प्रभावहीन प्रशासन की कार्यप्रणाली-50 प्रतिशत से अधिक ग्रामीणों का अंचल से पलायन, योजनाओं से भर रहे नेता अपनी झोली।

रिंकेश बैरागी,

पलायन के दृश्य को देखकर इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि, शासन के सारे दावे और प्रशासन की मेहनत एक प्रकार का दिखावा है, बेइमानी है और जनजाति समाज के साथ बहुत बड़ा धोका है।

जनजाति क्षेत्र के लिए पलायन एक अभिशाप सा है, और मुख्यतः उन लोगों के लिए है जो परिवार और बच्चों का पेट पालने के लिए पलायन करते हैं। पलायन पर जाने वाले मजबूरी में अपना घर त्यागकर मजदूरी के लिए निकलते हैं, उनके पास अन्य राज्यों में जा कर काम करके परिवार का जीवन व्यापन करने के अलावा और कोई विकल्प होता नहीं। जनजाति अंचल के ग्रामीण कुछ महिनो का राशन, और सामग्री लेकर कामकाज की तलाश में अपना घर, गावं, जिला और राज्य छोड़कर अन्य प्रदेश में बरसों से जा रहें हैं। अपनी सुविधा और जीवन यापन के लिए उनके द्वारा लिया गया कर्जा जिले में रहकर दिन दुनी रात चौगुनी रुप से बढ़ता है, कर्जे के उस चक्र के चक्कर को समाप्त करने के लिए जनजाति समाज पलायन के पथ पर अग्रसर हो जाते हैं।

जिले में शाम के समय लंबी रुट वाली बसों के रास्ते पर स्थान-स्थान पर बोरियों बिस्तर के साथ ग्रामीण रात की 12 बजे तक बैठे हुए मिलते हैं, जीवन की व्यवस्था के लिए अधिकतर गुजरात, राजस्थान, और महाराष्ट्र राज्य में पलायन के लिए जाते हैं, क्योंकि इन ग्रामीणों को अपने ही अंचल में कार्य की वह सुविधा या रोजगार नहीं मिलता कि, ये लोग यहां रहकर अपना और अपने परिवार का गुजर-बसर कर सके। प्रशासन की योजनाओं पर क्रियान्वन का प्रतिशत इस दृश्य पर फिका सा दिखाई पड़ता है, वहीं शासन के दावें और वादें कमजोर और बेबुनियादी हो कर हारे हुए सिपाही का तरह घुटनों पर टीके हुए दिखाई देते हैं। जनजाति क्षेत्र के नेता अपने ही समुदाय के लोगों को बेवकूफ बनाते आते रहें और अपनी झोलिया भरते रहे, सुविधाओं और योजनाओं की पुर्ती के लिए अपने अधिनस्थ कार्यकर्ताओं को लाभांवित कर इतिश्री कर देते हैं, जिसके परिणाम स्वरुप आज भी ग्रामीण निर्धनता के वश में आकर मजबूरन पलायन के चक्र में चलते-चलते पेरो में छाले कर लेते हैं और उसी चक्र को फिर उसका वंशज उस पलायन के चक्र में फंस कर चलने को मजबूर हो जाता है, और नेता निर्लज्ज होकर इस युति को देखता है, परंतु कभी इस समस्या के समाधान पर सुविचार नहीं रखता।

विधायक, सांसद, विधानसभा या संसद में आवाज ऊंची कर जनजाति क्षेत्र की निर्धनता, बेराजगारी, और अन्य असुविधाओ से अवगत करवाकर सरकार से योजनाओं का भंडार खुलवाता है, मगर वो सारी सुविधा और योजना का लाभ ग्रामीणों तक नहीं पहुंचता, बल्कि नेता अपने विशेष चाटुकारों के साथ मिलकर सारा खजाना लूट लेते हैं। प्रश्न की प्राथमिकता यह है कि जनजाति क्षेत्र में सरकारी योजनाओं पर ठीक से कार्य किया जाए तो ग्रामीण पलायन पर जाएगा ही क्यों। अंचल में पानी की कमी सबसे प्रथम समस्या है तो क्या सरकार अपने जनजाति भाइयों के लिए इतने वर्षों में जल की व्यवस्था नहीं कर पाई, और नहीं कर पाई तो क्यों नहीं कर पाई।

पलायन की मजबूरी है क्योंकि खेत है किंतु पर्याप्त मात्रा में सिंचाई के लिए जल नहीं, जहां है वहां इतना कम कि, फसल पकाई नहीं जा सकता। जल की व्यवस्था करने के लिए शासन ने बहुत सी योजनाओ को लागु किया, जिसमें कुएं, नहर, बोरी बांध, तालाब निर्माण, हेण्डपंप खनन, ट्युबेल किया जाता है लेकिन लचर प्रशासन की व्यवस्था पर भ्रष्टाचार का किड़ा ग्रामीणों को मिलने वाले पर्याप्त लाभ को चाट जाता है, और ग्रामीणों के अपने ही समुदाय के नेता, प्रतिनिधी होने पर भी स्वयं को असहाय अनुभूत करते हैं।

दूसरा मुख्य कारण अंचल में कार्य का अभाव जिससे ग्रामीण परिवार को पालने की प्रक्रिया में पलायन के पथ पर परिवार के साथ परिजनों से दूर चला जाता है। इस समस्या के निवारण के लिए सरकार ने जिस योजना का क्रियांवन कर अपनी पीठ थपथपाई वो भी प्रशासन के लालची स्वभाव में आकर बंदरबांट की भेंट चढ़ गई। इस योजना में ग्रामीणों को 100 दिन का रोजगार पंचायत द्वारा दिया जाना होता है लेकिन वहां भी भ्रष्टाचार का दीमक पहले से ही मौजुद होकर निर्धन ग्रामीण के लाभ को खा जाता है। पंचायत स्तर पर बहुत सी बार मजदूरो के बजाय मशीनों से कार्य करवाया जाता और वे मशीने या तो नेता के प्रतिनिधी की होती है या फिर स्वयं सरपंच या नेता की होती है, जहां कहीं मजदुरो से कार्य करवाया भी जाता है वहां भी 10 प्रतिशत लिस्ट में नाम ऐसे लिखे जाते हैं जो उस स्थल पर कार्य नहीं कर रहें होते, और 10 प्रतिशत वो होते हैं जो आधे दिन काम कर पूरा मेहताना लेते हैं। इन 20 प्रतिशत मजदूरो की मजदूरी दर्शाई जाती है और उस पर भ्रष्टाचार का तिलक लगता है।तीसरा मुख्य कारण है ग्रामीणों पर कर्ज जिसके चक्रव्युह में जनजाति समुदाय का व्यक्ति न चाहते हुए भी फंस जाता है, और फिर उस कर्ज को उतारने के लिए ब्याज के कांटेदार पहिए में गोल-गोल घुम कर अपना सबकुछ गवां देता है, कभी-कभी तो कर्ज पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है, और उसे समाप्त करने के लिए या तो उसे पुरखों की भूमि बेचना पड़ती है या फिर पलायन के रास्ते पर प्रगाढ़ होना पड़ता है।

शासन ने इस समस्या के निवारण के लिए बहुत से वादे किए, सुदखोरो के विरोध में नियम कानुन को लाया गया, सभी प्रकार की बैंक से लोन की सरल योजनाओं को बनाया, खेत पर फसल के लिए भी लोन सुविधा दी गई, परंतु फिर से लचर व्यवस्था ने प्रत्येक निर्धन के लाभ पर पानी फेरा। बैंक लोन भी अच्छा खासा कमिशन या रिश्वत देकर दिया जाता है और यदि सबकुछ ठीक रहता है तो लोन मिलने का समय इतना अधिक हो जाता है कि ग्रामीण ब्याज के भार में दब जाता है। कर्ज कुप्रथाओ, दहेज दापा, के कारण बहुत अधिक हो जाता है, जिसे ग्रामीण चाह कर भी नहीं बच पाता।

बहरहाल, पलायन के पथ पर अग्रसर परिवार पेट पालने की परिक्रमा में भावी पीढ़ी के भविष्य को पथभ्रष्ट कर देते हैं, उनके साथ जाने वाले बच्चें शिक्षा से वंचित रहते हैं और जागरुकता के अलख से दूर वो भी आने वाले समय में पलायन के अंधकार में जाने को मजबूर होते है। जबकि जिले में अनेक योजना में सेकड़ो तालाब स्वीकृत है, नदियां अब बहती नहीं है, और शासन प्रशासन नाकाम होकर नजारों को निहार रहा है।

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