पेपर लीक से कहीं बड़ा है भारतीय शिक्षा का असली संकट।
दीपक कुमार द्विवेदी
जब हम भारतीय शिक्षा व्यवस्था, इसके ऐतिहासिक स्वरूप और समकालीन परिदृश्य पर विचार करते हैं, तो इसकी जड़ों और विकास यात्रा को गहराई से समझना अनिवार्य हो जाता है। शिक्षा केवल किताबी ज्ञान हासिल करने या परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह किसी भी राष्ट्र की आत्मा, उसके संस्कारों और उसकी वैचारिक सुदृढ़ता का मूल आधार होती है। यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें और अंग्रेजों के आगमन से पहले के भारत पर दृष्टि डालें, तो यह स्पष्ट होता है कि देश की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से विकेंद्रीकृत और समाज-केंद्रित थी। गुरुकुल परंपरा, स्थानीय समाज और स्वायत्त संस्थानों के हाथों में शिक्षा की कमान थी, जहां राजा-महाराजा या शासन व्यवस्था सीधे हस्तक्षेप नहीं करती थी, बल्कि समाज और धर्म के प्रबुद्ध लोग मिलकर इसे पोषित और संचालित करते थे। इस प्राचीन व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य मनुष्य का सर्वांगीण विकास, उसके भीतर नैतिक मूल्यों का सिंचन और समाज के प्रति उसके कर्तव्यों का बोध कराना था, जो स्थानीय आवश्यकताओं, पारंपरिक कौशल और भारतीय संस्कृति के मूल्यों के पूरी तरह अनुकूल थी।
दुर्भाग्यवश, अंग्रेजों ने अपनी राजनीतिक और प्रशासनिक जरूरतों के तहत इस प्राचीन और स्वायत्त व्यवस्था को नष्ट करके एक ऐसी शिक्षा पद्धति थोपी जिसका एकमात्र उद्देश्य देश में केवल ‘सरकारी क्लर्क’ या बाबू तैयार करना था। 1947 के बाद जब देश स्वतंत्र हुआ, तब हमें अपनी मूल भारतीय व्यवस्था की ओर लौटना चाहिए था, परंतु नीति निर्माताओं ने अनजाने या जानबूझकर सोवियत संघ और पश्चिमी मॉडलों की नकल जारी रखी। इसके परिणामस्वरूप, शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य स्किल डेवलपमेंट या मानव पूर्णता के साथ विकास न रहकर, केवल एक सीमित दायरे में नौकरशाही की सेवा करने तक सिमट कर रह गया, और अनुसंधान तथा मौलिक शोध हमेशा से दूर की कौड़ी बने रहे। विशेष रूप से 1960 के दशक के बाद, कांग्रेस शासनकाल के दौरान देश की संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था और पाठ्यपुस्तकों के निर्माण का नियंत्रण धीरे-धीरे वामपंथियों और कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों के हवाले कर दिया गया। इन तत्वों ने शिक्षा को भारतीय राष्ट्र-धर्म और सनातन संस्कृति के विरोधी सांचे में ढालना शुरू कर दिया, जिसके तहत पाठ्यक्रम को वर्ग संघर्ष, मार्क्सवादी सिद्धांतों और राष्ट्र-विरोधी दृष्टियों की पृष्ठभूमि पर आधारित कर दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि आने वाली पीढ़ियों के मन से अपने श्रेष्ठ इतिहास और सांस्कृतिक जड़ों के प्रति गौरव का भाव धीरे-धीरे कमजोर होता चला गया। इन कम्युनिस्ट और वामपंथी तत्वों के पास कभी भी किसी भी गंभीर समस्या का कोई वास्तविक समाधान नहीं रहा है, वे केवल व्यवस्था के भीतर घुसपैठ कर अराजकता पैदा करना जानते हैं, और आज जब शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है, तो यही काकरोच जैसे तत्व विभिन्न आंदोलनों की आड़ में अपनी राजनीतिक रोटियां सेक रहे हैं।
आज प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक जैसी जो घटनाएं सामने आ रही हैं, वे बेहद गंभीर हैं और इस व्यवस्थागत सड़न के पीछे परीक्षा तंत्र के भीतर बैठे भ्रष्ट प्राध्यापकों और ताकतवर कोचिंग माफिया का एक खतरनाक नेक्सस काम कर रहा है। लेकिन इन तथाकथित कम्युनिस्टों, वामपंथी डफली गैंग, भीम आर्मी और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्यादों द्वारा चलाए जा रहे इन कम्युनिस्ट ‘काकरोच आंदोलनों’ का उद्देश्य शिक्षा में सुधार करना या युवाओं के मुद्दों को सुलझाना बिल्कुल भी नहीं है। इन लोगों को पेपर लीक से कोई वास्तविक समस्या नहीं है, बल्कि इनकी असल पीड़ा यह है कि अब इन्हें सिस्टम में मलाई खाने को नहीं मिल रहा है। यही कारण है कि वे वास्तविक शिक्षा सुधार या कोचिंग माफिया पर नकेल कसने की बात करने के बजाय केवल केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर हो-हल्ला मचा रहे हैं।इस पूरी साजिश की पृष्ठभूमि में कल्चरल मार्क्सवाद के टूल काम कर रहे हैं, जिनके तहत ‘वोकिज्म’, ‘आइडेंटिटी पॉलिटिक्स’ और ‘क्रिटिकल रेस थ्योरी’ जैसे विदेशी सिद्धांतों के माध्यम से भारत की आत्मा को अंदर से खोखला करने का सुनियोजित प्रयास किया जा रहा है। परसों दिल्ली की सड़कों पर जिस तरह की हिंसा और अराजक दृश्य देखने को मिले, उन्होंने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि इन आंदोलनों का उद्देश्य युवाओं के कंधों पर बंदूक रखकर अपने निजी और देश-विरोधी एजेंडे सेट करना है। इन तत्वों और आंदोलनों के मुख्य निशाने पर हिंदू परिवार व्यवस्था को ध्वस्त करना है, जो युवाओं को अनुशासित रखती है और उन्हें अराजक होने से रोकती है। इनके निशाने पर समलैंगिकता और अन्य वैचारिक माध्यमों से भारतीय समाज की मूल संरचना को छिन्न-भिन्न करना होता है ताकि देश की सांस्कृतिक और आत्मिक रीढ़ को तोड़ा जा सके।यदि हम विगत डेढ़ सौ वर्षों के इतिहास को देखें, तो अंग्रेजों के समय से लेकर आज तक भारत में जितने भी धरना-प्रदर्शन या आंदोलन हुए हैं, उनमें से एक भी ऐसा नहीं रहा जो सफल साबित हुआ हो, क्योंकि सरकारें या व्यवस्थाएं केवल दबाव और ठोस नीतियों से बदलती हैं, सड़क पर भीड़ जुटाने से नहीं। इसके विपरीत, जब भी कोई सात्विक जन-आंदोलन हुआ है, जैसे कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का ऐतिहासिक आंदोलन, जिसकी शुरुआत सात्विक और वैचारिक रूप से हुई थी, उसने पूरे सिस्टम को अपने संकल्प के आगे झुकने पर मजबूर कर दिया।
इन विनाशकारी प्रवृत्तियों से बचने के लिए हमें कोरे उपदेशों और परजीवी आंदोलनों के चक्रव्यूह से पूरी तरह बाहर निकलना होगा। आज का युवा केवल अधिकारों की बात करता है, जबकि राष्ट्र निर्माण के लिए कर्तव्य-बोध सबसे पहले आता है, और हमें उस भावना को आत्मसात करना होगा जो यह सिखाती है कि देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें।सरकारी नौकरी के अंतहीन और घुटनभरे मोह को छोड़कर युवाओं को उद्यमी और स्वावलंबी बनना होगा, क्योंकि जब तक शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से सरकारी चंगुल से मुक्त होकर वापस समाज के हाथों में नहीं सौंपी जाती, तब तक इसके मूल स्वरूप में व्यापक सुधार संभव नहीं है। यदि हम भारत में वास्तविक और चिरस्थायी बदलाव चाहते हैं, तो हमें ‘सरकार को सब कुछ’ यानी माई-बाप मानने की मानसिकता को त्यागकर समाज-केंद्रित व्यवस्था की मांग करनी होगी, तभी जाकर देश अपनी गौरवशाली परंपरा और सनातन वैदिक मूल्यों के आधार पर एक सशक्त राष्ट्र के रूप में खड़ा हो सकेगा।