2013 के अध्यादेश फाड़ने से 2018 के आंख मारने तक राहुल गांधी का सफर और संसद की गरिमा को आघात।

डॉ बालाराम परमार

लोकसभा भारतीय प्रजातंत्र का मंदिर है। यह मंदिर सिर्फ इमारत नहीं, संसदीय कार्यप्रणाली की आचार-संहिता का आजादी के दिन से गवाह है। सांसदों द्वारा बोला जाने वाला हर शब्द मतदाता द्वारा तौला जाता है। हर कदम का हिसाब होता है। क्योंकि यहाँ कानून बनते हैं, सरकार बनती-बिगड़ती है, जनता का भाग्य तय होता है। पिछले एक दशक में कुछ ऐसे क्षण आए जब इसी प्रजातंत्र मंदिर की ड्योढ़ी पर मर्यादा लड़खड़ाई। सबसे पुरानी पार्टी के सांसद और नेहरू – गांधी परिवार के वारीस और वर्तमान में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने वह सफर तय किया है, जिसमें प्रधानमंत्री बनने की छवि एक नादान नेता के रुप में उभरती है। अपनी पार्टी की सरकार द्वारा पारित ‘अध्यादेश फाड़ने से लेकर आंख मारने तक’ और गणमान्य सांसद बहन को चुम्बन का है। ऐसे ही संविधान बचाने की दुहाई देने वाले, प्रेम की दुकान खोलने की वकालत करने और पानी पी पी कर,पग-पग पर मोदी सरकार को कोसनें वाले नेताजी का मूल्यांकन जरूरी है, क्योंकि स्वदेश में लोकतंत्र की साख इसी मर्यादा पर टिकी है।

राहुल गांधी सामान्य नहीं, विशिष्ट व्यक्ति का दर्जा प्राप्त 5 बार सांसद लोकसभा के सदस्य बन चुके हैं। वह पहली बार 2004 में अमेठी से चुनाव जीत हैं और एलन ऑक्टेवियन ह्यूम द्वारा 28 दिसंबर 1885 को अंग्रेज हितों की रक्षा के लिए स्थापित कांग्रेस पार्टी के 16 दिसंबर 2017 से 3 जुलाई 2019 तक अध्यक्ष रहे चुके हैं। वे ऐसे माता पिता की संतान हैं, जिनकी मां 1998 से 2017 तथा 2019 से 2022 तक 20 साल से अधिक समय तक तथा पिता राजीव गांधी 1985 से 1991 तक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं। उनकी दादी ने 1959 से 1960 तथा 1978 से 1984 मृत्यु पर्यन्त तक कांग्रेस की कमान संभाली। उनके परनाना जवाहरलाल नेहरू अपने राजनीतिक जीवन में कुल 7 बार कांग्रेस के अध्यक्ष 1929, 1936, 1937 और 1946 और 1951 से 1954 तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे चुके हैं। भारत में राहुल गांधी एक मात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने एक दिन भी कार्य नहीं किया फिर भी 20 करोड़ रुपये इसमें ₹9.24 करोड़ की चल और ₹11.14 करोड़ की अचल संपत्ति के मालिक है।

2 अक्टूबर 2013 को अपनी ही सरकार की मंत्रिपरिषद के एक अध्यादेश ” सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को निरस्त करना जिसमें सजायाफ्ता सांसद की सदस्यता तुरंत समाप्त” उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने, “यह पूरा का पूरा बकवास है”, कैमरों के सामने फाड़- फेंक कर सार्वजनिक विसर्जन किया था।

जबकि संसदीय परंपरा यह है कि कैबिनेट का निर्णय, सरकार का निर्णय। उससे असहमति हो तो इस्तीफा दो, या कैबिनेट में तर्क रखो। पर अपनी ही सरकार द्वारा संसद में पेश किए गए विधायी प्रस्ताव को सार्वजनिक मंच पर “बकवास” कहना, उसे फाड़ना, यह कार्यपालिका और विधायिका दोनों का अपमान था। परिणाम: 72 घंटे में सरकार को अध्यादेश वापस लेना पड़ा। मनमोहन सिंह सरकार झुकी और राहुल गांधी के अड़ियल रवैया के सामने सदन की नहीं, सड़क की भाषा चली। इससे भी मजेदार दुसरे नमूना की बानगी देखें। 20 जुलाई 2018 को अविश्वास प्रस्ताव पर 12 घंटे की बहस चली। भाषण के बाद राहुल गांधी अपनी सीट से उठे। वेल पार किया। प्रधानमंत्री की कुर्सी तक गए और “हम आपसे नफरत नहीं करते” कहते हुए उन्हें गले लग गये। ठीक है, यह मानवीय भाव था पर संसद मानवीय भावनाओं का अखाड़ा नहीं, नियमों का सदन है। नियम 380 के अनुसार अध्यक्ष की अनुमति के बिना कोई सदस्य वेल में नहीं जा सकता। यहां तक की बिना अनुमति दूसरे नेता के स्थान पर नहीं जा सकता । गले लगाकर वह अपनी सीट पर लौटे। रास्ते में सत्ता पक्ष की ओर देखा और आंख मारी। कैमरे में कैद हो गया।

यहाँ प्रश्न आचरण का था। विरोध करना, सरकार को घेरना, अविश्वास लाना – यह सब संसदीय अधिकार है। पर आसंदी की मर्यादा, वेल की पवित्रता, और बहस के बाद का गंभीर माहौल इन तीनों हरक़त ने उस दिन 70 सालों की संसदीय मर्यादा को ने केवल आहत किया,अपितु भारतीय संस्कृति और सभ्यता का भी घोर अपमान किया।इससे सिद्ध होता है कि राहुल गांधी संसदीय प्रक्रिया से ज्यादा अपने भौंडे प्रदर्शन को महत्व देते हैं।

संविधान में संसदीय मर्यादा के 3 स्तंभ का वर्णन हैं। पहला, नियम 352 के अनुसार जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि व्यक्तिगत आक्षेप नहीं लगा सकते है। चौकीदार चोर है, नारा हो या बकवास अध्यादेश जैसी टिप्पणी, पद की गरिमा से ऊपर नहीं मानीं जा सकती। दुसरा , अध्यक्ष का निर्णय अंतिम है। वेल में आना, तख्ती लहराना, कार्यवाही बाधित करना, नियम 374 का उल्लंघन है। 2023 मानसून सत्र में इसी कारण विपक्ष के कई सांसद निलंबित हुए। तीसरा ,सदन के भीतर की लड़ाई सदन के भीतर ही रहेंगी। राहुल गांधी द्वारा 2023 में विदेशी विश्वविद्यालय से “भारतीय लोकतंत्र पर हमला” कहना, देश की संसदीय संप्रभुता पर प्रश्न उठाता है।अकूत संपत्ति के मालिक, 40 वर्षों से सार्वजनिक जीवन में रहने वाले नेताओं का मूल्यांकन तो बनता है। दोष किसका? प्रजातंत्र की मांग कहतीं है कि दोषी भारत के मतदाता हैं। बेवजह राजनीतिक घराने के कारण माथे पर बैठाकर रखतें हैं।

विपक्ष की मजबूरी तो समझ में आती है। इस समय विपक्षी दलों में कांग्रेस के अलावा कोई भी राष्ट्रीय दल नहीं है। सभी क्षेत्रीय दल अपनी स्मिता बनाए रखने के लिए कांग्रेस के पिछलागू बने हुए हैं। प्रजातंत्र में किसी एक व्यक्ति की निंदा के लिए लेख नहीं लिखे जाते, अपितु प्रजातंत्र के प्रहरियों के लिए यह दर्पण रखा जाता है। जहां सत्ता पक्ष का दायित्व है कि वह बहस के लिए समय दे, वहीं विपक्ष का फर्ज बनता है कि वह बहस में संसदीय नियमों और परंपरा के अनुसार भाग ले। जो भी जो भी सदस्य जनता के द्वारा चुना जाता है उसे बहुत से भागे की नहीं है । विशेषकर जब विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा ही प्रक्रिया को “बकवास” कहे, आसन की अवहेलना करे, तो निचली पंक्ति के सांसद को क्या संदेश जाता है? सदन की कार्रवाई को 140 करोड़ लोग देश में तथा इस आंकड़े से दुगने विदेश में दूरदर्शन पर सदन की कार्रवाई देखते हैं। बच्चे अर्थात कल के नेता भी देखते हैं। उनके लिए सांसद का आचरण ही लोकतंत्र की परिभाषा है। यदि मंदिर में ही मर्यादा न बचे, तो बाहर क्या बचेगा?

इसलिए आम आदमी की राय यह है कि अध्यादेश फाड़ना हो या आंख मारना, दोनों घटनाएं संसदीय इतिहास में दर्ज हैं। इसे हम राहुल गांधी की ओछी राजनीतिक मानसिकता मानते हैं। संसदीय प्रणाली में असहमति का अधिकार है, पर असंसदीय आचरण एक बार नहीं बार-बार करने का अधिकार नहीं। लोकतंत्र मजबूत तभी होगा जब सत्ता और विपक्ष दोनों एक बात मानें की सरकार हमारी हो या आपकी, संसद सबकी है। और संसद की मर्यादा, प्रजातंत्र की मर्यादा है। मतदाता का सम्मान है।

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