झोलाछाप के मकड़जाल में फंसते जा रहे नागरिक, डॉक्टर्स की कमी और जनता के साथ सरकार का छल।

रिंकेश बैरागी,

विश्व स्वास्थ्य दिवस पर प्रदेश में डॉक्टर की स्थिति को बताते हुए एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें बताया गया था कि, प्रदेश में चिकित्सकों की बहुत ज्यादा कमी हैं और विश्व स्वास्थ्य संगठन के मापदंड को पूरा करने के लिए वर्तमान में 51 हजार चिकित्सकों की उपलब्धता की आवश्यकता हैं। वहीं प्रदेश के चिकित्सक महासंघ से अध्यक्ष ने बताया था कि, इस कमी को पूरा करने के लिए प्रदेश सरकार को लगभग दो दशक से अधिक का समय लग सकता है। अर्थात प्रदेश में चिकित्सकों की कमी बहुत अधिक है और यह स्थिति भयानक है। इस भयंकर संकट का भरपूर उपयोग प्रदेश में फैले झोलाछाप सरलता से कर रहे हैं जहां ग्रामीणों को उस समय स्वास्थ्य सेवा की आवश्यकता होती है जब सरकारी नर्स या कम्पाउडर वहां उपलब्ध नहीं होता, ऐसे समय फर्जी डीग्रीधारी पहुंचकर अपना भरोसा जताकर ग्रामीणों का विश्वास जीत लेते हैं और अपने पैर पसार लेते हैं, किंतु झोलाछाप की दवा से महज ठीक होने वाला रोगी यह नहीं जानता कि उसे झोलाछाप द्वारा दी जा रही दवा की गुणवत्ता क्या है और जिस प्रकार की दवा वह दे रहा है उसे देने योग्य वह है भी या नहीं, और इसी कारण पूरे देशभर में सैकड़ो झोलाछाप डॉक्टर्स से लाखों रोगियों की मौतें अभी तक हो चुकी है। प्रदेश में चिकित्सकों की कमी के कारण नागरिको के साथ प्रदेश सरकार आसानी से छल, धोका, कर रही है, क्योंकि प्रदेशभर में झोलाछाप डॉक्टरों ने निशंकोच अपना जाल बिछा रखा है। गांव-गांव झोलाछाप डॉक्टर अपनी दुकानदारी लगाकर बैठे हैं, स्थानीय नेता की शह में और चिकित्सा क्षेत्र के जांच अधिकारी से सांठगांठ के चलते ग्रामीणों का उपचार अंदाज के अनुसार किया जाता है इस उपचार के दौरान अधिक डोज के कारण बहुत से रोगियों की मौत भी हो चुकी है, मगर फिर भी सरकार झोलाछाप डॉक्टरों के विरोध में कोई कड़े नियम कानून नहीं लेकर आती। नियमों के अनुसार देखा जाए तो एलौपैथी में एक डीग्री धारक वह डॉक्टर जिसे उपचार करने के लिए प्रमाणपत्र जारी किया जा चुका है वह एलौपैथी दवा दे सकता है साथ ही वहीं रोगियों को इंटरा मस्कुलर इंजेक्शन या इंटरा वेन में लगने वाली दवा की बोतल का प्रीस्क्रीप्शन लिख सकता है या दे सकता है। परंतु गांव-गांव फैले झोलाछापों द्वारा बिना किसी जांच रिपोर्ट के वेन के माध्यम से दवा की बोतल चढ़ाई जाती है और इंजेक्शन भी लगाया जाता है, जो कि नियमानुसार नियम का पालन नहीं करने पर अपराध की श्रेणी में आता है। सरकार के सामने फर्जी डॉक्टर नियमों को तोड़ते हुए प्रतिदिन अपराध पर अपराध करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार ने स्वास्थ्य विभाग में इस विषय को संज्ञान में लेते हुए कार्रवाई करने के लिए अधिकारी नियुक्त नहीं किया। जांच अधिकारी होने के बावजूद भी जिले के हर गांव में दो या दो से अधिक झोलाछाप फर्जी डॉक्टर अपनी जेनरिक दवा के अधिक डोज देकर नागरिको के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। प्रदेश के किसी भी जिले में जांच अधिकारी द्वारा नियमित कार्रवाई नहीं की जाती जब भी कभी कहीं किसी गांव में या झोलाछाप के क्लीनिक पर रोगी के साथ कोई अनहोनी हो जाती है तब जनता को दिखाने के लिए जिला कलेक्टर के आदेश पर कार्रवाई का बिगुल बजाया जाता है। जिस क्लीनीक पर या उसके द्वारा अनहोनी हुई उसे सील किया जाता है, कुछ सप्ताहभर दस से बारह झोलाछापों के स्थानों पर प्रशासन की टीम पहुंचती है और फिर मामला धीरे-धीरे शांत हो जाता है। यहां तक कि जिस झोलाछाप के द्वारा रोगी के साथ अनहोनी या उसकी मृत्यु हो जाती है वह फिर से अपनी दुकानदारी चालु भी कर लेता है।झोलाछापों के पास इतनी शक्ति इसीलिए आती है क्योंकि इनके विरुद्ध कोई कठोर कार्यवाही नहीं की जाती नियमों की अनदेखी जांच अधिकारी भी करते हैं और उसके बाद इनकी राजनीतिक पकड़ भी होती है। प्रदेश के प्रत्येक जिले में झोलाछाप डॉक्टर के दो या उससे अधिक गुट मिल जाएगे। मुख्यतः तो दो गुटों से झोलाछोपों का कार्य निकल जाता है। एक गुट का पूरा सपोर्ट पक्षधर सरकार वाली पार्टी के साथ होता है और दूसरे गुट का सपोर्ट विपक्ष के साथ होता है। जब भी कोई झोलाछाप किसी प्रकरण में फंसता है तब जिस पार्टी के सहयोग से कार्य पूरा हो सकता है उस पार्टी के सपोर्ट वाले गुट में उस अपराधिक झोलाछाप को सम्मिलित कर उसे प्रकरण से बार निकाला जाता है और उसी के बाद से वह भी पार्टी के किसी कार्यक्रम का दानदाता भी बन जाता है। कभी-कभी तो पार्टी उसे उसी गांव का कुछ पद देकर उसकी रक्षा में बाउंड्री भी बना देती है। यह सबकुछ सरकार की कमजोरी उसकी कमियों के कारण होता है क्योंकि सरकार का तंत्र या विमर्श पंगु और कमजोर होता है।

हालांकि, डॉक्टर्स की कमी की इस समस्या की प्रमाणिकता के लिए प्रदेश के किसी भी जिले के शासकिय चिकित्सालय में देखे, वहां डॉक्टर्स की कमी निसंदेह स्वतः दिख जाएगी। फिर विशेषज्ञों की कमी भी रोगियों के लिए भयंकर संकट है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मापदंडानुसार एक हजार जनसंख्या पर एक एलौपेथी डॉक्टर की उपलब्धता होनी चाहिए। प्रदेश में बीते विश्व स्वास्थ्य दिवस पर जारी रिपोर्ट में 1836 नागरिको पर सिर्फ एक एलोपैथी डॉक्टर उपलब्ध है। यदि मध्यप्रदेश को विश्व स्वास्थ्य संगठन का मापदंड पूरा करना पड़े तब 90 हजार डॉक्टर्स की आवश्यकता होगी। अर्थात 51 हजार डॉक्टर की और।

बहरहाल, विशेषज्ञ नहीं तो रोगी के रोग को समझने में समस्या होती है और इसी कारण उपचार के लिए रोगी को अन्यत्र स्थानों पर भटकता है। डाक्टरों की कमी को पूरा करने के साथ-साथ प्रदेश में फैले झोलाछाप फर्जी डॉक्टरों पर सरकार को नकेल कसनी होगी तभी नकली और जेनरिक दवा का काला बाजार खत्म किया जा सकेगा और असमय असामान्य उपचार से होने वाली लाखों मौतों पर भी नियंत्रण किया जा सकेगा। इसीलिए सरकार को अपने तंत्र को शक्तिशाली बनाकर प्राथमिक उपचार की सरकारी सुविधा कर नागरिको को अन्यत्र औषधी सेवन करने से बचाना होगा, जिससे रोगियों के बिमारियों के अलावा शरीर के दूसरे अंगों पर गंभीर और विपरित प्रभाव न पड़े।

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