मुफ्त सुविधाओं से गरीबी मिटाने के प्रयास सार्थक सिद्ध हो सकते हैं या सरकार दे रही परजीवियों को जन्म।
रिंकेश बैरागी,
राजनीति दलों में दावों के मुफ्त वादें नागरिको को आलसी, कमजोर, निर्लज, नाकारा, बनाती जा रही है। देश के उच्चतम न्यायालय ने भी लोकलुभावन घोषणाओं में लोगों को प्रलोभन के जाल में फंसते देखा है, और इसीलिए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई ने राजनीतिक दलों को आड़े हाथ लेते हुए कहा था कि, राष्ट्रीय विकास के लिए लोगों को मुख्य धारा में लाने के बजाए रेवड़ी की राजनीति से देश में हम परजीवियों का एक वर्ग तैयार कर रहे हैं। यह भारत देश का दुर्भाग्य है कि, चुनाव से ठीक पहले घोषित रेवड़ियों से लोग काम करने के लिए तैयार नहीं होते। उन्होंने मुफ्त में मिलने वाली सामग्री, राशन और पैसो पर अपने जीवन को आधारित कर लिया है, जिसके लिए नागरिको में जागरुकता लाने की आवश्यकता अधिक है। वर्तमान में देशभर में अनेक मुफ्त योजनाओं में करोड़ो नागरिक लालच में स्वयं के स्वाभीमान को खोते जा रहे हैं। भारतीय राजनीति में आरविंद केजरीवाल ने रेवड़ी राजनीति के सारे समीकरण बदल दिए, मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त परिवहन से मुफ्तखोरी की राजनीति को अलग स्तर पर ले गए, जो की जनकल्याण और देश के विकास पर बोझ है। कांग्रेस भले ही चुनावों में विजय प्राप्त नहीं कर पाई हो लेकिन उसने भी चुनाव जीतने के लिए बड़े-बड़े वादों के दावे किए। भाजपा भी रेवड़ी संस्कृति के सम्पर्क से दिल्ली में 27 वर्ष बाद अपने ध्वज को फहराने मे सफल हुई थी वहीं बंगाल, असम जैसे राज्यों में भी सफलता का ढ़ोल बजाया। संविधान में निर्दिष्ट राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में केंद्र और राज्य सरकारों को नागरिकों का जीवन स्तर सुधारने के लिए आवश्यक कदम उठाने के निर्देश है परंतु सरकारों ने तो निशुल्क सुविधाएं चलाकर आर्थिक स्थिती को दरकिनार कर दिया।
कुछ लोगों का मत है कि, जो अत्यंत निर्धन वर्ग के लोग है उन्हें सुविधाएं मिलती है तो ठीक भी है लेकिन प्रश्न यही है कि उनको भी कब तक निशुल्क सुविधाएं मिले, क्योंकि हमेशा देखा गया है सुविधाओं को पाने के लिए कामचोर लालची वर्ग अपने आप को गरीबी रेखा से नीचे दर्शाने के लिए अति निर्धन भी बन जाते हैं। फिर राजनैतिक दल अपनी रोटियां सेकने के लिए रेवड़ियों का साधन चुनते हैं और उन निर्धनों के साथ करोड़ो जनता को मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी देकर निठल्ला बनाते हैं। देश में जानबूझ कर सोते रहने वालो की संख्या में बड़ोत्तरी होती जाती हैं और कामकाजी लोग कम होते जा रहे हैं इसीलिए भी जागरुकता की रैली में मुठ्ठीभर लोग ही शामिल हो पाते हैं।
वंचितों को वितरणात्मक प्रणाली से जोड़ कर मुख्यधारा में लाने का प्रयास स्वाभाविक है किंतु अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने में सरकारी खजाने को कितनी बड़ी कीमत चुकानी होती है इसका अंदाजा लगना आम जनता के लिए मुश्किल है ही, क्योंकि भ्रष्टाचार का जन्म इसी प्रकार से ऐसे ही स्थानों से होता है। साथ ही साथ मुफ्त सुविधा की योजनाओं से सरकार जनता को निठल्ला और नाकारा बना रही है जो कि आने वाले युवा पीढ़ी के लिए घातक है। मनोवैज्ञानिक दृष्टीकोण से देखा जाए तो लोगों को बहुत कुछ वस्तुएं सहजता से प्राप्त हो जाने की स्थिति में उनका पुरुषार्थ का भाव धीरे-धीरे घटने लगता है।सुविधा तो ऐसी दी जानी चाहिए कि, व्यक्ति उस सुविधा को पा कर अपने विकास की ओर अग्रसर होने की शुरुआत करे जिससे धीरे-धीरे वह सुधार की स्थिती में तो आएगा ही और बेकार लालची भी नहीं बनेगा।
सुविधाएं लेने वालों को समझदार होने की तरफ जागरुक करना होगा अन्यथा इसका मुल्य किस तरह घातक हो सकता है आप और हम उस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। रेवड़ी राजनीति या मुफ्त सुविधाओं के परिणाम से होने वाली हानियों का फल राजनीतिक दल नहीं लेगे इसका घातक मुल्य जनता को ही चुकाना होगा, और ऐसा मुल्य चुकाना होगा कि आने वाली पीढ़ी को उचित स्तर के जीवन के लिए आवश्यक सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ेगा, जहां शिक्षा और स्वास्थ्य का स्थान प्रमुख होगा। यहां इस बात की प्राथमिकता में श्रेष्ठता है कि भूखे को भोजन करवाने से कई गुना अधिक यह श्रेयस्कर है कि उस भूखे को वह कौशल या तौर तरिके सीखाए जाए जिससे भूखमरी कभी भी उसे या उसके परिवार के पास न आए। साथ ही इसके सरकार द्वारा लोगों को कार्य करने और विकासशील होने के लिए प्रेरित करना होगा। मुफ्त की इन सुविधाओं से चुनाव तो जीते जा सकते हैं, मगर भविष्य में इसकी बहुत बड़ी किमत उन्हीं को चुकानी होगी जिन्होंने लोभ लालच में मुफ्त सुविधाओं के लिए मतदान किया होता है। जनता को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि, राजनीतिक दलों की ये आकर्षक स्कीमें महज अस्थायी राहत देती है। जब दी जाने वाली मुफ्त सुविधाओं पर अध्ययन किया गया जिसमें सुविधाओं का आर्थिक, सामाजिक, नैतिक प्रभाव की जांच की गई। तब इस विश्लेषण में लोगों की निर्भरता सुविधाओं पर बढ़ती हुई पाई गई। असमानता और मतदाता के गलत व्यवहार की बढ़ती संभावना का भी आंकलन किया गया। अध्ययन में यह भी पाया गया कि, इन मुफ्त सुविधाओं और योजनाओं के लिए संसाधन जुटाने के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी आवश्यक सेवाओ में कटौती की जाती है। दीर्घकालिन विकास में बाधा आती है और आत्मनिर्भरता के साथ रोजगार सृजन में भी कमी होती है।
मुफ्त सुविधाओं को देने के लिए सरकार को अतिरिक्त धन की आवश्यकता होती है, जिसके लिए सरकारों को कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है जिससे क्रेडीट रेटींग में गिरावट की संभावना रहती है। पंजाब में मुफ्त सुविधाओं की राजनीति इसका जीता जागता उदाहरण है, और तमीलनाड़ु उसी उदाहरण की श्रेणी में है।सीधी बात समझने की आवश्यकता है कि, चुवानी वादों में मुफ्त सुविधाओं का लोभ लालच है उसका सीधा अर्थ है नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता का प्रभावित होना, जिससे अल्पकालिन लाभ संभावित है।
प्रश्न यह भी है कि मुफ्त सुविधाओं से देश की गरीबी मिटाने के प्रयास सार्थक सिद्ध हो सकते है या वह सिर्फ राजनीति दलों की चाल है।