राम जन्मभूमि निधि विवाद: राजनीति की आड़ में आस्था पर प्रहार?

डॉ बालाराम परमार।

भारत में आस्था केवल व्यक्तिगत विषय नहीं है। यह सामाजिक ताना-बाना, सांस्कृतिक पहचान और करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ी है। भगवान श्री राम जन्मभूमि अयोध्या और दिव्य- भव्य मंदिर हिन्दू धर्मावलंबियों की आस्था का सबसे बड़ा प्रतीक है। 500 वर्षों के संघर्ष, बलिदान, न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय और देशभर के जन-सहयोग से यह मंदिर खड़ा हुआ है। 9 नवंबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय की पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने एकमत से जो निर्णय दिया, वह किसी दल का नहीं, भारत के संविधान का जयघोष था। उसके बाद श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन हुआ और देश के कोने-कोने से रामभक्तों ने तन-मन-धन से समर्पण किया। किसी ने ₹10 दिए, किसी ने ₹10 करोड़। यह समर्पण ‘चंदा’ नहीं, ‘श्रद्धा’ था।ऐसे में जब श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए जाने वाले चढ़ावे में गबन पर प्रश्न उठते हैं, तो पारदर्शिता मांगना हर नागरिक का अधिकार है। ट्रस्ट भी कह चुका है कि एक-एक पैसे का हिसाब सार्वजनिक होगा। परन्तु जब प्रश्न पूछने का तरीका, समय और शब्द ऐसे हों जो मूल उद्देश्य और आस्था को चोट पहुँचाना लगे, तो आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है।

पिछले दिनों कुछ मीडिया रिपोर्टों के आधार पर राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पर दान के दुरुपयोग और जमीन खरीद में अनियमितता के आरोप लगे। इस पर उत्तर प्रदेश सरकार ने तत्परता दिखाते हुए SIT का गठन किया। जाँच तीव्रता से चल रही है। प्रारंभिक तथ्यों के आधार पर आठ लोगों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं दो टूक कह चुके हैं कि “राम के नाम पर एक भी रुपया गलत गया तो बख्शा नहीं जाएगा। दूध का दूध, पानी का पानी होगा।” जब सरकार स्वयं जाँच कर रही हो और कार्रवाई कर रही हो, तब राजनीतिक दलों का कर्तव्य बनता है कि वे जाँच को सहयोग दें। परन्तु हुआ उल्टा।

आरोपों की आड़ में शिवसेना उद्धव गुट, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के कई नेताओं के बयान सामने आए। आरोपों की न्यायिक जाँच हो, दोषी को दंड मिले, इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। प्रश्न बयानों की भाषा, नीयत और पूर्वाग्रह पर है।

👉🏻बयानबाजी का पैटर्न: प्रश्न कम, कटाक्ष ज्यादा :इन चारों दलों के प्रवक्ताओं के बयानों का विश्लेषण करें तो एक समान पैटर्न दिखता है। मूल आरोप ‘जमीन खरीद में घोटाला’ था। परन्तु बयान केवल CAG ऑडिट या SIT जाँच की मांग तक सीमित नहीं रहे। “चंदा चोर”, “भगवान के नाम पर धंधा”, “आस्था की दुकान”, “राम के नाम पर लूट” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया। यहाँ व्यक्ति या ट्रस्ट पर हमला नहीं, प्रतीक पर हमला दिखता है। सबसे चिंताजनक बात यह रही कि हर बयान में अनावश्यक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम घसीटा गया। ट्रस्ट एक स्वायत्त निकाय है। उसके निर्णयों से प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का सीधा संबंध नहीं है। फिर भी आम आदमी पार्टी के नेता हर प्रेस वार्ता में कहते हैं कि “मोदी जी जवाब दें”। कांग्रेस के प्रवक्ता पूछते हैं कि “योगी जी मौन क्यों हैं”, जबकि योगी जी ने ही SIT बनाई और कार्रवाई शुरू की। यह स्पष्ट करता है कि उद्देश्य भ्रष्टाचार उजागर करना नहीं, बल्कि चुनावी लाभ के लिए दो सबसे लोकप्रिय नेताओं को बदनाम करना है। जब आप ‘चंदा’ शब्द को ‘चोर’ से जोड़ते हैं, तो आप करोड़ों लोगों के उस भाव से खेलते हैं जिन्होंने स्वेच्छा से दिया। क्या अयोध्या में ₹200 देने वाली वह वृद्धा चोर हो गई,जिसने अपने पसीने की कमाई से समर्पण किया? क्या वह मजदूर चोर है जिसने एक दिन की दिहाड़ी राम के चरणों में रख दी?

👉🏻परोक्ष विरोध की पुरानी पृष्ठभूमि:शिवसेना उद्धव गुट का इतिहास हिंदुत्व की राजनीति का रहा है। बालासाहेब ठाकरे ने कारसेवा का समर्थन किया था। परन्तु सत्ता परिवर्तन के बाद उसके सुर बदले। आज वही दल राम मंदिर पर प्रश्न उठाने वालों की कतार में खड़ा है। समाजवादी पार्टी का आधार उत्तर प्रदेश है, जहाँ राम सबसे बड़े सांस्कृतिक प्रतीक हैं। फिर भी पार्टी के नेता अक्सर मंदिर को ‘बीजेपी का राजनीतिक मुद्दा’ कहकर रोटियां सेंक रहे हैं।

1990 में कारसेवकों पर गोली चलवाने का इतिहास जनता भूली नहीं है। आम आदमी पार्टी स्वयं को ‘कट्टर ईमानदार’ कहती है, परन्तु उसके नेता राम मंदिर पर हर बार मोदी को कटघरे में खड़ा करते हैं। दिल्ली में जब इन्हीं के नेता हज हाउस का उद्घाटन करते हैं तो वह ‘धर्मनिरपेक्षता’ है, परन्तु अयोध्या में मंदिर बने तो ‘राजनीति’ हो जाती है। यह दोहरा मापदंड क्यों?

कांग्रेस का रुख 1986 में राजीव गांधी द्वारा ताला खुलवाने से लेकर 2019 में कपिल सिब्बल द्वारा ‘सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टालो’ की दलील तक बदलता रहा। चारों दलों में समानता यह है कि राम मंदिर पर बोलते समय इनके शब्दों में श्रद्धा कम और उपहास अधिक झलकता है।पिछले दो-तीन दशक का प्रत्यक्ष अनुभव बताता है कि ये दल प्रत्यक्ष रूप से न सही, परोक्ष रूप से हिन्दू प्रतीकों से दूरी बनाते हैं। हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फारसी क्या। जब ट्रिपल तलाक पर कानून बना तो इन दलों ने ‘मुस्लिम विरोधी’ कहा। जब CAA आया तो ‘संविधान खतरे में’ बताया। परन्तु जब कश्मीर में मंदिर तोड़े गए, बंगाल में दुर्गा विसर्जन पर रोक लगी, या केरल में सबरीमाला परम्परा पर न्यायिक हस्तक्षेप हुआ, तब इन दलों के मुह में दही जम गया था। इससे आम जनता में संदेश जाता है कि ‘बहुसंख्यक आस्था’ पर बोलना आसान है, ‘अल्पसंख्यक आस्था’ पर बोलना जोखिम भरा।

👉🏻मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम पर, अमर्यादित राजनीति क्यों? राम जन्मभूमि आंदोलन को इन दलों ने हमेशा ‘बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एजेंडा’ कहा। जबकि न्यायालय का निर्णय पुरातात्विक साक्ष्य, राजस्व रिकॉर्ड और तथ्यों पर आया था, न कि किसी पार्टी के घोषणापत्र पर। जब आप न्यायालय के निर्णय के बाद भी मंदिर को ‘राजनीतिक’ कहते हैं, तो आप न्यायपालिका की भावना पर भी प्रश्न उठाते हैं।

इस पूरे विवाद में सबसे पीड़ादायक क्षण वह था जब ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने नैतिक जिम्मेदारी का परिचय देते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। चंपत राय वह व्यक्ति हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन राम काज के लिए समर्पित कर दिया। 1990 की कारसेवा, 1992 का आंदोलन, 30 वर्षों की कानूनी लड़ाई – हर मोर्चे पर वे आगे रहे। उन्होंने एक रुपया वेतन नहीं लिया। जब ऐसे तपस्वी व्यक्ति को ‘चंदा चोर’ गिरोह का हिस्सा बताया जाता है, तो यह केवल उनका नहीं, पूरे आंदोलन का अपमान है। उनके त्यागपत्र ने यह सिद्ध कर दिया है कि रामभक्त पद के भूखे नहीं होते हैं। परन्तु विपक्ष ने इसे भी ‘साजिश का सबूत’ बताते हुए बढ़-चढ़ कर पत्रकार वार्ता की। यह स्तरहीन राजनीति का निकृष्टतम उदाहरण है।

👉🏻धर्म बनाम राजनीति: लक्ष्मण रेखा क्यों लांघी जा रही है? लोकतंत्र में हर संस्था पर प्रश्न उठना चाहिए। राम मंदिर ट्रस्ट सरकारी अनुदान नहीं लेता, उसकी देखरेख और रखरखाव जनता के दान से चलता है। अतः जनता को हिसाब माँगने का हक है। परन्तु कुछ राजनीतिक दलों का तरीका पूर्णतः राजनीतिक रोटियां सेंकने वाला और हिन्दू विरोधी हो गया है। यदि घोटाला हुआ है तो FIR कराइए, दस्तावेज दीजिए, न्यायालय जाइए। SIT जाँच की रिपोर्ट का इंतजार करिए। परन्तु प्रेस कॉन्फ्रेंस में सूप बोले तो बोले, छलनी भी बोले जिसमें बहत्तर 72 छेद! दागदार नेताओं के भाषण सुनकर ‘भगवान राम भी शर्मिंदा होंगे’। अखिलेश यादव, संजय राऊत, अरविंद केजरीवाल और राहुल गांधी द्वारा मनघड़ंत कहानी बना कर बयान देना न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालना और, भावनात्मक ब्लैकमेल है। इस तरह के छिछोरापन से, असली जाँच भटकती है क्योंकि मुद्दा ‘आरोप’ से हटकर ‘आस्था बनाम राजनीतिक रोटियां सेंकना’ बन जाता है। दूसरी ओर करोड़ों रामभक्तों को लगता है कि उनके आराध्य देवी- देवताओं का नाम लेकर उनकी श्रद्धा और भक्ति पर हमला किया जा रहा है। राजनीति का धर्म है कि वह समाज जोड़े। जब आप ‘चंदा चोर’ कहते हैं तो आप देने वाले को भी चोर के साथ खड़ा कर देते हैं।

👉🏻समाधान: तथ्य, संयम और समरसता: राजनीतिक दलों के नेताओं को विनम्र सलाह है कि राम जन्मभूमि का विषय बीजेपी का कॉपीराइट नहीं है। राम जितने बीजेपी के हैं, उतने ही कांग्रेस के, सपा के, शिवसेना के और आम आदमी पार्टी के भी हैं। इसलिए बयान देते समय तथ्य पहले देखें। जमीन की रजिस्ट्री, सर्किल रेट, बैंक ट्रांजैक्शन – ये सार्वजनिक दस्तावेज हैं। इन्हें लेकर RTI डालिए, कोर्ट जाइए। SIT को सबूत दीजिए। परन्तु बिना दस्तावेज के ‘लूट लिया’ कहना जनता को बेवकुफ बनाना है। आप ट्रस्ट के सचिव से नाराज हो सकते हैं। परन्तु ‘राम के नाम पर’ वाक्य बोलते समय याद रखें कि राम केवल ट्रस्ट के नहीं हैं। आपके शब्द से अयोध्या मुक्ति से जुड़े लाखों करोड़ों लोगों की आस्था आहत होती है। चंपत राय जैसे त्यागी के त्यागपत्र पर जश्न मनाना आपको छोटा बनाता है। वक्फ बोर्ड की संपत्ति, चर्च की जमीन, राधास्वामी ब्यास डेरा – इन पर भी उतनी ही पारदर्शिता मांगिए जितनी राम मंदिर ट्रस्ट से। तब जनता को लगेगा कि आप धर्म नहीं, भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं। प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी को हर बात में घसीटना बंद कीजिए। जाँच एजेंसियों पर भरोसा रखिए। भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है, धर्म-विरोधी नहीं। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि राज्य का कोई धर्म न हो। इसका अर्थ यह नहीं कि राजनीतिक दल धर्मस्थलों का उपहास करें। राम जन्मभूमि पर यदि गड़बड़ी है तो दूध का दूध, पानी का पानी होना चाहिए। यह बात मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बार-बार कह रहे हैं। उनकी सरकार ने ही आठ आरोपियों को जेल भेजा है। सच्चाई का पता लगाने के लिए न्यायालय और ऑडिट है। टीवी डिबेट कदापि नहीं हो सकती।शिवसेना, सपा, आप और कांग्रेस – चारों दलों का जनाधार चुनाव दर चुनाव घट रहा है। 2014, 2019 और 2024 ने यह सिद्ध किया है। जनाधार बढ़ाने के चक्कर में अनर्गल बातें करना, प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी को हमेशा कटघरे में खड़ा करना और हर बार विधर्मी तुष्टिकरण की राजनीति करना राम जन्मभूमि और 110 करोड़ सनातन धर्म-संस्कृति-सभ्यता वाहकों को बदनाम करना है। जनता अब जागरूक है। वह जानती है कि कौन राम का है और कौन केवल राम के नाम का।

अंत में केवल इतना निवेदन कि धर्म करोड़ों लोगों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। उसके वास्ते बोलते समय शब्दों को तौलना, तथ्यों को जाँचना और नीयत को साफ रखना – यही राष्ट्रधर्म है। क्योंकि आस्था टूटी तो समाज टूटता है, और समाज टूटा तो राजनीति भी नहीं बचती। वैसे भी जागरूक जनता के सामने समाजवादी, आम आदमी, कांग्रेस, तृणमूल, शिवसेना उद्धव गुट और जातिवादी क्षेत्रीय पार्टियों का टूटना निरंतर जारी है। राम सबके हैं। राम के नाम पर राजनीति कम हो, मर्यादा अधिक हो – इसी में हम भारतवासियों का भला है। प्रजातंत्र का नभ निर्मल है, उसे आरोपों के धुएँ से काला न करें।

डॉ. बालाराम परमार

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *