परीक्षा-पत्र लीक होने का गोरखधंधा कब बंद होगा ?
लाखों मेडिकल अभ्यर्थियों के सपनों पर उस वक्त पानी फिर गया जब नीट यूजी 2026 की परीक्षा पेपर लीक होने की वजह से निरस्त कर दी गई।
यह केवल एक परीक्षा का रद्द होना नहीं है, बल्कि देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया की साख पर लगा एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है। परीक्षा से कुछ घंटे पहले ही सोशल मीडिया और कुछ मैसेजिंग ऐप्स पर प्रश्न पत्र वायरल होने की खबरें सामने आईं।
प्रारंभिक जांच और छात्रों के विरोध के बाद राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने तत्काल प्रभाव से परीक्षा को रद्द करने का फैसला लिया। इस घटना ने एक बार फिर परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हमारे देश में प्रश्न-पत्र लीक होने की खबरें हर साल अखबारों में आती रहती है। राज्य बोर्ड परीक्षाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्न-पत्र लीक होने के कई मामलों ने लगभग सभी राज्यों में सार्वजनिक क्षेत्र को हिलाकर रख दिया है। विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्न-पत्र लीक होने से लेकर सरकारी अधिकारियों के पदों पर भर्ती तक ऐसी प्रतियोगी परीक्षाओं के संचालन में ईमानदारी और निष्पक्षता पर संदेह पैदा होता है। ऐसी परीक्षाएं आयोजित करने वाली शीर्ष संस्थाओं पर किसी भी तरह के आंतरिक प्रभाव और भविष्य में किसी भी तरह के उल्लंघन को रोकने और युवाओं के बीच विश्वसनीयता, निष्पक्षता, विश्वास और ईमानदारी को फिर से स्थापित करने के लिए कड़े उपायों के साथ विश्वसनीय और स्वीकार्य परीक्षा प्रणाली को लागू करने का दबाव बढ़ रहा है।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए ईमानदारी से पसीना बहाकर खुद को तैयार करने वाले उम्मीदवारों का दृढ़ मत है कि भारत माता के सच्चे बेटे और बेटियां बनने के लिए वर्तमान चयन प्रणाली द्वारा उनके भविष्य के साथ धोखा किया जा रहा है। अभिभावकों का मानना है कि सरकार जांच के आदेश तो देती है, लेकिन दुर्भाग्य से उनके निष्कर्ष जनता को नहीं बताए जाते। इसलिए अब समय आ गया है कि ऐसी गड़बड़ियों को खत्म किया जाए। जाहिर है, सुधारों और विश्वसनीय तथा निष्पक्ष जांच प्रणाली की स्थापना की जरूरत बढ़ती जा रही है। सवाल पैदा होता है कि “सार्वजनिक परीक्षा किस लिए होती है? आमजन या फिर धनाढ्य वर्ग के लिए? अनुभव तो यही बताता है कि ज्यादातर फायदा साधन संपन्न धनाढ्य और प्रभावशाली वर्ग ही उठा रहा है !!
शुरू से ही केंद्र और राज्य सरकारों ने ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं पर उचित कार्रवाई नहीं की है, जिससे हमारे युवाओं के भविष्य पर निराशा और अनिश्चितता बनी हुई है।
एसा लगता है कि आजकल परीक्षा उम्मीदवारों के ज्ञान के मूल्यांकन के लिए नहीं, बल्कि अभिभावकों और आम जनता के धन और धैर्य के लिए है। इसका उद्देश्य पारदर्शी चयन और नियुक्ति नहीं है। यह युवाओं का मनोबल गिराती है। यह अभिभावकों और उनके बच्चों को खुशी नहीं, बल्कि निराशा और दुख देती है ! हमारे देश में वर्तमान प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली, साक्षात्कार लेने, पेपर सेट करने वालों और आंतरिक-बाह्य परीक्षकों के एकाधिकार को दर्शाती है।
हमारे देश में एक और दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया और परीक्षा प्रणाली में कोई उचित सह-संबंध नहीं है। सफल शिक्षण काफी हद तक प्रभावी शिक्षण के साथ-साथ मूल्यांकन प्रणालियों की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। इसलिए, मूल्यांकन को शिक्षण और सीखने की प्रक्रिया के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता है। मौजूदा सार्वजनिक प्रतियोगिता परीक्षा प्रणाली पठन पाठन-आधारित नहीं है, इसलिए ऐसी परिक्षाएं चिंता पैदा करती हैं और रटने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती हैं। भारत में मौजूदा सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली ग्रामीण और शहरी पृष्ठभूमि, शिक्षित परिवार की पहली और दूसरी पीढ़ी, अमीर और गरीब समाज और 21वीं सदी के ज्ञानी और पिछड़े समाज से आने वाले उम्मीदवारों के लिए काफी हद तक अनुपयुक्त है।
सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों की कमी के कारण, ये परिक्षा बोर्ड और भर्ती आयोग सामाजिक न्याय की आवश्यकता को पूरा नहीं करते हैं। तेलंगाना राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा सहायक अभियंताओं की भर्ती परीक्षा, मार्च 2023, राजस्थान अधीनस्थ और मंत्रालयिक सेवा चयन बोर्ड द्वारा प्रारंभिक शिक्षकों के लिए राजस्थान पात्रता परीक्षा, फरवरी 2023, बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा शिक्षक भर्ती परीक्षा, जून 2024 और NEET UG 2024 और अब 2026 में प्रश्नपत्रों का लीक होना, संबंधित संस्था की लापरवाही और लापरवाही को दूर करने में उनकी जानबूझकर की गई विफलता को इंगित करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं !! 2009 मध्यप्रदेश व्यापम घोटाले के पीछे कई नेताओं, वरिष्ठ अधिकारियों और व्यवसायियों का हाथ था, जिसने हजारों छात्रों का भविष्य अंधेरे में धकेल दिया। ये घोटाले ईमानदार मेहनतकशों के लिए हताशा और अवसाद का कारण बन गए हैं। प्रश्नपत्र तैयार करने और उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए भी विश्वसनीय व्यवस्था की आवश्यकता है। भारतीय शिक्षा प्रणाली ने कई क्षेत्रों में बहुत कुछ हासिल किया है, लेकिन 21वीं सदी की पीढ़ी के लिए विश्वनीय बनने में विफल रही है। हमारे देश में लोगों द्वारा चुने गए प्रतिनिधि का समूह ही सरकार है, जो इसे संचालित करने के लिए जिम्मेदार है। आशा और प्रार्थना है कि मोदी सरकार के साथ ही साथ अन्य राज्यों की प्रतिनिधि सरकारें भी प्रशासनिक बुराइयों पर उचित संज्ञान लेगी और हमारे देश की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली ऐसी अमानवीय , अशोभनीय और छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने के मामलों में उचित कार्रवाई करेगी।
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डॉ. बालाराम परमार ‘हॅंसमुख’