सांस्कृतिक अवमूल्यन के साथ समस्या निवारण संभव नहीं होगा।

लेखक: प्रांजल शुक्ल,

शिक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था की उत्कृष्टता किसी भी समाज के उत्कर्ष की ध्योतक होती है। दोनो में समाज के सेवा भाव तथा संवेदनशीलता का प्रतिबिंब दिखता है। दोनो का delivery system समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए समानता पूर्ण होना चाहिए। इसमें किसी प्रकार का व्यवसायीकरण ना हो इसका समाज को गंभीरता से ध्यान भी रखना चाहिए। चिकित्सा शिक्षा में चयन हेतु आयोजित NEET परीक्षा के paper leak प्रकरण ने समूचे समाज को चिन्तित किया। इस परीक्षा के अभ्यर्थियों के प्रति सभी के मन में समान रूप से संवेदना जागृत हुई।इसको लेकर जब विद्यार्थियों का आंदोलन आरंभ हुआ तब भी समूचे समाज का समर्थन इसे प्राप्त हुआ और यह इसलिए भी था ताकी भविष्य में शिक्षा के क्षेत्र में समस्त उच्चतम से सामान्य परीक्षाओं में आमूलचूल परिवर्तन लाकर इसे त्रुटिहीन बनाया जाए।

क्योंकि आज का होनहार व परिश्रमी विद्यार्थी ही देश का भविष्य है।जब इस आंदोलन की स्वघोषित बागडोर CJI जैसे अपरिपक्व संगठन ने थामी तब भी प्रबुद्ध वर्ग ने जैसे तैसे उसे भी स्वीकार कर लिया। जब CJI का नेतृत्व करने वाले समूह की संलिप्तता राष्ट्र विरोधी तत्वों तथा कतिपय राजनीतिक दलों के साथ जुड़ती दिखी तब भी एक बड़े वर्ग ने विषय के महत्व को आगे रखते हुए इसे भी बेमन से स्वीकार किया।

संशय तो लगभग सभी विचारवान लोगों के मन में था कि यह आंदोलन एक स्थिति के बाद अनियंत्रित व अराजक हो सकता है परंतु परिस्थितिवश यह risk भी ले ली गयी।सोनम वांगचुक से लेकर मक्कार आपियों तथा leftist liberals से लेकर deep state agents को जब हमनें मंच पर मंडराते और लोगों को भरमाते देखा तो समझ में आने लगा कि अब मूल विषय पृष्ठभूमि में चला गया है तथा भारत तोड़ो tool kit ने काम करना शुरु कर दिया है। इस आंदोलन में मासूम बच्चों को देखकर किसका मन द्रवित नहीं हुआ होगा क्योकि करुणा एवं संवेदना ही तो हमारी संस्कृति की नीव है। और यही नौनिहाल तो हमारी सनातन संस्कृति के भविष्य के ध्वजवाहक हैं।

भारत की सबसे बड़ी पूंजी हमारी संस्कृति है जिसने हमें संस्कारवान बनाया और इसी सांस्कृतिक धरोहर के बलबूते हमने अपनी प्रतिभा एवं सामर्थ्य के झण्डे समूचे विश्व में लहराए।विगत एक सप्ताह से जंतर-मंतर पर चल रहे धरना प्रदर्शन को लेकर जिज्ञासा भी थी तथा एक अजीब सी बेचैनी भी। इसीलिए वहां हो रहे घटनाक्रम की जानकारी प्राप्त करने के लिए सोशल मीडिया के अनेक साधनों का भरपूर उपयोग किया। 20 जुलाई को हुए उपद्रव ने अनेक कुशंकाओं को सच साबित कर दिया। इसके बाद तो जैसे content की बाढ़ सी आ गयी।

परंतु इन्ही असंख्य वीडियो एवं रील्स देखकर हमारे जैसे असंख्य लोगो को एक प्रकार का cultural shock लगा। इन रील्स तथा वीडियो में जिस प्रकार की अभद्र भाषा ,स्लोगन , पोस्टर तथा gestures का प्रयोग करते हुए इस नयी पीढ़ी और विशेषकर लड़कियों को देखा तो सहसा विश्वास नहीं हुआ कि क्या यह भारत में ही हो रहा है । जिस ढीठता एवं निर्लज्जता से ये बच्चे अपशब्दों का प्रयोग कर रहे थे , यह दिख रहा था कि इनमें संस्कारों का भारी अभाव है।इन्हे रत्ती भर संकोच या भय भी नहीं था कि उनकी इस अशिष्ट भाषा तथा हावभाव को उनके माता-पिता,परिवारजन तथा समूचा समाज देख रहा है*।हम हतप्रभ हैं , हम अवसाद में हैं , हम किंकर्तव्यविमूढ हैं।हमारे जैसे सामान्य लोगों ने अपने समाज समूह में शिक्षा के प्रति गंभीर विद्यार्थियों में इस स्तर की विकृति तो देखी नहीं – फिर ये कौन हैं ? प्रतियोगी परीक्षाओं में जिस साधना तथा संयम की आवश्यकता होती है , उस स्तरीयता का इन संस्कार-विहीन युवाओं में नितांत अभाव दिखता है। एक बात फिर स्पष्ट है कि इनका इस आंदोलन में विद्यार्जन से परे कुछ अन्य उद्देश्य है।

भारतीय समाज में इनकी यह अमर्यादित अश्लीलता व फूहड़ता कदापि स्वीकार्य नहीं है , ना होगी, ना होने देंगे।

शिक्षार्जन में विषय विशेषज्ञता से पहले संस्कारों का बीजारोपण होना आवश्यक है क्योंकि शीलवान-संस्कारवान व्यक्ति ही ज्ञान-बुद्धि-प्रतिभा का विवेकपूर्ण सदुपयोग कर सकता है। संभावित कारण यही प्रतीत होता है कि ये वही हो सकते हैं जिनके *मन , बुद्धि , आचरण को wokism तथा वामपंथी विचारधारा ने दुष्प्रभावित* किया है। यह वो virus है जो सर्वप्रथम व्यक्ति को only me & myself नामक व्याधि से संक्रमित करके समाज की प्रचलित आचरण पद्धति से विद्रोह कराता है तथा अंततः उसे उसकी संस्कृति से विमुख करता है।

युवा पीढ़ी जब अपनी जड़ों से कटती है तो वह स्वयं के साथ अपने भविष्य का नाश करती है।

परंतु फिर भी यह तो संतोष है कि आज भी हमारे देश के युवाओं का अधिकांश वर्ग इस दूषित कुत्सित सोच से , इस विकारपूर्ण आचरण पद्धति से अपने को बचाए हुए है – अपने समृद्ध संस्कारो को सहेजे है। कम से कम NEET के toppers की बाते सुनकर तो यही विश्वास बढ़ता है।जंतर-मंतर के साथ देश के बड़े महानगरों में जिस दिशा में यह protest जाता दिख रहा है , उसको लेकर सकारात्मक संकेत तो दिखते नहीं हैं। *यह आंदोलन अब नकारात्मक स्वरूप धारण करता दिखता है – इसे चलाने वाले तथा इसमें उपस्थित लोग संदेहास्पद लगते हैं। लगता तो यही है कि सामान्य विद्यार्थियों को ढ़ाल बनाकर अराजक तत्व कानून व्यवस्था को भंग करने का प्रयास करेंगे*।

चिंता की बात यह है कि अभी भी यह षड्यंत्र ना तो इन भोले भाले विद्यार्थियों को समझ आ रहा है ना ही इनके अभिभावकों को*।

अराजकता की स्थिति में षड़यंत्रकारी इन्ही बच्चों को सामने रखकर हिंसा करेंगे। दूसरों की लाशें गिरवाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने का खासा अनुभव है इन अराजक तत्वों को*।*ईश्वर से यही कामना है कि समय रहते इन बच्चों एवं इनके माता-पिता को सद्बुद्धि आ जाए तथा ये सभी सकुशल रहकर अपना भविष्य बनाएं। किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए अपने बच्चों की सुरक्षा हेतु उन्हे यथाशीघ्र ऐसे स्थानों से हटा लेने में ही समझदारी है*।इस विषय को लेकर समाज में व्याप्त चिंता का पर्याप्त संज्ञान शासन के प्रत्येक स्तर तक हो भी चुका है।सरकार की इस घटनाक्रम में सबसे बड़ी चूक यह रही कि उन्होने इस विषय के समाधान हेतु जो भी कार्य किए वह एक व्यापक स्तर पर समाज एवं विद्यार्थियों के बीच स्थापित एवं प्रसारित करने में असफल रही। जो कुछ इन्होने 20 जून तक किया इसे सार्वजनिक करने में 20 जुलाई तक का समय क्यों लगा ? इस विषय को लेकर सरकार की जो गंभीरता थी वह प्रकट करने में इतना विलम्ब क्यों हुआ? क्योकि जिन विसंगतियों को लेकर यह आंदोलन प्रारंभ हुआ था , उनके समाधान की दिशा में सरकार ने तुरंत action mode में आकर नीति निर्धारण की प्रक्रिया आरंभ कर दी थी।

प्राँजल शुक्ल

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