पानी के संकट से पलायन, पलायन से पल-पल बदलता लोगों का जीवन और प्रदेश में गहराता भूजल संकट।

रिंकेश बैरागी,

विशेषज्ञों के अनुसार भूजल का दोहन लगातार जारी रहा तो आने वाले समय में पेयजल और कृषि दोनो के लिए गंभीर संकट पैदा हो जाएगा। कितनी गंभीर चिंता का विषय है जिसे बुद्धीजीवियों को भी समझना चाहिए और आम नागरिको को भी समझना चाहिए कि भूजल पुनर्भरण में सिर्फ 0.47 प्रतिशत की वृद्धी हुई है, इसके विपरित भूजल निकासी में 2 प्रतिशत से अधिक की वृद्धी दर्ज की गई है, उसी के अनुरुप राज्य का भूजल दोहन स्तर 58.40 प्रतिशत से बढ़ते हुए 59.32 प्रतिशत हो गया है।प्रदेश में बारिश मुंडेर पर आ टीकी है, परंतु यहां पर पलायन पल-पल लोगों की जिंदगी को प्रभावित करते हुए परिवर्तीत कर रहा है। गहराते जल संकट से अब जनता बारिश के शुरुआती दौर में भी गांव छोड़कर पलायन पर जा रही है। अपने जीवन को सुचारु करने की उम्मीद में जो लोग इस मौसम में बादलों से छाए आकाश को निहारते हुए बारिश की प्रतिक्षा में खेतों के पास खड़े होते थे वो लोग आज काम की तलाश में अन्य प्रदेश को जाने वाली बसों की प्रतिक्षा में सड़क के किनारे परिवार के साथ खड़े मिलते हैं। इस कारण गांव के गांव धीरे-धीरे खाली होते जा रहे हैं जिसका मुख्य कारण एक ही है, पानी की समस्या, और गहराता भूजल संकट। केंद्रीय भूजल बोर्ड ने जारी की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में भूजल दोहन की औसत दर बढ़ते हुए 59.32 प्रतिशत पहुंच गई है जो कि चिंताजनक है यहीं नहीं मालवा क्षेत्र में स्थिति सबसे अधिक गंभीर है। इसी जल संकट के कारण पूरे जनजाति अंचल में पलायन हो रहे हैं और सारे गांव सूने पड़े हैं।

पलायन के पथ पर अग्रसर परिवार पेट पालने की परिक्रमा में भावी पीढ़ी के भविष्य को पथभ्रष्ट कर देते हैं, उनके साथ जाने वाले बच्चें शिक्षा से वंचित रहते हैं और जागरुकता के अलख से दूर वो भी आने वाले समय में अपने स्वास्थ्य की चिंता छोड़, पलायन के अंधकार में जाने को मजबूर होते हैं। जबकि अंचल में अनेक योजनाओं में सेकड़ों तालाबों की स्वीकृति है, जिनमें पानी नहीं है, नदियां अब बहती नहीं है, और शासन प्रशासन नाकाम होकर नजारों को निहार रहा है। पलायन के दृश्य को देखकर यह कहा जा सकता है कि, शासन के सारे दावे और वादें प्रशासन की मेहनत एक प्रकार का दिखावा है, बेइमानी है जनता के साथ बहुत बड़ा धोका है। जनजाति क्षेत्र पलायन का अभिशाप सर पर लेकर घुम रही है परिवार और बच्चों का पेट पालने के लिए पलायन पर जाने वाले मजबूरी में अपना घर त्यागकर मजदूरी के लिए निकलते हैं, अन्य राज्यों में काम करके परिवार का जीवन व्यापन करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं होता। ग्रामीण कुछ महिनो का राशन, सामग्री लेकर कामकाज की तलाश में अपना घर छोड़कर अन्य प्रदेश में बरसों से जा रहें हैं। अपनी सुविधा और जीवन यापन के लिए जनजाति समाज पलायन के पथ पर अग्रसर हो जाते हैं।

प्रश्न की प्राथमिकता यह है कि, अनेक सरकारी योजना और नागरिको के हितों पर कार्य करने वाली सरकार की ऐसी क्या स्थिति आ गई कि प्रदेश में भूजल स्तर का स्तर इतना अधिक नीचे होता चला गया कि वह चिंताजनक हो गया। क्या सरकार का निगरानी तंत्र पूरी तरह से भ्रष्ट होकर फैल हो गया, या वर्षा जल संचयन की योजना अपर्याप्त रुप से विस्तार नहीं सकी या फिर भूजल सरंक्षण एवं पुनर्भरण संरचनाओं का पूर्ण विकास नहीं हो पाया और इन सब नाकामी के पीछे लालच से भरी पड़ी सरकार और उसका निढल्ला तंत्र है जो हर समस्या की नीव को पीछली सरकार की गलती बता कर लोगों को सिर्फ आश्वासित करता हैं।दूसरी ओर देखे तो जनजाति क्षेत्र में अनेक योजना संचालित तक जल संसाधन विभाग के माध्यम से क्षेत्र में सेकड़ों तालाबों को स्वीकृति दिलाने पर भी, नहरो को चलाने पर भी हेण्डपंप लाने और नल जल योजने होने पर भी क्यों ग्रामीण पलायन करने पर मजबूर है। अंचल में पानी की कमी सबसे प्रथम समस्या है तो क्या सरकार अपने जनजाति भाइयों के लिए इतने वर्षों में जल की व्यवस्था नहीं कर पाई, और नहीं कर पाई तो क्यों नहीं कर पाई। इस प्रश्न का उत्तर सरकार के पास है… नहीं है और होगा तब भी सरकार पहले तो इस समस्या का ठीकरा पुरानी सरकार और उनकी योजनाओं पर फोड़ेगी फिर आश्वासन की पीपरी बजाएगी। बहुत ही सामान्य सी बात है कि, प्रदेश में भाजपा सरकार कब से है उसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि, सरकार ने पानी की समस्या को सामान्य मान लिया और अपने इतिहास से सबक न लेते हुए अपनी ही नदियों को सुखा दिया, कुओं का पुर्नजीवन नहीं मिला, बावड़िया प्यासी ही रही और गिरता हुआ भूजल गिरता ही रहा।

अंचल में लोगों को पलायन की मजबूरी है क्योंकि खेत है किंतु पर्याप्त मात्रा में सिंचाई के लिए जल नहीं, जहां है वहां इतना कम कि, फसल पकाई नहीं जा सकती। जल की व्यवस्था करने के लिए शासन ने बहुत सी योजनाओ को लागु किया, जिसमें कुएं, नहर, बोरी बांध, तालाब निर्माण, हेण्डपंप खनन, ट्युबेल किया जाता है लेकिन लचर प्रशासन की व्यवस्था पर भ्रष्टाचार का कीड़ा ग्रामीणों को मिलने वाले पर्याप्त लाभ को चाट जाता हैं, और ग्रामीणों के अपने ही समुदाय के नेता, प्रतिनिधी होने पर भी स्वयं को असहाय अनुभूत करते हैं।बहरहाल, यह विषय सभी के लिए विचारणिय है कि, यदि पानी नहीं होगा तब जीवन को कैसे आगे बढ़ाया जाएगा। समय रहते यदि लोगों ने पानी को बचाने के लिए प्रबल कार्य नहीं किए तो प्रकृति इस विस्पोट को कैसे करेगी इसका अंदाजा कोई नहीं लगा सकता है और इस विस्फोट से हानि कितनी होगी इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकेगी। क्योंकि सिंचाई के लिए जल की कमी है फिर पेयजल पर भी समस्या खड़ी ही है और भूजल दोहन से गंभीर संकट मानव ने अपने ऊपर ले ही लिया है।

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