30 सेकंड में 14,000 फीट नीचे – फिर भी बचीं 170 जानें: दुबई-तेल अवीव फ्लाइट में भारतीय संस्कृति और ‘मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है’ पाथेय की जीत।

डॉ बालाराम परमार
30 सितंबर, दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाय दुबई की फ्लाइट क्रमांक FZ1073। विमान में 170 यात्री सवार थे, कई देशों के नागरिक। सब कुछ सामान्य था, तभी 35 हजार फीट की ऊंचाई पर कॉकपिट से इमरजेंसी कोड 7500 बजा – यानी विमान में गैरकानूनी हस्तक्षेप।इजराइली अधिकारियों के अनुसार को-पायलट ने अपने ही कैप्टन, भारतीय मूल के कैप्टन स्मित मच्छार पर चाकू से हमला किया और विमान को चकनाचूर करने के उद्देश्य से नीचे गिराने लगा।
30 सेकंड में विमान 14 हजार फीट नीचे आ गया। यात्रियों को लगा कि जीवन का अंत निकट है। लेकिन अंत नहीं, एक नई कहानी शुरू हुई। यही कहानी बताती है कि ‘मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है’ और यह कहानी भारतीय संस्कृति और संस्कारों से जुड़ी है।एक यात्री लिटल शचाफ ने तेल अवीव पहुँचकर कहा, “यह चमत्कार था।” पर यह चमत्कार अचानक नहीं हुआ। इसे बनाया भारतीय संस्कारों ने, जो उस विमान में पायलट के रूप में मौजूद थे। *’स्वधर्मे निधनं श्रेयः’ – कर्तव्य से बड़ा कुछ नहीं।*घायल होने के बाद भी कैप्टन स्मित मच्छार ने ‘योक’ यानी विमान को कंट्रोल करने वाला स्टीयरिंग नहीं छोड़ा। हमारे शास्त्रों में कहा है – अपना धर्म निभाते हुए मरना भी श्रेष्ठ है। एक पायलट का धर्म है अपने यात्रियों की रक्षा करना, चाहे प्राण ही क्यों न देना पड़े।
51 वर्षीय पायलट ने खून से लथपथ होने के बावजूद विमान को संभाले रखा और इमरजेंसी सिग्नल भेजा। यह वही संस्कार है जो एक सैनिक को सीमा पर, एक डॉक्टर को ऑपरेशन थिएटर में और एक पायलट को कॉकपिट में लड़ना सिखाता है। प्राचीन काल से भारतीय परिवारों में सिखाया जाता है कि ‘कर्म ही पूजा है’। भारत माता के सुपुत्र पायलट स्मित ने वही किया।’वसुधैव कुटुम्बकम्’ – पूरा विश्व एक परिवार है।यह अवधारणा त्रेता और द्वापर युग से चली आ रही है। विमान में इजराइली, अरबी, भारतीय, यूरोपीय – सब थे। जब खतरा आया तो किसी ने नहीं पूछा कि कौन किस धर्म का है। केबिन क्रू ने हिम्मत दिखाकर दरवाजा खोला, कुछ जांबाज युवाओं ने अंदर घुसकर हमलावर को दबोचकर हाथ-पैर बांध दिए। यही वसुधैव कुटुम्बकम् है। भारत सदियों से सिखाता आया है कि मानवता सबसे बड़ा धर्म है।
और देखिए, विमान कहाँ उतरा? दुबई का विमान, भारतीय पायलट, क्रू मेंबर की सूझबूझ से नियंत्रित होकर सऊदी अरब के तबुक हवाई अड्डे पर सुरक्षित उतरा और फिर इजराइल में उसका स्वागत हुआ। यह अब्राहम समझौते – इजराइल और कई अरब देशों के बीच राजनयिक संबंधों को सामान्य बनाने के लिए अमेरिका की मध्यस्थता से सितंबर 2020 में हुआ ऐतिहासिक समझौता – के साथ ही भारतीय सोच की भी जीत है। भारत ही वह देश है जो इजराइल और अरब दोनों का मित्र है, क्योंकि हम दोस्ती में धर्म नहीं देखते।’परोपकारः पुण्याय’ – दूसरों के लिए जीना।उस फ्लाइट में दो और पायलट यात्री के रूप में सफर कर रहे थे। वे चाहते तो चुप बैठ सकते थे, पर वे दौड़े। उन्होंने कॉकपिट संभाला और विमान को सुरक्षित उतारा। यह भारतीय संस्कृति के अनुरूप ‘निस्वार्थ सेवा’ भाव है।
गीता में कहा है – कर्म करो, फल की चिंता मत करो। उन पायलटों ने बिना किसी ड्यूटी के अपना धर्म निभाया।’अतिथि देवो भवः’ की झलक मिलती है।सऊदी अरब के तबुक एयरपोर्ट पर जब विमान उतरा, तो सऊदी अधिकारियों ने सभी यात्रियों के लिए पानी, भोजन और चिकित्सा की मुस्तैदी से व्यवस्था की। इजराइल ने अपने नागरिकों को वापस लाने के लिए तुरंत दूसरा विमान भेजा। यह अतिथि सत्कार भारतीय संस्कृति का मूल है।इस घटना से हमें क्या सीखना चाहिए?आज जब दुनिया धर्म और नस्ल के नाम पर बंट रही है, यह घटना बताती है कि संकट में सिर्फ एक पहचान बचती है – इंसानियत। भारतीय संस्कृति कभी नहीं सिखाती कि बदले में क्या मिलेगा, वह सिखाती है कि सही क्या है।
इसलिए आम जनता के सामने इस खबर को सनसनी के रूप में नहीं, संस्कार के रूप में रखिए।अब वक्त आ गया है कि दुनिया के लोगों को कैप्टन स्मित मच्छार जैसा बनने की प्रेरणा दी जाए – जिसने अपनी जान की परवाह किए बिना सबसे पहले 170 जानों की सुरक्षा के बारे में सोचा। मौत के डर के समय हीरो वह नहीं जो ताकतवर है, हीरो वह है जो दूसरों के लिए मरने तक खड़ा होता है।फ्लाय दुबई विमान में घटित इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना और नापाक इरादों वाले सह-पायलट के सामाजिक और राजनीतिक संबंधों की जांच जारी है। को-पायलट का मकसद क्या था, यह आधिकारिक रिपोर्ट आने पर ही पता चलेगा। तब तक हमें अफवाहों से बचना है। भारतीय विदेश मंत्रालय भी स्थिति पर नजर रखे हुए है।लेकिन इतना तय है कि को-पायलट का इरादा नापाक था। यह घटनाक्रम 14 हजार फीट नीचे गिरने की नहीं है। यह उस भारतीय संस्कृति के विचार की कहानी है जो गिरते हुए को भी थाम लेता है। 30 सेकंड में विमान गिरा, पर हजारों साल पुराने संस्कारों ने उसे फिर से उठा लिया।
यही भारत है, यही भारतीय संस्कृति और सभ्यता है। इस घटना को याद करते हुए बार-बार मन में आता है कि हमारे पूर्वजों ने जो कहावत गढ़ी थी – ‘मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है’- वह बहुत सोच-समझकर परोपकार के लिए ही गढ़ी गई थी।