श्राद्ध एवं पितृपक्ष””श्रद्धा, शास्त्र और विज्ञान का अद्भुत संवाद

*बांगरू-बाण*श्रीपाद अवधूत की कलम से

*””*हम पितृपक्ष क्यों मनाते हैं? तर्पण में जल क्यों दिया जाता है?पिण्ड क्यों बनाया जाता है? पितरों का संबंध चन्द्रमा से क्यों जोड़ा गया? और सबसे महत्वपूर्ण क्या श्राद्ध केवल एक धार्मिक कर्मकाण्ड है, या इसके पीछे मनुष्य, प्रकृति, परिवार और ब्रह्माण्ड को जोड़ने वाली कोई गहरी भारतीय दृष्टि भी है?

इन प्रश्नों का उत्तर केवल एक कोण से नहीं मिलता। इसके लिए वेद, ब्राह्मण ग्रंथ, उपनिषद, पुराण और भारतीय खगोलीय परंपरा सभी के समन्वित ज्ञान का‌ तार्किक वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने पर मिलता है।*1. हम पितृपक्ष क्यों मनाते हैं?*सर्वप्रथम समझते हैं कि श्राद्ध का मूल क्या है? ‘श्राद्ध’ शब्द श्रद्धा से बना है अर्थात् श्रद्धापूर्वक किया गया कर्म ही श्राद्ध है। यह केवल मृत व्यक्ति के लिए किया जाने वाला अनुष्ठान नहीं है, बल्कि अपने अस्तित्व के पीछे खड़ी पूर्वज-परंपरा के प्रति कृतज्ञता का संस्कार है।*तैत्तिरीय आरण्यक* के अनुसार*“देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्।**मातृदेवो भव।

पितृदेवो भव।”*अर्थात् *देवकार्य और पितृकार्य में प्रमाद मत करो माता को देवतुल्य मानो, पिता को देवतुल्य मानो।* यहाँ पितृ-स्मरण केवल मृत्यु के बाद की व्यवस्था नहीं है। यह जीवित मनुष्य को यह स्मरण कराता है कि “मैं अकेला नहीं हूँ। मेरे भीतर अनेक पीढ़ियों का जीवन, संस्कार, परिश्रम और त्याग प्रवाहित है।” हमारा शरीर हमें अपने माता-पिता से मिला है। अपने माता-पिता को उनके माता-पिता से मिला है और यह जीवन-परंपरा अनगिनत पीढ़ियों तक पीछे जाती है इसलिए पितरों के प्रति कृतज्ञता केवल भावुकता नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का अंग है।

*तैत्तिरीय उपनिषद्* कहता है*“श्रद्धया देयम्। अश्रद्धयाऽदेयम्।”*अर्थात् *श्रद्धा से देना चाहिए अश्रद्धा से नहीं।* यही ‘श्रद्धा’ आगे चलकर श्राद्ध का आधार बनी है। श्राद्ध की जड़ें वैदिक हैं। वैदिक साहित्य में *पितृमेध (अंत्येष्टि कर्म)और पितरों से संबंधित यज्ञीय परंपराओं के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। *यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता* में पितृमेध सहित अनेक यज्ञों का उल्लेख मिलता है।*अथर्ववेद के पितृमेध सूक्त* में तो यम, सोम, अग्नि और पूर्वजों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।*“यमाय सोमः पवते यमाय क्रियते हविः। यमं ह यज्ञो गच्छत्यग्निदूतोऽरंकृतः॥”*भावार्थ *“यम के लिए सोम प्रवाहित होता है, यम के लिए हवि अर्पित की जाती है। अग्नि को दूत बनाकर सजाया गया यज्ञ यम के पास पहुँचता है।”*

वैदिक ऋषि यहाँ यम को मृत्युलोक के मार्गदर्शक और पितरों से जुड़े देवता के रूप में स्मरण करते हैं। यज्ञ में सोम और हवि अर्पित करके अग्नि को माध्यम बनाया जाता है, ताकि यह अर्पण यम और पितृलोक तक पहुँचे। इसे आज की आधुनिक भाषा में समझें तो “अग्नि माध्यम है, आहुति संदेश है और यम उस दिव्य व्यवस्था के अधिष्ठाता हैं, जिसके माध्यम से मनुष्य अपने पितरों से संबंध स्थापित करता है।” *“इदं नम ऋषिभ्यः पूर्वजेभ्यः पूर्वेभ्यः पथिकृद्भ्यः।”*अर्थात् *पूर्वजों और उन प्राचीन पथ-प्रदर्शकों को नमन हैं।

*इससे स्पष्ट है कि पितृ-स्मरण, यज्ञ और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता वैदिक परंपरा के अत्यंत प्राचीन अंग हैं। *2. तर्पण क्या है? और तर्पण में जल क्यों दिया जाता है?* *तर्पण का अर्थ* तर्पण शब्द संस्कृत की ‘तृप्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है तृप्त करना, संतुष्ट करना, प्रसन्न करना। संस्कृत कोशों में तर्पण का अर्थ तृप्ति, संतोष तथा पितरों को जल अर्पित करने की क्रिया को दिया गया है। अर्थात श्राद्ध वाले दिन यजमान अपने दाहिने हाथ में जल लेकर अपने पूर्वजों की स्मृति में जल अर्पण करता है उसे ही तर्पण कहा गया है।*मनुस्मृति* के अनुसार*“पितृयज्ञस्तु तर्पणम्।”*अर्थात् पितृयज्ञ ही तर्पण है। (मनुस्मृति 3.70) अर्थात् तर्पण कोई गौण कर्म नहीं, बल्कि पितृयज्ञ का एक मूल स्वरूप है।

*तर्पण में जल ही क्यों?* जल जीवन का मूल आधार है। मनुष्य का शरीर, अन्न, वनस्पति, कृषि सब जल पर निर्भर हैं। इसलिए जब हम पितरों को जल अर्पित करते हैं, तो उसका गहरा प्रतीकात्मक अर्थ यह है कि “जिस जल से यह जीवन-धारा चल रही है, उसी जीवन-तत्व को मैं अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञतापूर्वक समर्पित करता हूँ।” धर्मशास्त्रीय परंपरा में भी जल स्वयं तर्पण का निर्धारित माध्यम है।

*मनुस्मृति 3.283* में कहा गया है कि स्नान के बाद जल द्वारा पितरों को तृप्त करने से पितृयज्ञ का फल प्राप्त होता है। *ब्रह्माण्ड पुराण* में कहा गया है कि *“तर्पणं तोयमात्रेण…”* अर्थात् *”तर्पण जल मात्र से किया जाता है,* और उसके द्वारा यहाँ तथा परलोक दोनों के लिए तृप्ति प्राप्त होती है। *जल की प्रकृति इस प्रकार है।*

*प्रवाह → धारण → पोषण → जीवन। जल स्वयं किसी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहता। वह चक्र बनाता है। समुद्र → वाष्प → बादल → वर्षा → नदी → अन्न → जीव → पुनः जल। आधुनिक विज्ञान इसे जलचक्र (Water Cycle) कहता है।*

भारतीय ऋषि इस प्राकृतिक चक्र को केवल भौतिक प्रक्रिया के रूप में नहीं देखते थे; उनके लिए जल जीवन की निरंतरता का प्रतीक है।इसलिए पितरों को जल देना मानो यह कहना है कि “हमारे पूर्वजों की जीवन-धारा समाप्त नहीं हुई वह हमारे माध्यम से आगे प्रवाहित हो रही है।” तर्पण करते समय नाम और गोत्र बोलते हैं? इसका सबसे महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक पक्ष है यह है कि जब हम कहते हैं

*“अमुक गोत्रस्य अमुकस्य पितुः…”*तो हम केवल कोई मंत्र नहीं बोल रहे होते अपितु हम एक विशिष्ट व्यक्ति को स्मृति में पुनः उपस्थित कर रहे होते हैं।*नाम → व्यक्ति की स्मृति**गोत्र → वंश की स्मृति**जल → जीवन का प्रतीक**संकल्प → कृतज्ञता का भाव**इसलिए तर्पण वास्तव में वंश-स्मृति का संस्कार भी है।*

श्राद्ध मृत्यु उपरांत आत्मा के गमन जिसे संस्कृत में प्रैति कहते हैं से जुड़ा हुआ है। प्रैति ही बाद में बोलचाल में प्रेत बन गया। इसमें कोई भूत-प्रेत वाली बात नहीं है। हमारे शरीर में आत्मा के अतिरिक्त मन और प्राण हैं। आत्मा तो कहीं नहीं जाती, वह तो सर्वव्यापक है।* *कबीर दास जी ने बहुत ही सुंदर उदाहरण देकर समझाया है।* *जल में कुम्भ कुम्भ में जल है, बाहर भीतर पानी।* *फूटा कुंभ जल जल ही समाया, यही तथ्य कथ्यो ज्ञानी ।।*शरीर की मृत्यु के बाद जो शरीर के अंदर की आत्मा है वह उस परमात्मा में लीन हो जाती है। ठीक उसी तरह जिस तरह घड़े के बाहर और अंदर पानी होता है। घड़ा के फूटने पर जल का विलयन जल में ही हो जाता है।

मृत्यु के समय शरीर से जब मन को निकलना होता है तब वह प्राण को साथ लेकर निकलता है। ऐसा मानते हैं कि प्राण को शरीर से मोह रहता है। इसके कारण वह शरीर के आस पास ही घूमता रहता है कहीं जाता नहीं हैं। शरीर को जब नष्ट किया जाता है। उस समय प्राण मन को लेकर चलता है। *मन* *“चंद्रमा मनस: लीयते”* यानि मन चंद्रमा से आता है। *“चंद्रमा मनसो जात:”* यानि मन ही चंद्रमा का कारक है। इसलिए जब मन खराब होता है तो उसे व्यक्ति में पागलपन चढ़ता है, उसे *अंग्रेजी में ल्यूनैटिक* कहते हैं। ल्यूनार का अर्थ चंद्रमा होता है और इससे ही ल्यूनैटिक शब्द बना है। हृदयाघात जैसी समस्याएं पूर्णिमा के दिन अधिक होती हैं। एक शोध से यह भी पता चला है कि दुर्घटनाएं और आत्महत्याएं सबसे अधिक पूर्णिमा या अमावस्या के दिन ही होती हैं जिसका संबंध भी मन से ही निकलता है। आयुर्वेद में बताया गया है कि जो अन्न हम खाते हैं। उससे रस बनता है। रस से रक्त बनता है। रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से मज्जा और मज्जा के बाद अस्थि बनती है। अस्थि के बाद वीर्य बनता है। वीर्य से ओज बनता है। ओज से मन बनता है। इस प्रकार चंद्रमा से ही मन बनता है।

हिंदी में कहावत भी है *“जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन।”*मन जब जाएगा तो उसकी यात्रा चंद्रमा तक की होगी। दाह संस्कार के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होगा, मन उसी ओर अग्रसर होगा। प्राण मन को उस ओर ले जाएगा। यहां प्राण कैरियर अर्थात वाहक का कार्य करता है। चंद्रमा को पृथ्वी का एक चक्कर लगाने में 28 दिन लगते हैं अर्थात जिस स्थान से वह घूमने आरंभ करता है उसी स्थान पर आने में उसे 28 दिन लगते हैं। इसका जो घूर्णन कक्ष है वह 27 नक्षत्र में विभक्त है। अर्थात 27 दिनों के अपने चक्र में चंद्रमा 27 नक्षत्र में घूमता है। इसलिए चंद्रमा घूमकर 28वें दिन फिर से उसी नक्षत्र में आ जाता है। मन की यह यात्रा भी 28 दिन की होती है। इन 28 दिनों तक मन की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए ही श्राद्धों की व्यवस्था की गई है।

अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले जितने भी यान होते हैं उन यानो को अपने गंतव्य तक पहुंचाने के लिए जिस ऊर्जा की आवश्यकता होती है वह ऊर्जा अलग-अलग चैंबर बनाकर यान के साथ ही प्रेषित की जाती है।चूंकि यह मूर्त अवस्था में जाता है इसलिए यह व्यवस्था भी मूर्त या भौतिक रूप से की जाती है लेकिन मन यह अमूर्त है इसलिए इसकी व्यवस्थाएं भी अमूर्त रूप से की जाती हैं लेकिन प्रणाली एक ही प्रकार की होती है और यही व्यवस्था हमें श्राद्ध कर्म में देखने को मिलती है। यहां चंद्रमा सोम का भी कारक है। इसलिए उसे सोम भी कहते हैं। सोमतत्व सबसे अधिक चावल में होता है। धान हमेशा पानी में डूबा रहता है। सोम तरल होता है। इसलिए पके चावल का पिंड बनाते हैं। तिल और जौ भी इसमें मिलाते हैं। इसमें पानी मिलाते हैं, घी भी मिलाते हैं। इन पदार्थों के मिलाने से उसकी तरलता और अधिक बढ़ जाती है। आप सब लोगों ने अपने घरों की रसोई में देखा होगा कि दाल पकाने के लिए जब चूल्हे पर चढ़ाते हैं तो उसमें थोड़ा तेल डाल दिया जाता है जिससे दाल आसानी से पक जाती है क्योंकि तेल डालने से पानी में तरलता बढ़ जाती है जब तरलता बढ़ती है तो कोई भी वस्तु आसानी से पक जाती है या गल जाती है। इसलिए इसमें और भी अधिक सोमत्व आ जाता है। हथेली में अंगूठे और तर्जनी के मध्य में नीचे का उभरा हुआ स्थान है, वह शुक्र का होता है। जिसे शुक्र का पर्वत कहते हैं। शुक्र हमारी कामवासना का नियंत्रक है इसके कारण ही संतति उत्पन्न होती है। इसलिए वहाँ कुश रखा जाता है। कुश ऊर्जा का कुचालक होता है। श्राद्ध करने वाला इस कुश रखे हाथों से इस पिंड को लेकर सूंघता है, चूंकि उसका और उसके पितर का शुक्र जुड़ा होता है, इसलिए वह उसे श्रद्धाभाव से उसे आकाश की ओर देख कर पितरों के गमन की दिशा में उन्हें मानसिक रूप से उन्हें समर्पित करता है और पिंड को जमीन पर गिरा देता है। इससे पितर फिर से ऊर्जावान हो जाते हैं और वे 28 दिन की यात्रा करते हैं। इसके प्रतीक के रूप में हम श्राद्ध करते हैं और गंतव्य तक पहुँचाने की व्यवस्था करते हैं। इसलिए हर 28वें दिन पिंडदान किया जाता है। उसके बाद हमारा कोई अधिकार नहीं। चंद्रमा में जाते ही मन का विखंडन हो जाएगा और वह चंद्रमा में विलीन हो जाएगा। फिर उसकी अलग से कोई व्याप्ति नहीं रहेगी।* यही पितृपक्ष में श्राद्ध करने के पीछे का विज्ञान है। इसी में मनोविज्ञान भी छिपा है। पितरों का चन्द्रमा से संबंध इस कारण नहीं है कि मृत व्यक्ति चन्द्रमा पर बैठा हुआ है, बल्कि इसलिए कि वैदिक ब्रह्माण्ड-दृष्टि में चन्द्रमा सोम, मन, कालचक्र और पितृयान से जुड़ा हुआ है। यहां श्राद्ध का ‘वैज्ञानिक’ अर्थ प्रयोगशाला में सिद्ध भौतिक नियम न लेकर व्यवस्थित, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और पारिस्थितिक दृष्टि से लिया जाए, तो श्राद्ध में कई गहरे आयाम दिखाई देते हैं। *

1.स्मृति का मनोविज्ञान*मनुष्य अपनी जड़ों को याद करता है। *2. कृतज्ञता का संस्कार*जो हमें मिला, उसके लिए धन्यवाद देना सीखता है। *3. परिवार की निरंतरता*नई पीढ़ी अपने पूर्वजों के नाम और जीवन-कथा से परिचित होती है। *4. अन्न और दान*श्राद्ध केवल स्मरण नहीं इसमें भोजन और दान के माध्यम से समाज में संसाधनों का पुनर्वितरण भी होता है।*5. प्रकृति से संबंध*जल, अन्न, तिल, कुश, अग्नि, पृथ्वी और आकाश—सभी को अनुष्ठान में स्थान मिलता है।*6. मृत्यु का संस्कार*मनुष्य मृत्यु को स्वीकार करना सीखता है।और शायद सबसे महत्वपूर्ण*7. अहंकार का क्षय*पितृपक्ष हमें बताता है “जिस जीवन पर तुम्हें इतना अभिमान है, वह तुम्हारा अकेले का बनाया हुआ नहीं है।” तुमसे पहले लोग थे। उन्होंने संघर्ष किया। उन्होंने परिवार बनाया। उन्होंने अन्न उगाया। उन्होंने ज्ञान दिया। उन्होंने संस्कृति बचाई और उसी प्रवाह में तुम आए हो।

*श्राद्ध का वास्तविक संदेश*श्राद्ध का अर्थ केवल यह नहीं कि पंडित बुलाया, पिण्ड बनाया और कर्म पूरा हो गया। श्राद्ध का वास्तविक अर्थ है श्रद्धा से स्मरण। अपने माता-पिता पिता को याद करना। दादा-दादी को याद करना। उन पूर्वजों को याद करना जिनके नाम तक हमें ज्ञात नहीं और केवल मृतकों को ही नहीं उन ऋषियों को भी याद करना जिन्होंने ज्ञान दिया, उन आचार्यों को जिन्होंने संस्कार दिए, उन किसानों को जिन्होंने अन्न दिया, उन शिल्पियों को जिन्होंने सभ्यता बनाई और उन असंख्य पूर्वजों को जिनकी जीवन-यात्रा के कारण हम आज यहाँ खड़े हैं।*इसलिए श्राद्ध को अंधविश्वास कहकर छोड़ देना भी अधूरा है और हर धार्मिक प्रतीक को आधुनिक विज्ञान का सिद्ध वैज्ञानिक तथ्य घोषित कर देना भी।

*भारतीय परंपरा को उसकी अपनी भाषा में समझना अधिक उचित है। *जहाँ मंत्र है वहाँ दर्शन है।**जहाँ तर्पण है वहाँ कृतज्ञता है।**जहाँ पिण्ड है वहाँ अन्न और जीवन का स्मरण है।**जहाँ पितृ हैं वहाँ हमारी अपनी जड़ें हैं।*और *जहाँ श्रद्धा है, वहाँ पीढ़ियों को जोड़ने वाली एक अदृश्य डोर है।* ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।अवधूत चिंतन — श्री गुरुदेव दत्त। एक निवेदन *”बांगरू-बाण”* *का उद्देश्य है भारतीय ज्ञान-परंपरा को आधुनिक दृष्टि से समझना, परंपरा और विज्ञान के बीच संवाद स्थापित करना और प्रश्नों के माध्यम से चिंतन को जीवित रखना है।*

*अगर आप उपरोक्त बातों से सहमति रखते हैं। तो प्रत्येक गुरुवार भारतीय धर्म संस्कृति, सनातन परंपरा, जीवन पद्धति, इतिहास, वेद-अध्यात्म, भारतीय दर्शन और आधुनिक विज्ञान मनोविज्ञान के अंतर्संबंधों पर शोधपरक एवं विचारोत्तेजक लेख 3 भाषाओं में हिंदी, मराठी एवं अंग्रेजी इस चैनल पर ब्रॉडकास्ट किए जाएंगे। यदि आप बांगरू-बाण को पढ़ना चाहते हैं तो कृपया नीचे दिए लिंक से Channel को Follow करें।* *चैनल की लिंक👇🏻👇🏻👇🏻*https://whatsapp.com/channel/0029Va5IqxVFSAt8BMonoJ2e

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