संस्कृति को अपने रंगों में सहेजता जनजाति समाज का भगोरिया उत्सव।

।रिंकेश बैरागी,
विश्व में अपनी संस्कृति से एक अलग ही पहचान बना चुका भगोरिया उत्सव इस वर्ष 24 फरवरी से शुरु हो गया है। जनजाति क्षेत्र में होली पर्व से पहले लगने वाले हाट, बाजार को भगोरिया हाट के रुप में मनाकर जनजातिय लोग अपनी संस्कृति के अनुरुप ही अपनी परंपरा का निर्वहन करते हैं और अपनी सभ्यता की साख को निरंतर रखते हैं। उत्साह उल्लास के उत्सव में युवक और युवतियां बड़े बुजुर्ग अपने पारंपरिक वस्त्र, आभूषण धारणकर भगोरिया हाट में आनंद उल्लास के लिए आते हैं और टोली के रुप में भगोरिया नृत्य करते हैं। जनजाति क्षेत्र की अद्भूत संस्कृति ने जनजाति समाज को देश में विशिष्ट पहचान दिलवाई है। भारत वर्ष में अनेको त्यौहार, रीतिया, परम्पराएं है किंतु होली पर्व से पहले पड़ने वाले हाट बाजार को मनाए जाने वाला यह भगोरिया उत्सव अपने अंदर अनेको विशेषता के साथ जन-जन के लिए महत्वपूर्ण बन गया है। 24 फरवरी से शुरु होने वाला भगोरिया हाटोत्सव 2 मार्च तक चलेगा सिर्फ झाबुआ जिले में ही 35 स्थानों पर भगोरिया मेले का आयोजन किया जाएगा और प्रत्येक मेले में 50 हजार से अधिक लोगों के आने की संभावना होती है इसी अनुसार मालवा निमाड़ के सेकड़ो स्थानों पर भगोरिया मेले की मिठास महसूस होगी। मेले में पास पड़ोस के ग्रामीण अपनी-अपनी टोलियों में आते है कुछेक समुह या समितियां अपने ढोल मांदल साथ लाते हैं तो कुछ टोलिया ढोल मांदल के साथ स्वतः ही जुड़ जाती है। व्रत, उपवास करने वाले और मन्नतधारी आस-पास से सभी भगोरिया हाट में जाकर भ्रमण करते हैं, उनकी पहचान अपने आप में भिन्नता लिए आकर्षक होती है, मन्नतधारी पूरे शरीर पर हल्दी का लेप लगाए हुए और हाथ में श्रीफल लिए होते हैं। धोती, पगड़ी पर हल्दी लगाकर मन्नतधारी भगोरिया हाट में घुमकर होली पर्व मनाते हुए गलदेवता पर अपनी मन्नत को उतारते हैं।

जनजाति क्षेत्रों में होली पर्व का भी अत्यधिक विशेष महत्व होता है यहां होलीका पर्व से सात दिन पहले और होली के सात दिवस बाद तक इस त्योहार को बहुत ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया जाता है। होली के पूर्व तो अपने क्षेत्र के हाट को भगोरिया हाट लगाते है उसके पश्चात होली धुलेटी, उसी दिन दोपहर पश्चात गलदेव पर मन्नत फिर पंचमी और शितला सप्तमी तक रंग गुलाल से खेला जाता है। भगोरिया पर्व में संस्कृति की आदर्श छटा बिखेरते हुए पारंपरिक नृत्य में शामिल होकर अपने परिधान की सुंदरता के साथ समाजजन अपनी विशिष्ट सभ्यता का परिचय देते हैं। इन मेलो की विशिष्टता को निहारने के लिए अन्य राज्यों के साथ विदेश से भी पर्यटक आते हैं यहां तक की इस परंपरा की अद्भूत और विशाल उल्लासिता को अपने मानस पटल पर अंकित करते हुए यहां के क्रियाकलापो के चित्र और चलचित्रों को भी सहेज कर ले जाते हैं।पारंपरिक और सांस्कृतिक उत्सव में जनजाति संस्कृति के गाढ़े रंग में घुलती हुई भगोरिया की सुंदरता में राजनीति के रंग ने भी अपनी प्राथमिकता को प्रदर्शित किया है। हर वह स्थान जहां भगोरिये मेले का आयोजन किया जाता है वहां पर भाजपा कांग्रेस जैसे राजनैतिक दल अपनी-अपनी गैर निकलते हैं जिसमें हजारो की संख्या में ग्रामीणों को सम्मिलीत भी किया जाता हैं। राजनीतिक दल प्रमुख अपनी टोली के सदस्यों के लिए देशी-विदेशी, कच्ची मदिरा का प्रबंध करवाता है फिर गैर में कुर्राटी भरते हुए व्यक्ति अपने मस्ती में मस्त मांदल की थाप पर जमकर नाचता है। इस गैर में नेता, विधायक, सांसद, सभी प्रकार के प्रतिनीधि, जिलाध्यक्ष आदि नेता ढोल मांदल को गले में डालकर उसे ताल में बजाते हैं।प्रेम और उल्लास के उत्सव में लोग भगोरिया में मिलते है, दुख दर्द बांटकर खुशियों भरे नए जीवन का आरंभ करते हुए अपने कार्यों को भी नई दिशा देते हैं। भगोरिया हाट के लिए पलायन पर गए सभी लोग भगोरिया उत्सव सामिल होने के लिए आ जाते हैं, और होलिका पर्व मनाने के बाद फिर से रोजी रोटी कमाने के लिए पलायन कर जाते हैं।
हालांकि भगोरिया पर्व या फिर युं कह ले कि इस विशेष हाट की शुरुआत बरसो बरस पहले राजा भोज के समय भील राजा कसूमर और राजा बालून ने अपनी राजधानी भगोर में व्यापार व्यवसाय और संस्कृति को बढ़ाने के उद्देश्य से अपने पारंपरिक रुप को रखते हुए इस विशेष हाट का आरंभ किया था। जिसमें दूर दराज से लोग व्यापार करने आते थे, साथ ही सभी का एक दूसरे से मिलना हो जाता था, और जीवन यापन के अनुभव भी एक-दूसरे से सांझा हो जाते थे।बहरहाल, भगोरिया हाट में महिनो से बिछड़े लोग आपस में मिलते हैं, अपनी संस्कृति को शक्ति प्रदान कर उसके शुद्ध प्रयोजन को पूरा करते हुए पारंपरिक नृत्य के साथ प्रकृति में अपनी सभ्यता को निरंतर आगे बढ़ाने के सफल प्रयास को पूर्ण करते हैं। भागोरिया पर्व में प्रशासन का भी विशेष योगदान रहता है। सुरक्षा की दृष्टी से प्रशासन का चाक चौबंध व्यवस्था रहती है। पुलिस हर तरफ सुरक्षा की दृष्टी से चौकन्नी रहती हुई प्रत्येक चौराहे और प्रमुख स्थान पर तैनात रहती है। वहीं आपदा प्रबंधन की भी विशेष तैयारी के साथ प्रशासन हर पल मेले में दृष्टी जमाए रखता है।