रक्षाबंधन :- एक धागा, अनेक अर्थ, तथ्य, परंपरा और जनश्रुति।

*बांगरु-बाण***श्रीपाद अवधूत की कलम से,

श्रावण मास की पूर्णिमा आते ही मन में सबसे पहले राखी का चित्र उभरता है। बहन भाई की कलाई पर राखी बाँधती है, तिलक करती है, मिठाई खिलाती है और भाई उसके सुख, सम्मान तथा सुरक्षा का संकल्प लेता है लेकिन क्या रक्षाबंधन केवल भाई-बहन का पर्व है..? यदि हम भारत की प्राचीन परंपराओं, वेदों, पुराणों और अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में प्रचलित लोकाचार को देखें तो इसका उत्तर है….. नहीं…!!!! रक्षाबंधन का वर्तमान भाई-बहन वाला रूप अत्यंत सुंदर और लोकप्रिय है, लेकिन इसके पीछे छिपी रक्षा-सूत्र की परंपरा इससे कहीं अधिक प्राचीन और व्यापक है।

आज *रक्षाबंधन के नाम पर जो पाखंड, आडंबर एवं कर्मकांड बताए जा रहे हैं, किए जा रहे हैं।* जैसे *”भद्रा में रक्षाबंधन ना करें।” “पंचक लग गया, राखी मत खरीदो।” “कूरियर मत करो।” “राखी घर से बाहर मत भेजो।” “मुहूर्त निकल गया तो दोष लगेगा।” “तिलक ऐसे लगाएं।” “कुमकुम इस तरह लगाएं ।”* कुछ ज्योतिषी *“राशि के अनुसार राखी का रंग” जैसे मेष को लाल राखी, वृषभ को सफेद, मिथुन को हरी, राखी बांधने की सलाह दे रहे हैं।* आज कंपनियाँ और संस्थाएँ बड़े पैमाने पर कॉर्पोरेट राखी पैकेज बनाती हैं। *राखी + मिठाई + चॉकलेट + ड्राई फ्रूट + गिफ्ट कार्ड + परफ्यूम + महँगा पैकेज।* यह व्यापार है। व्यापार होना अपराध नहीं। लेकिन जब इसे “यही असली रक्षाबंधन” जैसा रूप दिया जाता है, तब *पर्व का मूल भाव बाजार के पीछे चला जाता है।* एक और *नया आडंबर जो सोशल मीडिया पर वायरल होने के लिए किया जा रहा है ।

राखी बाँधी → फोटो → वीडियो → रील → स्टेटस → “Best Brother in the World”* फोटो रखना गलत नहीं। जिस भाई-बहन से सालभर बात नहीं करते, उससे *राखी के दिन केवल फोटो खिंचवाकर “अटूट बंधन” लिख देना। यह संस्कार नहीं, प्रदर्शन है।* *रक्षाबंधन का मूल भाव क्या है…?**“रक्षा-बन्धन”—अर्थात् रक्षा का बंधन। किसी के जीवन, आयु, बल, स्वास्थ्य, सम्मान अथवा मंगल की कामना करते हुए उसके साथ एक सूत्र द्वारा अपना शुभ-संकल्प जोड़ देना।*यही कारण है कि *भारतीय परंपरा में रक्षा-सूत्र केवल बहन भाई को ही नहीं बाँधती। पुरोहित यजमान को रक्षा बाँधता है, राजा को राजपुरोहित रक्षा बाँधता था*, अनेक धार्मिक अनुष्ठानों में आज भी व्यक्ति की कलाई पर *रक्षा-सूत्र बाँधा* जाता है और विभिन्न स्थानों पर वृक्षों तथा प्रकृति के प्रति संरक्षण का संकल्प व्यक्त करते हुए उन्हें राखी बाँधने की परंपरा दिखाई देती है। अर्थात् रक्षा का भाव भाई-बहन से बहुत बड़ा है।

वेदों में रक्षासूत्र की प्राचीन परंपरा* आज की राखी को सीधे वेदों में खोज लेना उचित नहीं होगा। वेदों में श्रावण पूर्णिमा के दिन बहन द्वारा भाई की कलाई पर आधुनिक राखी बाँधने का स्पष्ट विधान नहीं मिलता लेकिन रक्षा के लिए मंत्रपूर्वक किसी वस्तु को बाँधने की परंपरा अत्यंत प्राचीन है।*अथर्ववेद 1.35.1 में कहा गया है **यदाबध्नन् दाक्षायणा हिरण्यं शतानीकाय सुमनस्यमानाः।* *तत्ते बध्नाम्यायुषे वर्चसे बलाय दीर्घायुत्वाय शतशारदाय॥*अर्थात्*“दाक्षायणों ने प्रसन्न मन से शतानीक के लिए जो हिरण्य बाँधा था, वही मैं तुम्हारे लिए बाँधता हूँ आयु, तेज, बल और सौ शरदों की दीर्घायु के लिए।”

**अथर्ववेद* के अगले मंत्र में इसे धारण करने वाले को राक्षस और पिशाच आदि से रक्षा तथा दीर्घायु प्राप्त होने की बात कही गई है। यही मंत्र-परंपरा *शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता 34.52 में भी मिलती है।* ध्यान देने की बात यह है कि यहाँ आज की रंगीन राखी नहीं है, बल्कि हिरण्य अर्थात् स्वर्ण को रक्षा और दीर्घायु के संकल्प के साथ बाँधने की बात है इसलिए सही बात यह होगी कि *”रक्षाबंधन का वर्तमान स्वरूप वेदों में नहीं, लेकिन रक्षासूत्र की मूल धार्मिक अवधारणा वैदिक ही है।”**श्रावण पूर्णिमा केवल राखी का दिन नहीं*आज हम श्रावण पूर्णिमा को मुख्यतः रक्षाबंधन के कारण जानते हैं, लेकिन प्राचीन वैदिक परंपरा में यह दिन श्रावणी, उपाकर्म और ऋषि-तर्पण के कारण भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। रक्षाबंधन के धार्मिक स्वरूप का स्पष्ट विकास बाद के पौराणिक साहित्य में दिखाई देता है।

भविष्य पुराण के उत्तर-पर्व, अध्याय 137. 20 में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बलिरक्षा-विधि बताते हैं। वहाँ “रक्षाबन्ध” का स्पष्ट उल्लेख आता है और राजा की रक्षा के लिए रक्षासूत्र बाँधने का विधान मिलता है।*इसी परंपरा से प्रसिद्ध मंत्र जुड़ा है—*”येन बद्धो बलिः राजा दानवेन्द्रो महाबलः।”**”तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”*इसे सामान्यतया वेद-मंत्र कहा जाता है, लेकिन यह वेद का मंत्र नहीं है। यह पौराणिक रक्षाबंधन परंपरा से संबंधित एक मंत्र है। *यहाँ भी ध्यान देने योग्य बात है कि प्रारंभिक पौराणिक रूप में रक्षासूत्र का संबंध राजा और राजपुरोहित से है, न कि केवल भाई और बहन से।**भविष्य पुराण में इन्द्र और इन्द्राणी की कथा* देवासुर संग्राम के समय इंद्राणी (शची) द्वारा वृत्रासुर से युद्ध पर जाते इंद्र की कलाई पर रक्षासूत्र बांधने की कथा आती है। संस्कारित रक्षा बाँधने के बाद इन्द्र को विजय प्राप्त हुई। इसी कारण रक्षासूत्र को केवल प्रेम का नहीं, संकट में संरक्षण और विजय का प्रतीक भी माना गया। ध्यान दें यह मूलतः पति-पत्नी का प्रसंग है, भाई-बहन का नहीं; भाई-बहन का जुड़ाव बाद में सामाजिक रूप से जुड़ा।

*कृष्ण और द्रौपदी* रक्षाबंधन की सबसे लोकप्रिय कथाओं में कृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग है। लोकपरंपरा के अनुसार कृष्ण की उँगली से रक्त निकलने पर द्रौपदी ने अपने वस्त्र का टुकड़ा फाड़कर उनकी उँगली पर बाँध दिया। बाद में द्रौपदी के संकट के समय कृष्ण ने उसकी रक्षा की। यह कथा रक्षाबंधन के भाव को बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त करती है । जिसे हम प्रेम से बाँधते हैं, उसके प्रति हमारा भी दायित्व बन जाता है। लेकिन इसे मूल महाभारत में श्रावण पूर्णिमा के रक्षाबंधन की कथा कहना उचित नहीं है। यह बाद की लोक-धार्मिक परंपरा में रक्षाबंधन से जुड़ी लोकप्रिय कथा है।

इसी प्रकार *“कृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि वे उसके एक-एक सूत का ऋण चुकाएँगे”—यह भी लोकप्रिय लोककथा का भाग है, लेकिन इसके मूल महाभारत में प्रमाणित संवाद नहीं मिलते।**सिकंदर और पोरस की राखी*एक अन्य लोकप्रिय कथानक है कि सिकंदर की पत्नी ने भारतीय राजा पोरस को राखी भेजी और पोरस ने उसे बहन मान लिया। कथा सुनने में अत्यंत रोचक है, लेकिन *सिकंदर के प्रमुख प्राचीन इतिहासकारों के वृत्तांतों में इसका स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता इसलिए इसे ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बाद की लोकप्रिय किंवदंती या जनश्रुति ही मानना चाहिए।

*इसी प्रकार * चंद्रशेखर आजाद द्वारा एक निर्धन विधवा के हाथ से रक्षा-सूत्र बँधवाने और उसे 5000 रुपये देकर जाने वाली कथा अत्यंत प्रेरक है, लेकिन इसे प्रमाणित ऐतिहासिक घटना कहने के लिए समकालीन प्राथमिक स्रोत नहीं मिलते हैं।* *इतिहास तथ्यों की आंखों से ही देखा जाता है लेकिन किंवदंतियां या जनश्रुतियां वे आख्यान या कहानियां हैं जो लोक कथाओं के रूप में कानों से सुनी जाती हैं।* लोककथाओं का अपना महत्व है, लेकिन लोककथा और इतिहास को एक ही प्रमाण-स्तर पर रखना उचित नहीं है।*भारत में एक पूर्णिमा, अनेक रूप*रक्षाबंधन की सबसे सुंदर विशेषता यह है कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों ने श्रावण पूर्णिमा को अपनी स्थानीय जीवन-व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग रूप दिए हैं।

*महाराष्ट्र और कोंकण — नारळी पूर्णिमा* 🌊🥥महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों में इसे नारळी पूर्णिमा कहते हैं। समुद्र और वरुण की पूजा की जाती है तथा समुद्र को नारियल अर्पित किया जाता है। मछुआरे समुद्र से सुरक्षित यात्रा और समृद्धि की कामना करते हैं। यहाँ *रक्षा का संबंध, भाई की कलाई से नहीं, समुद्र और आजीविका से है।**दक्षिण भारत:- आवणी अवित्तम्*यहाँ श्रावण पूर्णिमा *वेद, ऋषि और स्वाध्याय से जुड़ी है*। यज्ञोपवीत परिवर्तन, ऋषितर्पण और वेदाध्ययन का पुनःआरंभ किया जाता है। अर्थात् ज्ञान की रक्षा।*आंध्र प्रदेश और तेलंगाना:- जन्ध्याला पूर्णिमा*यज्ञोपवीत और उपाकर्म की परंपरा यहाँ विशेष रूप से दिखाई देती है।

*कर्नाटक*उपाकर्म तथा यज्ञोपवीत परिवर्तन की विभिन्न वैदिक परंपराएँ प्रचलित हैं। *ओडिशा — बलभद्र पूजा या गम्हा पूर्णिमा 🌾*यह दिन भगवान बलराम और कृषि से जुड़ा है। बलराम को हल और कृषि से जोड़कर देखा जाता है।यहाँ श्रावण पूर्णिमा का संबंध*कृषि, पशुधन और अन्न-संस्कृति से जुड़ जाता है। **बंगाल और वैष्णव परंपरा — झूलन* श्रावण के अंतिम दिनों में राधा-कृष्ण का झूलनोत्सव मनाया जाता है, जो कई स्थानों पर पूर्णिमा तक चलता है। *यहाँ केंद्र है भक्ति और राधा-कृष्ण प्रेम।* *उत्तर और मध्य भारत कजरी/कजली* मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश {विशेष कर पूर्वांचल में} के कई क्षेत्रों में श्रावण पूर्णिमा *कृषि, वर्षा और स्त्री-लोकपरंपराओं से जुड़ी कजरी/कजली पूर्णिमा के रूप में भी जानी जाती है।* *वैष्णव परंपरा:-हयग्रीव जयंती* कई परंपराओं में इसी दिन भगवान विष्णु के हयग्रीव रूप की पूजा की जाती है, जिन्हें *वेद और ज्ञान के रक्षक के रूप में माना जाता है*।*इस प्रकार एक ही पूर्णिमा…!!!! *समुद्र भी है, वेद भी है, कृषि भी है, ज्ञान भी है, भक्ति भी है और भाई-बहन का प्रेम भी।*विश्व की अन्य धार्मिक परंपराओं में भी पवित्र धागे या सुरक्षा के प्रतीक मिलते हैं।

**बौद्ध परंपराओं* में भिक्षुओं द्वारा पवित्र धागा बाँधने की परंपरा है, जिसमें मंगल और आध्यात्मिक संरक्षण का भाव होता है।*जैन परंपराओं* में भी रक्षासूत्र और रक्षापोटली की धार्मिक परंपराएँ मिलती हैं।*यहूदी लोकपरंपराओं* में लाल धागे को सुरक्षा अथवा बुरी नजर से बचाव के प्रतीक के रूप में देखा गया है। लेकिन *इस्लाम और ईसाई धर्मग्रंथों* में श्रावण पूर्णिमा पर *बहन द्वारा भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधने जैसा धार्मिक पर्व नहीं मिलता।* इससे यह समझ आता है कि रक्षा के लिए पवित्र सूत्र का विचार अनेक संस्कृतियों में मिलता है, लेकिन श्रावण पूर्णिमा का भाई-बहन वाला रक्षाबंधन भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का विशिष्ट रूप है।*”रक्षाबंधन वास्तव में किसकी रक्षा का संकल्प है…? “*संभवत: यही इस पर्व का सबसे सुंदर प्रश्न है। यदि हम केवल यह कहें कि *”बहन भाई को राखी बाँधती है और भाई उसकी रक्षा करता है,” तो हम इस पर्व को बहुत छोटा कर देते हैं।**” रक्षा किसकी?” **” भाई की भी।”**” बहन की भी।” **” परिवार की भी।”**” समाज की भी।”**” प्रकृति की भी।”**” ज्ञान की भी।”**” धर्म की भी।”**” संस्कृति की भी।”*इसीलिए

*महाराष्ट्र का मछुआरा समुद्र से रक्षा माँगता है।**किसान अन्न और वर्षा की रक्षा चाहता है। **वैदिक विद्यार्थी वेद और ऋषि-परंपरा को जीवित रखता है।**बहन भाई के जीवन की मंगलकामना करती है। भाई बहन की सुरक्षा और सम्मान का संकल्प लेता है।*भारतीय चिंतन का प्रसिद्ध सिद्धांत है*”धर्मो रक्षति रक्षितः।”**” जिसकी हम रक्षा करते हैं, वही हमारी रक्षा करता है। “*रक्षाबंधन इसी पारस्परिक दायित्व का प्रतीक है।*भाई बहन की रक्षा करे, बहन भाई के जीवन और मर्यादा की रक्षा करे..!!!* *मनुष्य प्रकृति की रक्षा करे, प्रकृति मनुष्य का पालन करे…!!!**समाज अपने निर्बल की रक्षा करे, समाज की शक्ति उसकी रक्षा करे…!!!* *मनुष्य धर्म की रक्षा करे, धर्म मनुष्य का कल्याण करे…!!!**तब राखी केवल एक धागा नहीं रह जाती। वह कर्तव्य का बंधन बन जाती है। **एक धागा, अनेक अर्थ** अथर्ववेद का प्राचीन मंत्र कहता है:- **”तत्ते बध्नाम्यायुषे वर्चसे बलाय दीर्घायुत्वाय शतशारदाय॥” **“मैं तुम्हें आयु, तेज, बल और दीर्घ जीवन के लिए बाँधता हूँ।” *हजारों वर्ष बाद उसी भाव का एक रूप हमारी बहन भाई की कलाई पर बाँधती है। इसलिए *रक्षाबंधन केवल भाई की कलाई पर बँधा हुआ धागा नहीं है। यह मनुष्य और मनुष्य के बीच विश्वास का बंधन है। **यह प्रकृति और मनुष्य के बीच कृतज्ञता का बंधन है।**यह गुरु और शिष्य के बीच ज्ञान का बंधन है।* *यह समाज और संस्कृति के बीच उत्तरदायित्व का बंधन है। *और सबसे बढ़कर यह उस भारतीय विचार का प्रतीक है कि जिसे हम प्रेम से बाँधते हैं, उसकी रक्षा करना हमारा धर्म बन जाता है। *रक्षा करें—रिश्तों की, प्रकृति की, संस्कृति की, ज्ञान की और धर्म की…!!! तभी रक्षाबंधन का धागा सचमुच रक्षासूत्र बनेगा…!!!

*श्रावण पूर्णिमा की हार्दिक हार्दिक शुभकामनाएँ। 🙏🕉️🙏

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त (*सत्य का अन्वेषण करने वाली, ज्ञानवर्धक, पाखंड और आडंबरों को उद्घाटित करने वाली, इस पोस्ट को अपने परिजनों और मित्र समूह में अवश्य शेयर करें।*)

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