ग्रामसभा के हाथ में ग्राम का भविष्य: PESA से आदिवासी स्वशासन का सूर्योदय।
“”डॉ. बालाराम परमार ‘हॅंसमुख’
पिछले दो दशकों से देश के साथ ही मध्यप्रदेश में अनुसूचित जनजाति के लिए कई महत्वपूर्ण एवं कारगर सरकारी उपाय किए जा रहे हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि सदियों से आदिवासी समुदाय का आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक शोषण होता रहा है। इस शोषण का प्रमुख आधार आदिवासी समाज में शिक्षा के प्रचार-प्रसार का सर्वदा अभाव। अंग्रेजी काल में ईसाई धर्मांतरण के मकसद से इन इलाकों में शिक्षा व्यवस्था नहीं की गई। आजादी के प्रारंभिक दशकों में आदिवासी समुदाय को राजनीतिक दलों ने अपना वोट बैंक बना कर रखने के लिए उन्हें प्रारंभिक शिक्षा से वंचित रखा। धर्मांतरण,नक्सलवाद, अलगाववाद और अधिकांश जनजाति समुदाय द्वारा हिंदू धर्म का अंग मानने से इंकार, इसी का परिणाम है।
जब शिक्षा का उजाला फैला, लोगों में जागृति आई, और संविधान का ज्ञान होने के फल स्वरुप केंद्र व राज्य सरकारों ने शोषण के खंडहर पर स्वराज का भवन खड़ा करने के उद्देश्य से PESA कानून के माध्यम से जनजाति का पुनर्जागरण जैसे कानून बनाए।
झाबुआ की धरती से उठे भील समाज के दिलीप सिंह भूरिया के नाम पर बनी ‘भूरिया समिति’ की अनुशंसा पर जन्मा पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996, जिसे वकील की भाषा में PESA कहते हैं। भारतीय संसद का वह ऐतिहासिक निर्णय है जिसे अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार ने 24 दिसंबर1996 को पारित किया था। यह कानून कागज पर नहीं, जनजाति के जीवन पर संजीवनी बूटी की तरह कारगर हुआ है। सदियों के शोषण, साहूकारी की लूट, जमीन की छीना-झपटी और शासन की हिन भावना से मुक्ति का द्वार यही कानून है। यह अधिनियम तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, झारखंड, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और राजस्थान के अनुसूचित जनजाति बाहुल्य क्षेत्रों पर लागू है। इसका मूल आधार संविधान का वह अनुच्छेद है जो पंचायत राज को जन-शक्ति का केंद्र मानता है। PESA का उद्देश्य सरल है: जहां जनजाति बहुसंख्यक हैं, वहां निर्णय भी उसी ग्रामसभा के हाथ में हो जिसकी नसों में उस मिट्टी का खून बहता है।स्वतंत्रता सेनानी जननायक भगवान टंट्या भील के बलिदान दिवस के अवसर पर 4 दिसंबर 2021 इंदौर के नेहरू स्टेडियम में घोषणा के बाद लागू किया गया । इस कानून के माध्यम से ग्राम सभाओं को सशक्त बनाकर स्थानीय जनजातीय समुदायों को जल, जंगल और जमीन के अधिकार प्रदान किए जाते हैं। राजस्थान, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और गुजरात के बाद मध्य प्रदेश सातवां राज्य बना जिसने PESA को जमीन पर उतारा। खरगोन , झाबुआ और रतलाम जिले के प्रवास के दौरान अनुभव बताते हैं कि जहां-जहां यह कानून जीवंत हुआ, वहां-वहां जनजाति का जीवन बदला। PESA की आत्मा ग्रामसभा है। अब आदिवासी गांव का साप्ताहिक बाजार, वार्षिक मेला, देवस्थान का मेला – इन सबका प्रबंधन ग्रामसभा करती है । गांव की जमीन अधिग्रहण करने से पहले ग्रामसभा की अनुमति अनिवार्य है। किसी व्यक्ति पर पुलिस में प्राथमिक सूचना दर्ज हो तो उसकी सूचना ग्रामसभा को देना बंधनकारी है। गांव के तालाब, जलाशय की आमदनी अब ग्राम के खजाने में जातीं हैं। वनोपज – महुआ, तेंदूपत्ता, आंवला, हर्रा, बेहड़ा, गोंद, लाख, करंज बीज, आचार की गुठली – इन सबका मूल्य ग्रामसभा तय करती है। सदियों से ठेकेदार और व्यापारी जो मूल्य तय करते थे, अब वह अधिकार जनजाति समुदाय के माँझी, पटेल और ग्रामसभा के पास है।सरकार रोजगार दे, पर उसका लेखा-जोखा कौन रखे? PESA कहता है – ग्रामसभा। गांव से कोई रोजगार के लिए बाहर जाए या बाहर से कोई गांव में काम करने आए, उसकी सूचना ग्रामसभा को होगी। इससे बंधुआ मजदूरी, मानव तस्करी और धोखे से पलायन पर रोक लगी है। गांव का श्रम, गांव के विकास में काम आ रहा है।जनजाति समाज का सबसे पुराना घाव साहूकार की लूट है। महाजन, बनिया, सूदखोर सदियों से फसल, जमीन, स्त्री-पुरुष सबको बंधक बनाते रहे हैं। PESA ग्रामसभा को अधिकार देता है कि वह गांव के सभी साहूकारों का पंजीयन करे, उनके लेन-देन का हिसाब रखे। बिना ग्रामसभा की जानकारी के अब कोई साहूकार आदिवासी की जमीन या रकम गिरवी नहीं रख सकता है । महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी ने एक अवसर पर स्वयं कहा है कि नशे के कारण हमारे असंख्य आदिवासी भाई जेलों में हैं। उनका अपराध बड़ा नहीं, पर नशे की दशा में हुआ है। PESA ग्रामसभा को शक्ति देता है कि वह गांव में शराब, भांग की दुकान खोलने का निर्णय स्वयं लेने का अधिकार देता है। हर गांव में एक शांति और विवाद निवारण समिति बनाने का प्रावधान है,जो झगड़े का निपटारा प्रथागत, मानवीय तरीके से करेगी। थाने-कचहरी के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। सुदूर अंचल में स्कूल बंद रहते हैं, स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर नहीं है, आंगनवाड़ी में पोषण नहीं, खदान आवंटन में गांव की आवाज नहीं सुनी जाती। PESA इन सभी संस्थाओं पर ग्रामसभा का नियंत्रण स्थापित करता है। अब शिक्षक की उपस्थिति, डॉक्टर की ड्यूटी, खदान का पट्टा – सब पर ग्रामसभा की मुहर लगेगी।आधुनिक ऊहापोह की जिंदगी का असर आदिवासी समाज पर भी पड़ा है। इस समुदाय के पढ़े लिखे और नौकरी पेशा व्यक्ति अब अपनी संस्कृति, सभ्यता और रीति रिवाज से दूर होता जा रहा है। PESA का सबसे बड़ा वरदान यह है कि यह आदिवासी की प्रथागत, धार्मिक और परंपरागत रीतियों का संरक्षक है। विवाद का निपटारा प्रथा से होगा। सामुदायिक संस्थाओं का प्रबंध परंपरा से होगा। कानून कहता है – तुम्हारी संस्कृति को म्यूजियम में मत रखो, उसे शासन का हिस्सा बनाओ। PESA कानून संविधान, संसद और जनता की इच्छा से बना है। पर कुछ स्वार्थी तत्व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में आदिवासी भाई-बहनों को भ्रमित करते हैं। उन्हें कानून की जानकारी नहीं देते, विकास के मार्ग में बाधा बनते हैं। यही कारण है कि दशकों तक जनजाति का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शोषण होता रहा।इक्कीसवीं सदी में देश बदल रहा है। अब राजनीतिक दलों का ही नहीं, जनजाति के अपने नेताओं का भी दायित्व है कि वे राजनीति से ऊपर उठकर PESA को जन-जन तक पहुंचाएं। कानून की प्रति हर ग्रामसभा में हो, हर युवा उसे पढ़े, हर माँझी उसे समझे।यदि दसों राज्य PESA को अक्षरशः लागू करने का ईमानदारी से राजनीति से परे प्रयास होते हैं तो नयी पीढ़ी देखेंगी कि जो स्वशासन प्रणाली मुर्झा गई थी, जो दम तोड़ चुकी थी, वह फिर से जीवंत हो उठेगी। PESA केवल अधिनियम नहीं है। यह शोषण के खंडहर पर स्वराज का भवन है। इसे बनाना हम सबका पुण्य है।
*डॉ. बालाराम परमार ‘हॅंसमुख’*