शीश पड़े पण पाग नहीं18 जून 2026 — हल्दीघाटी के 450 वर्ष — संकल्प, साहस और अजेय भारतीयता के उत्सव का दिवस।

लेखक: सुमित गर्ग
18 जून याद दिलाता है अरावली की पहाड़ियों में गूंजते जय मेवाड़ के नारों की, बरछी-भालों की झंकार की, चेतक की टापों की, और इन सबको चीरते हुए महाराणा के उस उद्घोष की जो सदियों से मेवाड़ की मिट्टी में रचा-बसा है — “शीश पड़े पण पाग नहीं!” यह केवल एक पंक्ति नहीं, यह एक प्रतिज्ञा है। 18 जून 2026 को हल्दीघाटी के उस अमर संग्राम के साढ़े चार सौ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं — और यह दिवस पराक्रम के उत्सव का है। उत्सव इस सत्य का कि जब तक किसी भारतीय के भीतर संकल्प, सहनशक्ति और अदम्य धैर्य जीवित है, तब तक संसार की कोई भी शक्ति उसे पराजित नहीं कर सकती। महाराणा प्रताप का जीवन इसका सबसे प्रत्यक्ष, सबसे प्रखर प्रमाण है।
पाग — सिर का वस्त्र नहीं, कुल और राष्ट्र का मानराजपूताने की परंपरा में पाग केवल वस्त्र नहीं थी। वह कुल की प्रतिष्ठा, वंश का गौरव, और मातृभूमि के प्रति निष्ठा का प्रत्यक्ष प्रतीक थी। पाग का झुकना अर्थात समर्पण, अर्थात पराजय की स्वीकृति। शीश कट सकता था, रक्त बह सकता था, परिवार भूखा सो सकता था — पर पाग नहीं झुकती थी। यह सिद्धांत आज भी अडिग है।
मेवाड़ी कविरत्न कन्हैया लाल जी सेठिया के अनुसार महाराणा के संकल्प की सबसे जीवंत अभिव्यक्ति मिलती है, जब महाराणा प्रताप ने बीकानेर के राजकुमार पृथ्वीराज राठौड़ को — जो मुग़ल दरबार में रहकर भी महाराणा के हितैषी बने रहे — एक काव्य-संदेश भेजा। यह संदेश केवल पृथ्वीराज के लिए नहीं था; यह हर मेवाड़ी के लिए एक आह्वान था कि जब तक मैं जीवित हूँ, तुम अपनी मूँछों को गर्व से ऊँचा रख सकते हो:राखो थे मूंछ्याँ ऐंठ्योड़ी,लोही री नदी बहा द्यूंला,हूँ अथक लडूंला अकबर स्यूँ,उजड्यो मेवाड़ बसा द्यूंला। अर्थात — तुम अपनी मूँछें गर्व से तने हुए रखो, मैं रक्त की नदियाँ बहा दूँगा, मैं अकबर से अथक संघर्ष करूँगा, और उजड़े मेवाड़ को फिर से बसाऊँगा। यह कोई व्यक्तिगत दर्प नहीं था — यह सम्पूर्ण मेवाड़ समाज को दिया गया एक अभय-वचन था, कि तुम्हारे स्वाभिमान की रक्षा का भार मैंने अपने ऊपर ले लिया है। और इतिहास साक्षी है कि यह वचन शब्दशः सत्य सिद्ध हुआ।हल्दीघाटी: गाथा का प्रारंभ, अंत नहीं 18 जून 1576 को हल्दीघाटी की संकरी घाटी में जो युद्ध लड़ा गया, वह संख्या के तराज़ू पर असमान था। मानसिंह के नेतृत्व में विशाल मुग़ल सेना के सामने महाराणा प्रताप के पास सीमित बल था — पर साथ था भील समुदाय का अप्रतिम सहयोग, हकीम खां सूर जैसे वफ़ादार साथी, झाला मान का बलिदान जिन्होंने स्वयं राजचिह्न धारण कर महाराणा के प्राणों की रक्षा की, और चेतक का वह अंतिम समर्पण जो आज भी हर भारतीय की आँखें नम कर देता है।जो लोग हल्दीघाटी को “पराजय” के रूप में चित्रित करने का प्रयास करते हैं, वे इतिहास के साथ अन्याय करते हैं। हल्दीघाटी मेवाड़ के संघर्ष का समापन नहीं था — वह तो प्रारंभ था एक ऐसी गाथा का, जिसने अगले छह वर्षों तक मुग़ल साम्राज्य की नींद उड़ा रखी थी।अरावली के वर्ष: संघर्ष की तपस्याहल्दीघाटी के पश्चात के वर्ष महाराणा प्रताप के जीवन की सबसे कठिन तपस्या के वर्ष थे। पत्नी और पुत्रों के साथ वन-वन भटकना, घास की रोटी पर जीवन यापन, और वह क्षण जब एक भूखे बालक की रोटी बिल्ली ले उड़ी — यह सब केवल कष्ट की गाथा नहीं, यह संकल्प की परीक्षा थी। और इस परीक्षा में मेवाड़ का साथ दिया भामाशाह ने, जिनका धन-दान सामाजिक समरसता का जीवंत प्रमाण था कि मेवाड़ की रक्षा किसी एक वर्ण या जाति का दायित्व नहीं, सम्पूर्ण समाज का कर्तव्य था।
दिवेर 1582: निर्णायक विजय और छत्तीस चौकियों की मुक्ति जहाँ हल्दीघाटी संघर्ष की शुरुआत थी, वहीं 1582 का दिवेर युद्ध उस संकल्प की पूर्णता थी जो “उजड्यो मेवाड़ बसा द्यूंला” के वचन में निहित था। मुग़ल सूबेदार सुल्तान खां के नेतृत्व में आई सेना को महाराणा प्रताप ने ऐसी रणनीतिक चतुराई से घेरा कि संकरी घाटी में मुग़ल सेना की गति ही उसका सबसे बड़ा शत्रु बन गई। स्वयं महाराणा प्रताप ने इस युद्ध में प्रत्यक्ष रणकौशल दिखाया — कथाओं में वर्णित है कि उन्होंने मुग़ल सेनापति बहलोल खां पर इतने सशक्त भाले का प्रहार किया कि वह प्रहार सेनापति को भेदते हुए उसके घोड़े तक को चीर गया। यह केवल शक्ति-प्रदर्शन नहीं था; यह उस संकल्प की चरम अभिव्यक्ति थी जो वर्षों के वनवास, क्षुधा और कष्ट के पश्चात भी तनिक भी क्षीण नहीं हुआ था।
दिवेर की इस निर्णायक विजय के पश्चात महाराणा प्रताप की सेनाओं ने मेवाड़ भर में फैली मुग़ल चौकियों — परंपरागत रूप से लगभग छत्तीस थानों/चौकियों के रूप में स्मरण की जाने वाली — को एक के बाद एक मुक्त कराया। चित्तौड़, अजमेर और मांडलगढ़ के अतिरिक्त सम्पूर्ण मेवाड़ पुनः स्वतंत्र हो गया। यह केवल भूमि की पुनर्प्राप्ति नहीं थी — यह उस प्रतिज्ञा की पूर्णता थी जो हल्दीघाटी के पश्चात ली गई थी। इस विजय का प्रभाव इतना गहरा था कि इसके पश्चात अकबर ने मेवाड़ की ओर कभी कोई बड़ा सैनिक अभियान नहीं भेजा। साम्राज्य का ध्यान उत्तर-पश्चिमी सीमाओं की ओर मुड़ गया, और मेवाड़ व्यवहारतः स्वतंत्र बना रहा। मुग़लों ने पुनः कभी मेवाड़ की ओर मुख नहीं किया — यही महाराणा प्रताप के जीवन की सबसे बड़ी सफलता है।इतिहास के विरूपण के विरुद्ध आज जब कुछ कथित विमर्शकार हल्दीघाटी को पराजय और मुग़ल वर्चस्व की स्थापना के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं, तो यह केवल ऐतिहासिक भूल नहीं — यह एक सायास प्रयास है उस आत्मगौरव को कुंठित करने का, जो भारतीय जनमानस की रीढ़ है। सम्पूर्ण आख्यान देखें तो स्पष्ट है — मेवाड़ कभी मुग़ल अधीनता में नहीं आया, महाराणा प्रताप ने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया, और दिवेर के पश्चात तो मुग़ल साम्राज्य स्वयं मेवाड़ से दूर रहने को विवश हो गया। यही इतिहास का सत्य है।
उपसंहार: मूँछें आज भी ऐंठी हुई हैं, पाग आज भी ऊँची है 450 वर्ष बीत गए, पर वह उद्घोष आज भी प्रासंगिक है — “शीश पड़े पण पाग नहीं।” यह दिवस इस बात का उत्सव है कि एक संख्या अथवा आयुध में अल्प योद्धा भी यदि अपने संकल्प पर अडिग रहे, तो बड़े से बड़ा साम्राज्य भी उसके आगे थक कर झुक जाता है। महाराणा प्रताप ने हमें सिखाया कि संकल्प, सहनशक्ति और धैर्य — यही वह त्रिवेणी है जिसके सामने कोई भी शक्ति टिक नहीं सकती। राखो थे मूंछ्याँ ऐंठ्योड़ी — आज भी हर भारतीय यह मूँछ गर्व से ऐंठ सकता है, क्योंकि वह वचन आज भी हमारी सामूहिक स्मृति में जीवित है। जब तक एक भी भारतीय के अंदर महाराणा के समान वीरता और मातृभूमि प्रेम है तब तक भारत सुरक्षित है।—
जय मेवाड़, जय महाराणा, जय भारत —