सनातन में स्वतंत्रता का समावेश।
आओ आप और हम शास्त्रार्थ करें, तर्क पर तथ्यों को सत्यता के साथ स्थापित करें। ऐसा दो महान ज्ञानियों के मध्य बहुत लंबा शास्त्रार्थ हुआ था जिसकी न्यायमूर्ति वह महिला थी जो कि एक गृहणी थी। जो लोग कहते है कि भारतीय संस्कृति में महिलाओं को सम्मान नहीं दिया जाता उनको उच्च पद पर नियुक्त नहीं किया जाता और महिलाओं को अध्ययन से दूर रखा जाता है उन्हें इतिहास कुछ पढ़ लेना चाहिए। खैर हमारा विषय कुछ और ही है तो उपरोक्त लिखी इस बात को बताया जाना इसलिए आवश्यक है कि सनातन में ऐसा नहीं है कि जो लिख दिया उसे पत्थर की लकीर समझ कर वो ही किया जाए। सनातन में तो उस बात पर बहस करने अपने उच्च विचारों को प्रकट करने की पूर्ण अनुमति होती है फिर उस विषय पर सुविधाजनक और सरलता से कैसे उसे मानव सेवा और मानव जीवन को उच्च स्तर पर ले जाया जा सकता है उसकी महत्ता होती हैं ऐसा विचारों को भी प्रभाव में लाया जाता है। यहां कोई एक पुस्तक नहीं जिसकी रीति नीति पर नाक की सीध में चला जा सके, यहां तो अनेक ग्रंथ, उपनिषद, वेद है जिनका अध्ययन कर हम स्वयं द्वारा उस परम ज्ञान की व्याख्या कर सकते हैं और अपने स्तर के सुगम सरल मार्ग को चुन कर दिव्यता को पा सकते हैं। सनातन में स्वतंत्रता इसी बात की है कि यहां किसी एक मार्ग को ही सत्य बता कर उस पर चला नहीं जाता यहां अनेक पथ है जिस पर चलते हुए ज्ञान की प्राप्ति होती है और जीवन को उच्च स्तरीय स्थिति में रखते हुए परम वैभव की प्राप्ति होती है। सनातन को समझना ऐसा नहीं कि बहुत कठिन कार्य है हमें बस शुरुआत करने की आवश्यकता होती है। जब जहा से शुरू करेंगे ज्ञान की प्राप्ति होना प्रारम्भ होती जाएगी।