तु दादा की देखी थी। उनकी मृत्यु नारायण सिंह जी तनोडिया के खेत पर स्थित कुण्डी में डूब कर हुईं थीं। तीन साल बाद उनके परिवार वालों ने हत्या का आरोप गाँव के चार-पाँच लोगों पर लगाया गया था, जिसमें मेरे बड़े भाई साहब सेवाराम जी का भी नाम शामिल था।और पाँचवी मृत्यु पिताजी की देखी थी। उनकी हत्या माघ मास कृष्ण पक्ष विक्रम संवत 2030 दिनांक 15-1-1974 मंगलवार की रात के दरम्यान हुई थी। तब मेरा छोटा भाई मात्र 2-3 साल का था।
इन पाँचों मृत्युओं में एक बात समान थी, जो आज मुझे कहीं नहीं देखाई देती है। मैंने देखा था कि इन मृत्यु के वक्त जब तक शव को श्मशान घाट ले जाकर दाग(चिता को मुखाग्नि) नहीं देते थे, तब तक गाँव में किसी भी जाति – बिरादरी के घर चूल्हा नहीं जलता था। एक और 60 के दशक में जो सुठेली गांव में देखने को मिलती थी । वह यह थी कि गांव के लोग ही लकड़ी इकट्ठी करके शमशान घाट पहुंचा देते थे। ऐसा करने को कोई सरपंच या पटेल आदेश नहीं देता था। बस जैसे ही खबर फैलती कि फलाने के यहाँ,फलाने की मृत्यु हो गई, हर घर की औरत अपने चूल्हे की लकड़ी बाहर निकाल देती थी और यदि चूल्हा नहीं जला है तो उसे वैसा ही रहने देते थे।
उस जमाने में तीसरा अर्थात सारी सोरना तथा तेरहवीं पालने का चलन था। मृत्यु वाले घर सादा भोजन अर्थात तेरह दिन तक तेल- घी का प्रयोग नहीं होता था। उस दिन मृतक के घर कोई अलग रसोई नहीं बनती थी, गाँव के लोग बिना घी- तेल का भोजन बनाकर खिलाते थे। दाह-संस्कार के बाद लोग अपने-अपने घर भोजन कर खेतों में चले जाते थे। आसपास के गांव के लोग भी दहासंस्कार में आते थे। जिन्हें मालवा में काकड़िया भाई कहते हैं।
उस समय हमारे गाँव में तीन ही समाज के परिवार थे। ब्राह्मण परिवार तथा मोची का परिवार । बाकी पूरा गाँव मेरे ही समाज का था। बाद में मोची परिवार गाँव छोड़कर पीपलोन चला गया था। गिनती में हम अलग-अलग समाज के थे, पर दुःख -सुख में सब एक थे। एक साथ खड़े होते थे। ब्राह्मण परिवार सबसे पहले उपस्थित होता था। महिला के शव के साथ गांव के लोग कांचली- कपड़ा चढ़ाते थे। मेरे पिताजी की मृत्यु 15 जनवरी 1974 की रात हुई। मंगलवार का दिन था। मुझे आज भी याद है कि उस दिन शाम तक गांव में किसी भी घर चूल्हा नहीं जला था। दोपहर बाद जब पार्थिव शरीर को बैलगाड़ी से आगर पोस्टमार्टम के लिए रवाना हो गया था तब गांव के घरों में चूल्हा जला था। जब मेरे ताऊजी भेरा बा की मृत्यु हुई थी तब मैं 6-7 साल का था । तब भी मैंने देखा था कि दहासंस्कार तक गांव में किसी के घर चूल्हा नहीं जला था। उस जमाने में गाँव में किसी की मृत्यु के समय ऐसी ही श्रद्धा, सहयोग और एकता दिखाई देती थी। यही एकता, श्रध्दा और सहयोग का भाव ही सुठेली का ताना-बाना था। समरसता का भाव था। अपार स्नेह ,मोहब्बत, भाईचारा और भाव-प्रेम था मेरे गाँव में।
आज जब देखता हूँ कि किसी के घर स्नेहजन की मृत्यु होती है तो उन्हीं के घर दाल-बाटी या साग-पुड़ी बनती है। शव यात्रा में उपस्थित सभी लोगों को भोजन करने का आग्रह किया जाता है। मृत्यु के दिन को भी उत्सव जैसा बना दिया गया है।जबकि 60-70 के दशक में 13 दिन तक तेल का उपयोग नहीं होता था। घर में तेल-घी का बना खाना नहीं खाया जाता था। जो व्यक्ति दहसंस्कार की प्रक्रिया पूरी करता था वह 13 वें दिन स्नान कर पींड करता था। सभी गौत्र जन 13 दिन तक तेल-घी का त्याग करते थे। उस समय का शोक-संवेदना दिखावा नहीं नहीं होती थीं। संवेदनशीलता पूरे गाँव में दिखाईं देती थी। मोहल्ले या गांव में कोई तेल की कढ़ाई नहीं चढ़ाता था। एक दो सप्ताह कोई उत्सव नहीं होता था। ताकि शोकाकुल वाले घर को बुरा न लगे।
यही सुठेली का सौहार्द था। यही वह संस्कार था जो मैं सुठेली से लेकर आगर, धुरासिया, लिम्बादित, तराना, भोपाल, खरगोन,पोर्ट ब्लेयर, बेंगलुरु, सिलचर, गांधीनगर, पुणे और उधमपुर तक तक ले कर घुम रहा हूं।आज मेरे पास माता -पिता और गुरूओं की कृपा से सब कुछ है। डिग्रियाँ हैं, मेरे बच्चे विदेश में वैज्ञानिक हैं, पर जो पाठ मैंने सुठेली में सीखा कि किसी की मृत्यु पर दाह-संस्कार तक चूल्हा नहीं जलाना चाहिए। यह पाठ मुझे किसी, विद्यालय -विश्वविद्यालय ने नहीं सिखाया। जन्मस्थली गांव सुठेली की संस्कार परंपरा और सामाजिक रीति-रिवाजों ने सिखाया।आजकल किसी की मृत्यु पर शोक संवेदना मात्र औपचारिकता रह गई है। यह देखकर के मन में आता है कि क्यों हमारा समाज असंवेदनशील होता जा रहा है?वक्त के साथ समाज बदला, विचार बदले। यहां तक तो समझ में आता है, लेकिन किसी की मृत्यु के समय संवेदना भी बदल जाए , यह एक विचारणीय प्रश्न है।