जिंदगी जिएं मर्यादा पुरुषोत्तम के आदर्शों पर।

बालाराम परमार ‘हँसमुख’

मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सो दसरथ अजिर बिहारी॥ धर्म न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना॥

आज माह अक्टूबर की 20 तारीख है। वर्ष है 2026 और विक्रम संवत 2083, आश्विन मास शुक्ल पक्ष दशमी, विजयादशमी। आज का दिन जंबूद्वीपे, भरतखंडे में कैलेंडर का एक पन्ना नहीं, सनातन धर्म और संस्कृति की आत्मा का आईना है। यह मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के रामराज्य के सिंहावलोकन का दिन है। भारत के साथ ही समूचे विश्व में जहाँ-जहाँ भारतीयता का दिया जला, वहाँ आज दशहरा मनाया जा रहा है।

पर दशहरा क्या है? क्या केवल बुराई के प्रतीक रावण के पुतले का दहन? क्या केवल दशहरा मैदान में आयोजित मेले में जाकर मूंगफली खाना और घर आ जाना? नहीं। दशहरा एक प्रश्न है जो हर साल हमसे पूछता है कि यह त्योहार सदियों से क्यों मनाया जाता रहा है और हर साल हम नई पीढ़ी को अनुत्तरित लौटा देते हैं।

हम सब बचपन से सुनते आए हैं कि रावण बुराई का प्रतीक है। उसने सीता का हरण किया और राम ने उसका वध किया। बात खत्म। पर क्या इतनी सरल है रामायण और रामचरितमानस? अगर रावण केवल सीता हरण का अपराधी था तो उसे इतना बड़ा खलनायक क्यों बनाया गया? उसके दस सिरों का रहस्य क्या है?

वास्तव में रावण एक प्रवृत्ति का नाम है। वह अहंकार से भरा हुआ था। उसे लगता था – मैं ही ब्रह्मा हूँ, मैं ही ज्ञानी हूँ, मैं ही शक्तिशाली हूँ। वह अपने से छोटों को कभी बराबरी का दर्जा नहीं देता था। उसके दरबार में अपनी पत्नी मंदोदरी, भाई विभीषण और कुंभकर्ण, बहन शूर्पणखा तक के लिए सम्मानजनक जगह नहीं थी, तो प्रजा की क्या बात? उसके मन में सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास जैसे मानवीय गुण नहीं थे। रघुकुल रीत सदा चली आई। प्राण जाए पर वचन न जाई।। की भावना से प्रजा को खुशहाल देखने की अभिलाषा नहीं थी, केवल अभिमान और राज्य हड़पने की अभिलाषा थी। वह भोजन भी गरिष्ठ करता था, भोग में डूबा रहता था और बहुत ज्यादा समय निद्रा और विलासिता में बिताया करता था। छल और कपट उसकी प्रवृत्ति थी।

अब हम 21 वीं सदी के 26 वें वर्ष के दशहरे के रावण दहन पर ईमानदारी से अपने दिल पर हाथ रखकर सोचें, क्या श्रीलंका का रावण मर गया है? क्या यह रावण केवल लंका में था? नहीं, यह रावण आज हमारी गली में, हमारे मोहल्ले में, हमारे ऑफिस में, हमारे व्हाट्सएप ग्रुप में और इससे भी ज्यादा हमारे अपने भीतर विद्यमान है। आज का रावण अंग्रेजी बोलता है, कोट-पैंट पहनता है। वह सोशल मीडिया पर ज्ञान देता है, पर पड़ोसी की मदद नहीं करता। वह अहंकार में कहता है – मेरी जाति ऊँची है, मेरा वर्ण- समाज उंचा है, मेरा नेता महान है। वह छोटों को बराबरी का दर्जा नहीं देता। वह अपने घर काम करने वाली बाई को, गाड़ी चलाने वाले ड्राइवर को, कचरा उठाने वाले भाई को इंसान नहीं समझता। उसके पास संविधान वर्णित बराबरी का नारा तो है , पर मन साफ़ नहीं है। मन में विश्वास नहीं है। वह भी गरिष्ठ भोजन करता है – शरीर के लिए फास्ट फूड और मन के लिए नफरत भरे वीडियो। वह भी दिन में 8 घंटे मोबाइल के नशे में धुत्त रहता है। आज का इंसान जीवन भर अपनों से छल-कपट करता है और दूसरे की संपत्ति को हड़पने की सोचता है।

तो फिर हम किस रावण को जलाने जा रहे हैं? मिट्टी और कागज के पुतले को? या फिर उस रावण को जो 21वीं सदी में देश-देशांतर में फैला हुआ है? आज के दिन राष्ट्र और समाज हित में हमें सोचना होगा कि रावण दहन करने से क्या हमारे अंदर का अहंकार खत्म हो जाता है? लंका दहन से क्या हमारे अंदर माँ-बहनों के प्रति श्रद्धा और भक्ति जागृत होगी? क्या हम अपने सनातन भाइयों को बराबरी का दर्जा दे रहे हैं? क्या हमारा सादा भोजन और सादा विचार है? क्या हमारे अंतर्मन में वासना नहीं है? क्या हम अपने आस-पड़ोस को साथ सुकून की जिंदगी जीने दे रहे हैं? क्या हम अपना और अपने परिवार का भविष्य उज्जवल बनाने के लिए जितने श्रम और धर्म की जरूरत है उतना कर रहे हैं? ये उभरते कुछ सवाल हैं जिनका उत्तर हमें अपने अंतर्मन से नई पीढ़ी को देना है। क्योंकि नई पीढ़ी हमसे प्रवचन नहीं, प्रमाण मांगती है। वह कहती है – आप राम की बात करते हो, पर आप राम की तरह जीते क्यों नहीं?वास्तव में हमारी जिंदगी में वह नहीं हो रहा है जो होना चाहिए। हम राम को मंदिर में पूजते हैं, पर रावण को दिल में पालते हैं। हमें हमारे अंदर के रावण का दहन करना होगा। अपने विचारों में पवित्रता लानी चाहिए। परिवार का भविष्य उज्जवल हो ऐसी करनी करनी होगी। परिवार, समाज, राष्ट्र और मानव जीवन में पनप रही बुराइयों की पहचान करनी चाहिए और दशहरे पर उसका दहन करना चाहिए।

आज राजनीति में जातिवाद, वर्णवाद, वर्गवाद, भाई-भतीजावाद और परिवारवाद का प्रदूषण फैल रहा है। यह प्रदूषण दिल्ली से नहीं आता, यह हमारे गाँव की चौपाल से शुरू होता है। जब हम योग्य व्यक्ति की जगह अपने जात वाले को चुनते हैं, तब हम रावण को वोट देते हैं। समाज और राष्ट्र में अनेक अलगाववादी ताकतें फन फैला रही हैं। ये अलगाववादी ताकतें हमारे आसपास गली-मोहल्ले में ही पनप रही हैं। ये ताकतें कहती हैं – तू अलग है, तू बड़ा है, तू इनसे मत मिल। आज रावण दहन करने तो जाएं, लेकिन अपने अंदर के रावण को रास्ते में ही दहन कर दें। समाज, राष्ट्र और हमारा सनातन परिवार दुआएं देगा।

अब दूसरा पक्ष देखिए – भगवान श्रीराम अच्छाई के प्रतीक हैं। राम को समझना बहुत आसान है और बहुत कठिन भी। आसान इसलिए कि राम ने मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में वे सभी किरदार निभाए जो एक राजा के लिए त्रेता युग में जरूरी थे। वे रोए, वे थके, वे वन में भटके, वे मनुष्य की तरह जिए। कठिन इसलिए कि मनुष्य होकर भी उन्होंने मर्यादा नहीं छोड़ी। अयोध्या के राजा राम ने बताया कि भाई-भाई को कैसा रहना चाहिए। आज जब एक इंच जमीन के लिए भाई भाई का गला काट रहा है, वहाँ भरत जैसा भाई चाहिए जो कहे – यह राज्य मेरा नहीं, मेरे बड़े भाई की अमानत है। राम ने बताया कि माता-पिता की आज्ञा पालन करने में राजपाट त्यागने पर भी संकोच नहीं करना चाहिए। आज के युवा को माता-पिता टोकें तो वह घर छोड़ देता है, राम घर छोड़कर भी माता-पिता की बात रखते हैं। राम ने बताया कि प्रजा की खुशहाली का ध्यान रखना चाहिए। एक धोबी के कहने पर उन्होंने अपनी पत्नी तक का त्याग कर दिया – इसलिए नहीं कि वे कठोर थे, इसलिए कि वे राजा थे। राजा का धर्म परिवार से बड़ा होता है। सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास जीतना चाहिए, यह नारा नहीं, राम का आचरण था।रामचरितमानस में सीता का वर्णन एक अद्भुत एवं अप्रतिम नारी के रूप में हुआ है। मातृशक्ति को सीता जी के चरित्र को जीवन में उतारने पर मंथन करना चाहिए। आज नारी सशक्तिकरण की बात होती है। सीता से बड़ी सशक्त नारी कौन होगी? जो सोने की लंका में अकेली, बिना किसी सेना के, रावण जैसे महा-शक्तिशाली व्यक्ति को तिनके की आड़ से रोक दे और कह डाला- खबरदार! जो मुझे छुआ।

आज बहुत कम नारियां हैं जो सीता जी की तरह दुःख में अपने पति का साथ देती हैं? बहुत कम ऐसी नारियां हैं जो लोक-लाज और मान-मर्यादा को दहलीज के बाहर नहीं जाने देतीं? ऐसी बहुत कम नारियां हैं जो लव-कुश, प्रहलाद, ध्रुव और नचिकेता को जन्म देकर हिंदू धर्म के आराध्य भगवान राम की मर्यादा में चार चाँद लगा देती हैं। आज हमें ऐसी माताओं की जरूरत है जो बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर ही नहीं, बल्कि राम जैसा चरित्रवान बनाए।

रामायण में वर्णित भगवान राम और माता सीता, भाई लक्ष्मण और भरत ये एक जीवन जीने की शैली प्रदान करते हैं। इसीलिए वचन के पालनकर्ता को एक आदर्श परिवार माना जाता है। रामायण का एक-एक चरित्र संपूर्ण मानवता के लिए शांतिदूत बनकर सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन जीने का तौर-तरीका सिखाता है। 21वीं सदी के वैज्ञानिक युग में राम की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। हमारे पास ब्रह्मास्त्र से भी बड़ा अस्त्र है – मोबाइल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। रावण के पास भी विज्ञान था, पुष्पक विमान था। पर उसके पास मर्यादा नहीं थी। राम के पास विज्ञान भी था और मर्यादा भी। इसलिए आज हमें विज्ञान के साथ मर्यादा की जरूरत है। सभी साथियों और युवा पीढ़ी से वही बात कहना है कि जी सको तो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की तरह जीयो।हमने अयोध्या में राम का भव्य मंदिर तो बना दिया। हमने पत्थर में प्राण प्रतिष्ठा कर दी। अब समय है अपने आचरण में राम की प्राण प्रतिष्ठा करने का। अयोध्या में दिया जलाना आसान है, अपने भीतर के अहंकार, नफरत और वासना के अंधेरे में दिया जलाना कठिन है।भारत और विश्व के लिए आज दशहरे का त्योहार विचार-मंथन का दिन है कि हम राम की तरह जिंदगी जिएं और राम की तरह परिवार और राष्ट्र का विकास करें। इस विजयादशमी पर हम पुतला नहीं, प्रवृत्ति जलाएं। हम शोर नहीं, शील अपनाएं।हो सके तो ऐ सखे, राम की तरह जी सखे।

पथ-प्रदर्शक है श्री राम।

डॉ. बालाराम परमार ‘हँसमुख’ सेवानिवृत्त प्राचार्य, केंद्रीय विद्यालय संगठन

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