सीमा सुरक्षा सर्वोपरि , संयुक्त राष्ट्र की हठधर्मिता की परवाह नहीं।

डॉ बालाराम परमार

भारत एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य और एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाला संप्रभु राष्ट्र है। उसकी मिट्टी, उसकी सीमाएं, उसके नागरिकों का जीवन और सम्मान, यह सब किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच से ऊपर हैं।

संयुक्त राष्ट्रसंघ (UNO) ने 18 जून 2026 को भारत-बांग्लादेश सीमा पर लोगों को जबरन धकेलने (push-ins) के मामलों पर चिंता जताई। यूएनओ ने दोनों देशों से अपील की कि वे इस मुद्दे को बातचीत के माध्यम से हल करें और लोगों के मानवाधिकारों और मानवीय गरिमा का पूरा सम्मान करें। अब समाचार है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत से बांग्लादेश सीमा पर तारबंदी रोकने को कहा है। यदि यह सूचना सही है तो यह केवल भारत की आंतरिक नीति में हस्तक्षेप ही नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता पर सीधा प्रहार है। क्योंकि यह वही संयुक्त राष्ट्रसंघ (UNO) है जो बांग्लादेश में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान हिंदुओं के खिलाफ लक्षित हिंसा और हत्याओं के कई मामले सामने आने तथा बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद और मानवाधिकार समूहों के अनुसार अल्पसंख्यकों पर 2,700 से अधिक हमले हुए और एक सौ से अधिक हिंदुओं की जाने गई। जनवरी और फरवरी 2026 के बीच ही 11 हिंदुओं की हत्याएं हुई और संयुक्त राष्ट्र संघ के कान पर जूं तक नहीं रेंगी! इसका सीधा अर्थ यही है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के पांचों स्थाई सदस्य देश दोहरा चरित्र अपनाते हैं। दुनिया के सबसे बड़े संगठन के दोहरे मापदंड को देखते हुए एक जिम्मेदार नागरिक के नाते मेरा मानना है कि इस आदेश को अस्वीकार करना ही भारत के हित में है।

पिछले दो दशकों में संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका निरंतर क्षीण हुई है। वह मंच जो विश्व शांति और मानवता की रक्षा के लिए बना था, आज स्वयं शक्तिहीन दिखाई देता है। सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य देश खुले रूप में एक दूसरे के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए हैं। एक देश दूसरे देश की सीमाओं में घुसकर हमला कर रहे हैं। दूसरे की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए प्रतिबंध लगा रहे है। दुसरे राष्ट्रों की आंतरिक नीति में हस्तक्षेप कर रहे है। यूक्रेन में जो हो रहा है, मध्य पूर्व में जो चल रहा है, दक्षिण चीन सागर में जो तनाव है, लेबनान की स्थिति जो है, ईरान पर जो दबाव है, दक्षिण कोरिया के आसपास जो सैन्य अभ्यास हो रहे हैं, इन सब घटनाओं में संयुक्त राष्ट्र केवल वक्तव्य जारी करता है। प्रस्ताव पारित होते हैं, पर धरातल पर कुछ नहीं बदलता। जब संयुक्त राष्ट्र स्वयं अपने स्थाई सदस्यों को नियंत्रित नहीं कर पा रहा, तो वह भारत को सीमा प्रबंधन के लिए आदेश कैसे दे सकता है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने इराक पर हमला किया। रूस ने यूक्रेन में सैन्य अभियान चलाया। चीन ने दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप बनाए। यूरोप के अनेक देश अपने राष्ट्रीय हित में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों की अवहेलना कर चुके हैं। ईरान पर प्रतिबंध, लेबनान में संघर्ष।इन सबके बीच संयुक्त राष्ट्र मूक दर्शक बना हुआ है। जब स्थाई सदस्य देश अपने हित के लिए संयुक्त राष्ट्र की अनदेखी कर सकते हैं, तो भारत क्यों चुप रहे। भारत एक प्राचीन लोकतांत्रिक सभ्यता पौषक , एक युवा लोकतंत्र वाहक, और एक जिम्मेदार राष्ट्र है।

बांग्लादेश की सीमा भारत के लिए वह नासुर स्थान है जहां से घुसपैठ होती है, तस्करी होती है, नकली मुद्रा आती है, हथियार आते हैं, और आतंकी प्रवेश करते हैं। असम, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, मेघालय के गांवों में रहने वाले किसान जानते हैं कि रात के अंधेरे में सीमा पार से क्या आता है। मवेशी की तस्करी से लेकर मानव तस्करी तक, हर समस्या की जड़ यही खुली सीमा है। तारबंदी इस समस्या का सबसे व्यावहारिक, मानवीय और राजनीतिक समाधान है। यह समाधान भारत ने अपने 79 सालों के प्रत्यक्ष कड़वे अनुभव के आधार पर निकाला है। चीन , पाकिस्तान,बांग्लादेश और म्यांमार की सीमा रेखा भारत के सैनिकों के खून से सनी हुई है।

राष्ट्र की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा का प्रश्न किसी असहाय संस्था के मत पर नहीं छोड़ा जा सकता। संविधान ने भारत सरकार को यह अधिकार दिया है कि वह नागरिकों के जीवन की रक्षा करे। यदि सीमा सुरक्षित नहीं होगी, तो भीतर का विकास अधूरा रहेगा। विद्यालय बनेंगे पर बच्चे भय में पढ़ेंगे। पाकिस्तान, चीन , बंग्लादेश और म्यांमार सीमा पर 79 वर्षों से यही हो रहा है। इसलिए सीमा पर तारबंदी, निगरानी, तकनीक का प्रयोग, यह सब भारत का आत्मरक्षा का अधिकार है।

इतिहास गवाह है कि जब भी भारत ने कठोर राष्ट्रीय हित के निर्णय लिए हैं, कुछ राजनीतिक दल सड़क पर उतरे हैं। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, वामपंथी दल, और अन्य अवसरवादी समूह हर बार भारत की सुरक्षा नीति को अंतरराष्ट्रीय मंच पर कमजोर करने का प्रयास करते हैं। वे मानवाधिकार की बात करते हैं, पर सीमा पर मारे गए बीएसएफ के जवान के कफ़न पर मौन रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून की दुहाई देते हैं, पर बांग्लादेश- म्यांमार से अवैध रूप से आए घुसपैठियों की काली करतूतों पर चुप रहते हैं। उनका विरोध सत्ता के गणित से प्रेरित है।

विभाजन के समय अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा भारत-पाकिस्तान के बीच रैडक्लिफ रेखा, भारत और चीन के बीच मैकमोहन (McMahon Line) और इसके वास्तविक नियंत्रण रेखा LAC (Line of Actual Control) नियंत्रण रेखा है जो 1962 के युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच वास्तविक सीमा निर्धारण से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जी ने छिपाई थीं। वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन के इसारे पर 17 अगस्त 1947 अर्थात आजादी के दो दिन बाद तक भारत सरकार द्वारा नक्शे सार्वजनिक न होने के कारण करोड़ों लोग 17 अगस्त तक असमंजस में थे कि वे किस देश का हिस्सा हैं। इस अनिश्चितता ने बड़े पैमाने पर खूनी दंगों और पलायन को जन्म दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी , गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से 140 करोड़ नागरिक की ओर से अपील है कि आप इन आंतरिक विरोध से भयभीत न हों। 2024 के लोकसभा चुनाव में भले ही 400 पार का आंकड़ा नहीं दिया, पर 293 सीटें देकर आपको सत्ता सौंपी है। कांग्रेस को 99 पर रोक कर एनडीए को इसलिए चुना है कि आप कठिन निर्णय ले और राष्ट्रहित को दलगत राजनीति से ऊपर रख सकें।

जब अमेरिका अपने हित में संयुक्त राष्ट्र को किनारे रख सकता है, जब रूस अपने भूभाग की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय आलोचना की परवाह नहीं करता, जब चीन ताइवान जलडमरूमध्य में अपना वर्चस्व स्थापित कर सकता है, तो भारत अपनी आंतरिक सुरक्षा के लिए तारबंदी में क्यों नहीं कर सकता।भारत की विदेश नीति सदैव वसुधैव कुटुंबकम की रही है। हम पड़ोसी से युद्ध नहीं चाहते। बांग्लादेश हमारा मित्र देश है। हमारे सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, आर्थिक संबंध गहरे हैं। पर मित्रता का अर्थ यह नहीं कि हम अपनी सीमा घुसपैठियों के लिए खुली छोड़ दें। तारबंदी बांग्लादेश के विरुद्ध नहीं है। तारबंदी उन तत्वों के विरुद्ध है जो दोनों देशों के संबंधों को विषैला बनाते हैं। तारबंदी उन तस्करों के विरुद्ध है जो सीमा को ‘नो मैन्स लैंड’ (No Man’s Land बनाना चाहते हैं। तारबंदी उन आतंकियों के विरुद्ध है जो दोनों देशों की शांति को भंग करना चाहते हैं। अब पश्चिम बंगाल नवोदय राज्य है, जहां पूर्ण बहुमत वाली भाजपा सरकार है।एक राष्ट्र की शक्ति उसकी सरकार की इच्छाशक्ति से मापी जाती है। भारत की इच्छाशक्ति आज प्रबल है। देश की जनता ने अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को समाप्त होते देखा है। देश ने सर्जिकल स्ट्राइक होते देखी है। देश ने बालाकोट में वायुसेना का पराक्रम देखा है। देश ने गलवान में सेना का शौर्य देखा है। पहली बार देश के प्रधानमंत्री को 35 राष्ट्रों द्वारा सर्वोच्च सम्मान देते देखा।इसलिए सरकार से आग्रह है कि तारबंदी का काम पूरे वेग से चलता रहे।

जय हिंद। वंदे मातरम।

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