आधुनिक तकनीक का हिन्दी साहित्य को योगदान।

भाषा ही हमारी पहचान है हमक्या सोचते हैं, हम क्या महसूस करते हैं, हमारा दुख-सुख सब हमारी भाषा में ही तो बाहर आता है। और हम सबके लिए वो भाषा हिन्दी है। हिन्दी सिर्फ बोलने का तरीका नहीं है, ये हमारी संस्कृति है, हमारे घर के संस्कार हैं, हमारी मिट्टी की खुशबू है।पहले का जमाना देखिए, दादी-नानी रात में कहानियाँ सुनाती थीं, फिर धीरे-धीरे किताबें आईं, लाइब्रेरी बनी। और आज का जमाना देखिए, हर बच्चे-बूढ़े के हाथ में मोबाइल है। हम सुबह उठते ही फोन देखते हैं, दिन भर व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब पर रहते हैं। आभासी दुनिया में जी रहे हैं। पर एक बात आज भी नहीं बदली, हम बात आज भी हिन्दी में ही करना चाहते हैं। दिल की बात हिन्दी में ही निकलती है। तो इस हिन्दी पखवाड़े में यही सोचना है कि इस नई तकनीक ने हमारी हिन्दी और हिन्दी साहित्य के लिए क्या किया है।
मुझे लगता है कि तकनीक ने हिन्दी भाषा को बहुत बड़ी सहायता दी है। कहीं ना कहीं एक बात सत्य है उसे झूठलाया नहीं जा सकता, टेक्नोलॉजी ने हिन्दी को किताबों की अलमारी से निकाल कर हर हाथ में पहुँचा दिया है।
*1. हिन्दी लिखना अब सबसे आसान हो गया – यूनिकोड की क्रांति आज से 15-20 साल पहले कंप्यूटर पर हिन्दी लिखना एक सिरदर्द था। अलग-अलग फॉन्ट, आधे अक्षर टूट जाते थे। मेरे पिताजी बताते थे कि एक पेज हिन्दी में टाइप करने में पूरा दिन लग जाता था।फिर यूनिकोड आया और सब बदल गया। आज फोन पर आप बोलिए तो हिन्दी अपने आप लिख जाती है। आप अंग्रेजी में ‘krishna’ लिखो तो वो ‘कृष्ण’ बन जाता है। गूगल इंडिक कीबोर्ड, स्वरचक्र जैसे की-बोर्ड ने तो कमाल ही कर दिया। अब अनपढ़ से अनपढ़ आदमी भी अपनी भाषा में लिख सकता है। इससे क्या हुआ? पहले लेखक सिर्फ वही बनता था जिसकी पहुँच बड़े प्रकाशकों तक थी। अब गाँव में बैठा एक किसान, एक गृहिणी, एक छात्र सब लेखक बन गए हैं। वे अपनी कविता, अपनी कहानी सीधे फेसबुक पर डाल देते हैं और हजारों लोग उसे पढ़ लेते हैं। तकनीक ने साहित्य को कुछ खास लोगों से निकाल कर आम लोगों का बना दिया है। ये लोकतंत्र है असली।
*2. हर किसी को अपना मंच मिल गया * पहले एक कविता या कहानी छपवाने के लिए लेखक को महीनों प्रकाशक के चक्कर काटने पड़ते थे। कई बार तो बिना सिफारिश के किताब छपती ही नहीं थी।आज कहानी बिल्कुल उल्टी है। मन में एक विचार आया, एक दोहा मन में आया, तुरंत आपने इंस्टाग्राम पर डाल दिया, व्हाट्सएप स्टेटस पर लगा दिया। कुछ ही मिनटों में आपके दोस्त, आपके रिश्तेदार और अनजान लोग भी उसे पढ़ लेते हैं, दिल भेजते हैं, टिप्पणी करते हैं। फेसबुक पर देखिए, कितने बड़े-बड़े हिन्दी साहित्य के समूह चल रहे हैं। ‘हिन्दी साहित्य परिवार’, ‘कविता मंच’ जैसे ग्रुप में लाखों लोग जुड़े हैं। रोज नई रचनाएँ आती हैं। यूट्यूब पर लोग कहानियों का वाचन कर रहे हैं। कोई मुंशी प्रेमचंद की कहानी सुना रहा है, तो कोई अपनी लिखी हुई नई ग़ज़ल।और एक नई चीज़ शुरू हुई है – छोटा साहित्य। पहले साहित्य मतलब मोटी-मोटी किताबें। अब दो लाइन की शायरी, चार लाइन की कविता, एक पैराग्राफ की लघुकथा – ये भी साहित्य है और लोग इसे बहुत पसंद कर रहे हैं। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों के पास बड़ी किताब पढ़ने का समय नहीं है, पर दो लाइन की अच्छी बात पढ़ कर उनका दिन बन जाता है। ये काम तकनीक ने ही किया है।पहले कवि सम्मेलन सिर्फ बड़े शहरों में होते थे। अब जूम और गूगल मीट पर रोज कवि सम्मेलन हो रहे हैं। अमेरिका में बैठा व्यक्ति भी भोपाल के कवि सम्मेलन में अपनी कविता सुना रहा है। ये तो सोचा भी नहीं था।
*3. हमारी पुरानी धरोहर बच गई और नई पीढ़ी तक पहुँची*ये तकनीक का सबसे बड़ा उपकार है। हमारी कितनी ही पुरानी किताबें, पांडुलिपियाँ ऐसी थीं जो धीरे-धीरे खत्म हो रही थीं। दीमक खा रही थीं, या लाइब्रेरी में पड़ी-पड़ी सड़ रही थीं।आज नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी, कविताकोश, गद्यकोश, आर्काइव डॉट ओआरजी जैसी वेबसाइट्स ने उन सबको बचा लिया है। प्रेमचंद का पूरा साहित्य, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूरदास, तुलसीदास – सब कुछ आज एक क्लिक पर मिल जाता है। वो भी बिना पैसे के। गूगल पर सर्च करो और पूरी किताब सामने।और सिर्फ पढ़ना ही नहीं, अब सुनना भी आसान हो गया है। ऑडियोबुक और पॉडकास्ट का जमाना है। जो लोग पढ़ नहीं सकते, आँखों से कमजोर हैं, या जिनके पास समय नहीं है, वे अब चलते-फिरते, काम करते-करते कहानी सुन सकते हैं। मेरी माँ तो यूट्यूब पर रोज एक नई कहानी सुनती हैं। पहले वो कहती थीं, किताब पकड़ने में नींद आ जाती है, अब वो कान में ईयरफोन लगा कर घंटों साहित्य सुनती हैं।इससे क्या हो रहा है कि जो नई पीढ़ी किताबों से दूर जा रही थी, वो फिर से साहित्य से जुड़ रही है। रील और शॉर्ट्स में आज कबीर के दोहे, रहीम की बातें बहुत वायरल होती हैं। ये देख कर अच्छा लगता है कि तकनीक हमारी जड़ों से हमें फिर जोड़ रही है।
*4. अनुवाद और सीखने में आसानी*पहले हिन्दी की किताब का दूसरी भाषा में अनुवाद होना बहुत मुश्किल और महंगा काम था। अब AI और गूगल ट्रांसलेट की मदद से हम किसी भी भाषा की अच्छी रचना को तुरंत हिन्दी में पढ़ सकते हैं और हिन्दी की रचना को दुनिया की किसी भी भाषा में पहुँचा सकते हैं। इससे हिन्दी साहित्य का दायरा विश्व तक फैल गया है।आजकल कई ऐप हैं जो हिन्दी सीखने में मदद करते हैं। बच्चों के लिए तो कई कार्टून और कहानियाँ अब शुद्ध हिन्दी में आ रही हैं। इससे बच्चों में बचपन से ही हिन्दी के प्रति प्यार बन रहा है।
*5. कुछ चुनौतियाँ भी हैं, पर समाधान हमारे हाथ में है*कुछ लोग कहते हैं कि तकनीक की वजह से हिन्दी बिगड़ रही है। लोग हिंग्लिश लिखते हैं, जैसे ‘क्या हाल है आप कैसे हो ,को आधा अंग्रेजी आधा हिन्दी में लिख देते हैं। या बहुत छोटे-छोटे शब्दों में लिखते हैं। ये बात थोड़ी सच भी है।पर मुझे लगता है कि ये बिगाड़ नहीं, बदलाव है। भाषा तो नदी की तरह है, वो बहती है, अपना रास्ता बदलती है। जब ज्यादा लोग किसी भाषा से जुड़ेंगे तो थोड़ी बहुत मिलावट तो होगी ही। पर अच्छी बात ये है कि लोग जुड़ तो रहे हैं। पहले जो लोग हिन्दी लिखने से कतराते थे, वो आज टूटी-फूटी ही सही, पर हिन्दी में लिख तो रहे हैं।हमें बस इतना करना है कि हम खुद अच्छी हिन्दी लिखने की कोशिश करें। शुद्ध लिखें, देवनागरी में लिखें। अपने बच्चों को हिन्दी में संदेश भेजें।
*अंत में तो कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो आधुनिक तकनीक ने हिन्दी साहित्य को खत्म नहीं किया, बल्कि उसे एक नया जीवन, एक नया आकाश दिया है। पहले साहित्य कुछ गिने-चुने लोगों तक सीमित था। आज वो हर मोबाइल में है, हर हाथ में है। पहले हमें साहित्य को ढूंढने के लिए लाइब्रेरी जाना पड़ता था, आज साहित्य खुद चल कर हमारे पास आ जाता है, नोटिफिकेशन के रूप में।तकनीक एक साधन है, एक गाड़ी है। उस गाड़ी में क्या ले जाना है, ये हमारे ऊपर है। हम उसमें कचरा भी ले जा सकते हैं और हीरे-मोती भी। हमें उसमें हिन्दी के हीरे-मोती ले जाने हैं।मेरा तो यही मानना है कि जब तक हम दिल से हिन्दी को अपनाएंगे, तकनीक चाहे कितनी भी बदल जाए, हमारी हिन्दी हमेशा जिंदा रहेगी, और बढ़ती रहेगी। क्योंकि तकनीक बदल जाती है, पर दिल की भाषा कभी नहीं बदलती।क्योंकि हमारी हिंदी हमारे भारत की पहचान है इसीलिए इसे राष्ट्रभाषा घोषित किया गया है।
रीमा महेन्द्र ठाकुर, वरिष्ठ साहित्यकार
राणापुर झाबुआ मध्य प्रदेश भारत