राजनीतिक हथकंडे, धूमिल होता प्रजातंत्र और एक जागरूक नागरिक की भूमिका।

डॉ. बालाराम परमार ‘हॅंसमुख’

लोकतंत्र का अर्थ केवल पांच साल में एक बार वोट डालना नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है “जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन”। लेकिन जब सत्ता की भूख नैतिकता पर भारी पड़ने लगे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे ‘हथकंडों का तंत्र’ बन जाता है। भारत का लोकतंत्र जाने-अनजाने में हथकंडों का तंत्र बनता जा रहा है।

आज देश की राजनीति में हथकंडों का वही असर दिखाई देने लगा है, जो आजादी के बाद से ही भारत विरोधी ताकतें चाहती थीं। दशक दर दशक राजनीतिक दलों के लिए सत्ता प्राप्ति के लिए सिद्धांत, विचारधारा और जनसेवा गौण होते गए और उनकी जगह नफरत, कुटिलता और क्षेत्रवाद ने ले ली है। परिणाम? प्रजातंत्र धूमिल हो रहा है और सीधी-सादी जनता का भरोसा टूट रहा है।ऐसे में सवाल उठता है कि दोष किसका है? केवल नेताओं का? या मतदाताओं का भी? अनुभव बताता है कि भारतीय कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका में गिरावट के लिए राजनीतिक दल से ज्यादा दोषी मतदाता है, क्योंकि जब तक मतदाता जागरूक नहीं होंगे, ये हथकंडे चलते रहेंगे। मतदाता एक बार अपने मतदान का सही उपयोग कर ले, तो इन राजनीतिक नेताओं के हथकंडे धरे के धरे रह जाएंगे।

चुनाव लोकतंत्र का त्योहार है। लेकिन आज यह त्योहार बाजार बन गया है। आइए मतदाता जागरूकता की दृष्टि से समझते हैं कि सत्ता के लिए कौन-कौन से हथकंडे अपनाए जाते हैं और एक जागरूक नागरिक इस खेल को कैसे रोक सकता है। लोकतंत्र की जड़ पर चोट करने वाले प्रमुख हथकंडों में शराब वितरण, कपड़े बांटना, चुनाव के एक दिन पहले घर-घर जाकर नकद देना और मतदाताओं को लाभ देने के वादे शामिल हैं। ऐसा करने के पीछे राजनीतिक दलों की मान्यता है कि गरीब, अनपढ़ और जरूरतमंद वोटर को ‘लाभार्थी’ बनाकर स्थायी वोट बैंक बनाया जा सकता है।इस घिनौने खेल के साथ-साथ बूथ पर कब्जा और मतदाता को धमकाना आम बात हो गई है। रिश्वत देकर कानून को कमजोर बनाने की होड़ लगी हुई है। न्यायालय के निर्णयों की अनदेखी हो रही है। जहां कानून कमजोर हो जाता है, वहां लोकतंत्र का कमजोर होना स्वाभाविक है। फर्जी वोटिंग और वोटर लिस्ट के साथ खिलवाड़ बदस्तूर जारी है। इस स्तरहीन खेल में मरे हुए लोगों के नाम और एक नाम दो-तीन जगह देखने को मिलता है। इस तरह वोटर बिकने लगा है। जब वोटर बिकता है, तो विधायक-सांसद का बिकना लाजमी है। और जब विधायक-सांसद बिकता है, तो नीतियां और चुनावी वादे धरे के धरे रह जाते हैं। मतदाताओं के सपने चूर-चूर हो जाते हैं।ध्रुवीकरण का हथकंडा आजादी के बाद से ही अपनाया जा रहा है। अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति राजनीतिक दलों ने अपना रखी है। इसी खतरनाक हथकंडे को मतदाता समझ नहीं पा रहा है और प्रजातंत्र का निर्मल नभ धूमिल हो रहा है।’तुम्हारी पहचान खतरे में है’ कहकर समाज को खेमों में बांटना आम बात हो गई है और विकास, शिक्षा, रोजगार के मुद्दे पीछे छूट रहे हैं। प्रत्येक दल जनता के समक्ष एक काल्पनिक प्रेत उतारता है और फिर कहता है “सिर्फ हमारा ही दल इस प्रेत से बचा सकता है”। इस भय से मतदाता को उस राजनीतिक दल से प्रीत हो जाती है। नतीजा? जनता मुद्दों पर नहीं, जज्बात पर वोट करती है।

सात दशक का अनुभव बताता है कि सत्ता का दुरुपयोग आम बात होती जा रही है। सत्ताधारी दल ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ कहावत चरितार्थ करते हुए “सरकार हमारी, नियम भी हमारे” पर चलाते हैं। सत्ता मिलते ही संस्थाओं को रिमोट कंट्रोल की तरह इस्तेमाल किया जाता है। जांच एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्ष को दबाने के लिए किया जाता है।आजकल लोकलुभावन घोषणाएं चुनाव जीतने की चाबी बन गई हैं। चुनाव के तीन महीने पहले ‘रेवड़ी बांटना’ शुरू हो जाता है। चुनाव जीतने के बाद “जनसेवक”, “जन का मालिक” बन जाता है।मीडिया पर कंट्रोल करके नए-नए विमर्श गढ़े जाते हैं। राजनीतिक दल समझ गए हैं कि सोशल मीडिया के जमाने में जो दिखेगा वही बिकेगा।

आजकल चुनाव जीतने की लड़ाई जमीन पर कम, मोबाइल की स्क्रीन पर ज्यादा है। गोदी मीडिया की भरमार है। 24 घंटे एक ही चेहरा, एक ही उपलब्धि दिखाई जाती है। ट्रेंड बनाकर सच को झूठ और झूठ को सच साबित किया जाता है। फर्जी सर्वे और एग्जिट पोल का माहौल बनाकर वोटर को मानसिक रूप से प्रभावित किया जाता है। जब मीडिया प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका से हटकर सच्चाई छापना-दिखाना बंद कर दे, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ गिर जाता है। भारत का चौथा स्तंभ न केवल लड़खड़ा गया है बल्कि उसको दीमक भी लग गई है।आयाराम-गयाराम की राजनीति हावी होती जा रही है। आजकल आयाराम-गयाराम का जो माहौल दिखाई देता है उसे देखकर कहा जा सकता है कि जनप्रतिनिधियों की विचारधारा मर गई है। जनता जिस बैनर तले उसको पसंद करती है, चुनती है, वही जनप्रतिनिधि जनता के विश्वास की हत्या करता है। जनता का जनादेश इस तरह सरेआम नीलाम हो रहा है।विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका घिनौने, स्तरहीन हथकंडों के चलते अंदर से खोखली होती जा रही हैं। जब संस्थाएं कमजोर होती हैं, तो निरंकुशता मजबूत होती है। जब राजनीतिक दलों के अंदर निरंकुशता का बोलबाला हो जाता है तो प्रजातंत्र का किला भर-भरा कर गिर जाता है। हमारे भारत में यही हो रहा है।सरदार पटेल की तरह कठोर कदम उठाने के स्थान पर झूठे वादे किए जाने लगे हैं। व्यक्तित्व पूजा ने विकास की अर्थी निकाल दी है। चुनाव बाद सब “जुमला” साबित हो रहा है। अपनी सरकार की नाकामी को छिपाने के लिए पुरानी सरकार को कोसना राजनीतिक चलन हो गया है।मुद्दों से भटकाने के लिए ‘इतिहास के झगड़े दोबारा जिंदा करना’, ‘संविधान खतरे में है’, ‘राष्ट्र खतरे में है’, ‘आरक्षण खतरे में है’, ‘भाषा खतरे में है’ आदि कहकर पर्यावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य बुनियादी ढांचे पर चर्चा को भुला देना राजनीतिक दलों की खासियत और जनता की नियति बनती जा रही है।

धूमिल होता प्रजातंत्र: विश्वास के संकट के चलते युवा पीढ़ी सोचने लगी है कि “सब राजनीतिक दल चोर हैं, वोट देकर क्या फायदा?” फलत: मतदान घटता है। चुनाव पैसा और बाहुबल का खेल बन गया है। योग्य, ईमानदार लोग राजनीति से दूर भागने लगे हैं। फलत: राजनीति में गुणवत्ता का संकट पैदा होने लगा है। क्षेत्रीय दल गाजर घास की तरह उगने लगे हैं।

जनप्रतिनिधि 5 साल बाद ही जनता को याद करते हैं। बीच में हवाई यात्रा, अतिविशिष्ट आभा, जान को खतरे के बहाने जनमानस से दूरी बनाए रखते हैं। शिक्षा-दीक्षा का स्तर गिर जाने से समाज और परिवार में जहर घुलता जा रहा है। पड़ोसी-पड़ोसी धर्म और जाति के नाम पर लड़ते हैं। पुश्तैनी जायदाद के लिए भाई-भाई लड़-झगड़कर मर रहे हैं, कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगा रहे हैं।

*उदाहरणार्थ*, पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली के जंतर मंतर और शाहीन बाग पर हमें लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के घिनौने रूप दिखे। कभी किसान, कभी खिलाड़ी, कभी शिक्षक, कभी बेरोजगार युवा – सभी अपनी मांग लेकर आते हैं। माना कि यह लोकतंत्र की खूबसूरती है कि जनता सड़क पर आकर सवाल पूछ सकती है। लेकिन साथ ही हमने यह भी देखा है कि कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर आयोजित आंदोलनों को “घिनौनी हरकतें कर महापुरुषों की तस्वीर लेकर राजनीतिक रंग” देकर स्वार्थी लोगों द्वारा गलत फायदा उठाया जाता है। आंदोलन शुरू किसी और दिशा में काम करने के लिए होता है और चला कहीं और जाता है। आंदोलन हाईजैक हो जाता है और ‘देश विरोधी’, ‘धर्म विरोधी’, ‘प्रांत विरोधी’, ‘व्यक्ति विरोधी’ की आड़ में राष्ट्र विरोधी और संविधान विरोधी बन जाता है। जनता असली मांग के लिए एकजुट होती है, लेकिन हकीकत में नैरेटिव की लड़ाई शुरू हो जाती है।

*अब सबसे जरूरी सवाल यह है कि समाधान क्या है? एक जागरूक नागरिक की भूमिका क्या है?*

समाधान न सत्ताधारी दल के पास है, न ही विपक्षी दलों के पास। समाधान मतदाता के ही पास है। जब तक नागरिक अपने अधिकार और कर्तव्य के प्रति जागरूक नहीं रहेगा, नेता और राजनीतिक दल हथकंडे अपनाते रहेंगे। एक जागरूक नागरिक ही भारतीय लोकतंत्र को जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन बना सकता है। क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51A(b) में कहा गया है कि स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखना और उनका पालन करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।मतदाता को सूचना का उपभोक्ता नहीं, परीक्षक बनने की जरूरत है। WhatsApp पर आया हुआ वीडियो आंख बंद करके फॉरवर्ड मत कीजिए। असलियत जानिए। याद रखिए, जो आपको गुस्सा दिला रहा है, वो आपको बेवकूफ भी बना रहा है। शराब की बोतल या 500 रुपये के लिए 5 साल के लिए भविष्य गिरवी मत रखिए। मतदान करते समय उम्मीदवार का चरित्र, शिक्षा, आपराधिक रिकॉर्ड देखिए। पार्टी का घोषणा पत्र पढ़िए।चाहे आपकी पसंदीदा पार्टी की सरकार हो या विरोधी की, “तुमने क्या किया?” यह सवाल हर 6 महीने में पूछिए। ध्रुवीकरण का शिकार मत बनिए। कोई आपको जाति, धर्म के नाम पर भड़काए तो रुकिए और सोचिए, इससे मेरी रोटी, रोजगार, शिक्षा का क्या लेना-देना है? समाज को जोड़िए, तोड़िए मत। जब कोई संवैधानिक संस्थाओं पर बेवजह अथवा निज स्वार्थ पूर्ति के लिए हमला करे तो चुप मत रहिए। क्योंकि आज उन पर हमला हो रहा है, कल आप पर होगा।स्थानीय राजनीति में भाग लीजिए। सिर्फ लोकसभा-विधानसभा नहीं। पंचायत, नगरपालिका, स्कूल की समिति में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लीजिए। भ्रष्टाचार वहीं से शुरू होता है। वहीं पर उसे खत्म भी किया जा सकता है। याद रखिए, राजनीतिक हथकंडे तब तक चलेंगे जब तक हम सुविधा भोगी नागरिक रहेंगे। प्रजातंत्र तब तक धूमिल होता रहेगा जब तक मतदाता मूक दर्शक बने रहेंगे। सत्ता बदलने से सिस्टम नहीं बदलेगा।

याद रखिए डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था: _”संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर चलाने वाले लोग बुरे हैं तो वो बुरा साबित होगा। और संविधान कितना भी बुरा क्यों न हो, अगर चलाने वाले लोग अच्छे हैं तो वो अच्छा साबित होगा।”_ आज संविधान को अप्रत्यक्ष रूप से चलाने वाले हम भारत के लोग हैं।

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