भांजगड़ी प्रथा में उलझा जनजाति समाज- सच्चाई से दूर लाभ उठाती पुलिस, भांजगड़िये और भ्रष्टाचारी अपराधी।

रिंकेश बैरागी,

भांजगड़ी प्रथा जनजाति समाज के लिए एक ऐसा घाव है जो उसे धीरे धीरे कमजोर करते हुए भ्रष्ट और अपराधिक प्रवृत्ति वाला बना रहा है। जनजाति क्षेत्र के गांव में किसी भी प्रकरण का मामला पुलिस के पास जाता जरुर है किंतु उस मामले की सुनवाई भांजगड़ियों द्वारा लेन की प्रक्रिया के साथ होती है जिसमें पुलिस का बराबर हिस्सा होता है, क्योंकि लेनदेन की प्रक्रिया, उसकी बातचित सभी कुछ पुलिस के सामने की जाती है। अगर बातचित में कोई समस्या रहती है तब शक्तिशाली पक्ष एफआईआर करवाने की धमकी के साथ पुलिस से भी जोर लगवाता है और पुलिस अपनी जेब भरने के चक्कर में भांजगड़िए की सुनकर उसके अनुरुप काम करने लगती है। मामले को दबाने के लिए मुंह मांगी रकम तय होती है, यह रकम हजारों से शुरु होकर लाख तक पहुंच जाती है, जिसका कोई रिकार्ड किसी के पास नहीं होता कि एक पक्ष द्वारा दी गई रकम कब किसकी झोली में समा गई। वहीं दूसरे पक्ष से भी उसी प्रकार तय की गई राशि का बंटवारा होता है। हालांकि यह स्थिति जनजाति क्षेत्र में ही फलफुल नहीं रही बल्कि पूरे प्रदेशभर और देशभर में इस प्रथा ने अपनी जड़े शक्तिशाली कर ली है, परंतु जनजाति क्षेत्र में इसका प्रकोप बहुत ज्यादा है। छोटे से छोटे केस में ग्रामीण को 40 से 50 हजार की हानि हो जाती है। यह सिर्फ भांजगड़ियों के साथ मिली हुई पुलिस के लोभ लालच के कारण होता है। भांजगड़ियों के कहने पर पुलिस भोलेभाले ग्रामीणों को एफआईआर का डर बताकर कोर्ट के चक्कर और जेल जाने तक की बात से भयभीत करते हैं, और गलती में नहीं होने के बाद भी कुछेक प्रकरणों में ग्रामीणों को दूसरे पक्ष और पुलिस को समझौते के नाम पर मांगी गई राशि देनी पड़ती है। वर्तमान में नियमों के उल्लघंन से लगाकर मारपीट, चोरी चकारी और अन्य अपराधों को करने में किसी को संकोच नहीं होता है यदि ग्रामीणों से अपराध हो गया तो उन्हें पता है कि किए गए अपराध का पैसा देना होगा और मामला वहीं का वहीं दबा दिया जाएगा। न किसी प्रकार की कोई रिपोर्ट होगी न ही किसी को अपराधी बनाया जाएगा।

इस भांजगड़ी प्रथा के चलते लोग पैसो के मारे पिसाते भी है, एक बड़ी रकम भांजगड़ियों को देनी होती है, और बहुत से लोगों के मन से डर खत्म हो जाता है, क्योंकि वो लोग इस बात को समझ जाते हैं कि अगर किसी प्रकार का कोई अपराध हो गया तब दूसरे पक्ष को भांजगड़िए और पुलिस का पैसा देना होगा। इसी प्रकार जब कोई विवादित स्थिति सामने आती है तब वह लोग उस स्थिति को सामान्य नहीं करते अपितु अपने अहम आकर में अपराध कर देते हैं। अपने लालच में पुलिस खाकी की शक्ति का उपयोग कर इस पुरे क्रम को देखते रहते हैं और जब स्थिति उनसे बाहर की दिखाई देती है तब वह अपनी जान बचाने के लिए नियमों का उपयोग करते हैं। जनजाति क्षेत्र में आए दिन विवाद, जमीनी लड़ाई, मारपिट, दुर्घटना, प्रेम प्रसंग में घर से भागे हुए लड़का- लड़की के प्रकरण की अधिकता रहती है। इन सभी प्रकरणों के अपने-अपने क्षेत्र के अनुसार समझौते की राशि निर्धारित होती है, और भांजगड़ियों की बातचित भी पुलिस से बराबर की होती रहती है किसी प्रकरण में कोई पैसा देने में दुरी कर रहा है या कोई और कारण फंसता है तब पुलिस सीधे एफआईआर की बात करती है और मामले को सुलझाने में समय लगाती है। अगर किसी पक्ष की किसी बड़े नेता या किसी अधिकारी से पहचान होती है तब भी मामला उतना जल्दी नहीं सुलझ पाता जितना जल्दी उसे एक भांजगड़िया सुलझा लेता है।

पुलिस और भांजगड़ियों को दोनों पक्षों से लाभ की प्राप्ति होती है, अब अगर इस मध्यस्थता वाले खेल को खत्म करना है तो पुलिस को आगे कदम बढ़ाना होगा और समझौते के लिए भांजगड़िए को न चुनते हुए न्यायालय को प्राथमिकता देना होगी। इस पहल से अपराध करने वाले के मन में कानून का भय आएगा और जिनसे अनजाने में अपराध हुआ होता है वे अगली बार अपराध करने से बचेगे। भांजगड़िए द्वारा समझौता करवाने पर लाभ सिर्फ पुलिस और भांजगड़िए को ही होता है, और उस समझौते में समझाइश भी नहीं होती है कि दोनों पक्ष अगली बार कोई गलती नहीं करेगा। फिर समझाइश का दौर चल भी नहीं सकता क्योंकि जब दोनों पक्ष पैसा दे रहे हैं तो वे क्यों किसी की सुनेगे। इसीलिए समस्या का समाधान यह है कि यदि कोई अपराध हुआ है और उसमें दोनों पक्ष आपसी समझौता चाहते है तो वे न्यायालय की शरण ले।

इस प्रथा में भी अपने लोग ही अपनो को लूट रहे हैं। गांव का भांजगड़िया कोई और नहीं होकर गांव का तड़वी, पटेल या सरपंच या फिर मुखिया ही होता है। भांजगड़ियां गांव का ही होता है इसीलिए उसे सभी के नाम, उनका स्तर पता होता है और वह अपने लालच में पुलिस को बताता है कि पैसे की डिमांड का प्रारुप क्या होता है।एक साधारण सी दुर्घटना के केस को न्यायालय के माध्यम से करने पर भी पुलिस ने अपने काम करने के अधिकार की मेहनत को मांग लिया। इसी तरह हर विभाग में स्थिति ऐसी ही है, पैसा फैको तमाशा देखो। अपना काम करवाने के लिए सभी को पैसा देने पड़ता है। राजस्व विभाग द्वारा तहसील कार्यालय का छोटा कर्मचारी भी भूमी को नापने के लिए खर्चा पानी लेता है। बहरहाल, यह पैसा दिखाई नहीं देता, कहा से आता है किसके पास रुकता है वहां से कहां चला जाता है इसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं रहता। राज तो उस समय खुलते हैं जब किसी के पास पहुंचने वाली राशि में गड़बड़ी हो जाती है और फिर एक के बाद एक मामले सामने आते जाते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए समाज का उद्धार करने वालों को सामने आ कर समझाइश देना होगी कि, गलत कार्यों से बचो, अपराध करने से बचो, यदि अज्ञानतावश हो जाए तो न्यायालय की शरण ली जाए।

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