भगवान बुद्ध की शिक्षा और नव बौद्ध समाज का सरोकार: बाबासाहेब के धर्मान्तरण के परिप्रेक्ष्य में।

“डॉ बालाराम परमार ‘हॅंसमुख’

14 अक्टूबर 1956 का वह ऐतिहासिक संकल्प। नागपुर की दीक्षाभूमि। लाखों लोगों की उपस्थिति। डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने 22 प्रतिज्ञाओं के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा ली। यह केवल धर्म परिवर्तन नहीं था, यह एक सामाजिक क्रांति का उद्घोष था। बाबासाहेब ने कहा था: “मैं हिन्दू धर्म में पैदा हुआ, यह मेरे वश में नहीं था, पर हिन्दू रहकर नहीं मरूंगा, यह मेरे वश में है।” वर्तमान पीढ़ी की जिज्ञासा है कि ‘ बाबासाहेब ने बौद्ध धम्म को क्यों चुना’? भगवान बुद्ध की कौन सी शिक्षाएँ थीं जिन्होंने उन्हें आकर्षित किया? और सबसे बड़ा प्रश्न — उनके अनुयाई, नव बौद्ध समाज ने, पिछले 70 वर्षों में उन शिक्षाओं का कहाँ तक पालन किया?

🙏भगवान बुद्ध की मूल शिक्षा — करुणा, प्रज्ञा और समता। भगवान बुद्ध का धम्म ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग-नरक के विवाद से मुक्त एक नैतिक-वैज्ञानिक जीवन पद्धति है। इसके तीन स्तंभ हैं:

1. प्रज्ञा: विवेक और तर्क की पूजा। बुद्ध ने कहा : “अप्प दीपो भव” । अपना दीपक स्वयं बनो। उपदेश देते हुए उन्होंने असंख्य बार स्पष्ट किया कि किसी बात को केवल इसलिए मत मानो क्योंकि वह शास्त्र में लिखी है, गुरु ने कही है, या परंपरा से चली आ रही है। तर्क की कसौटी पर कसो, अनुभव से परखो, और यदि वह कल्याणकारी है तो ही अपनाओ। यह अंधश्रद्धा के विरुद्ध पहली क्रांति थी।

2. करुणा: सबके लिए मैत्री। बुद्ध का धम्म ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ के लिए है। इसमें जाति, वर्ण, लिंग, राष्ट्र का भेद नहीं। “सब्बे सत्ता सुखी होन्तु” — सभी प्राणी सुखी हों। हिंसा, घृणा, द्वेष का त्याग और मैत्री, करुणा, मुदिता का अभ्यास ही धम्म है।

3. समता: सामाजिक न्याय का आधार। बुद्ध ने संघ की स्थापना की जहाँ राजा भी भिक्षु बनकर शूद्र भिक्षु के पीछे चलता था। उपालि नाई, सुनीत भंगी, अंगुलिमाल डाकू — सबको समान स्थान मिला। जन्म नहीं, कर्म से व्यक्ति महान होता है — “न जच्चा वसलो होति, न जच्चा होति ब्राह्मणो। कम्मना वसलो होति, कम्मना होति ब्राह्मणो।”

4. मध्यम मार्ग और अष्टांगिक मार्ग। दुःख है, दुःख का कारण है, दुःख का निवारण है, और निवारण का मार्ग है — ये चार आर्य सत्य। और मार्ग है अष्टांगिक: सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि। यानी सोच, बोल, कर्म और जीविका — सब में नैतिकता। संक्षेप में कहें तो बुद्ध का धम्म कर्मकांड नहीं, आचरण है। मंदिर नहीं, मन का परिवर्तन है।

बाबासाहेब आम्बेडकर का धर्मान्तरण — क्यों बौद्ध धम्म? बाबासाहेब ने 20 साल तक विश्व के प्रमुख धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन किया। इस्लाम, ईसाई, सिख और, जैन । सब पर विचार किया। अंत में बौद्ध धम्म को चुना। क्यों?

पहला कारण: सामाजिक समता: हिन्दू धर्म में वर्ण व्यवस्था ने करोड़ों लोगों को अछूत बनाया। बाबासाहेब ने कहा , “जिस धर्म में मेरे लोगों को कुत्ते-बिल्ली से भी बदतर समझा जाए, वह धर्म नहीं, बीमारी है।” बुद्ध ने 2500 साल पहले ही वर्ण व्यवस्था को नकार दिया था। इसलिए यह धम्म शोषितों के लिए मुक्ति का मार्ग था।

दूसरा कारण: नैतिकता बनाम ईश्वर: बाबासाहेब को ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म के दार्शनिक विवाद में रुचि नहीं थी। वे चाहते थे एक ऐसा धम्म जो व्यक्ति को नैतिक बनाए, समाज को न्याय दे। बुद्ध का धम्म ‘ईश्वर है या नहीं’ इस बहस में नहीं पड़ता। वह कहता है : “झूठ मत बोलो, चोरी मत करो, व्यभिचार मत करो, नशा मत करो, हिंसा मत करो।” यह सीधा, व्यावहारिक नैतिक संहिता है।

तीसरा कारण: भारत की मिट्टी का धम्म: अनेक बार बाबासाहेब ने लिखा है कि “बौद्ध धर्म भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। यह विदेशी नहीं, इसी भूमि पर जन्मा। इसे अपनाकर हम अपनी जड़ों से नहीं कटते, बल्कि अपनी असली विरासत से जुड़ते हैं।”

चौथा कारण: वैज्ञानिक दृष्टिकोण: बुद्ध ने कारण-कार्य सिद्धांत दिया — ‘प्रतीत्य समुत्पाद’। दुःख का कारण है, तो निवारण भी है। बाबासाहेब को यह वैज्ञानिक दृष्टि पसंद आई। उन्होंने ‘बुद्ध और उनका धम्म’ में लिखा है कि “धर्म को विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।”

22 प्रतिज्ञाएँ: नव बौद्ध समाज का संविधान। दीक्षा के समय बाबासाहेब ने 22 प्रतिज्ञाएँ दिलवाईं। इनका सार इस प्रकार है। “मैं ब्रह्मा-विष्णु-महेश को नहीं मानूँगा, राम-कृष्ण को नहीं पूजूँगा, हिन्दू देवी-देवताओं में विश्वास नहीं करूँगा। मैं चोरी, झूठ, व्यभिचार, नशा नहीं करूँगा। मैं बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग पर चलूँगा। मैं सभी प्राणियों से मैत्री करूँगा। यह प्रतिज्ञाएँ ‘क्या छोड़ना है’ और ‘क्या अपनाना है’ — दोनों स्पष्ट करती हैं। ⛩️नव बौद्ध समाज का सरोकार : 70 साल का लेखा-जोखा।

14 अक्टूबर 1956 के बाद लाखों लोगों ने बौद्ध धम्म अपनाया। 2011 की जनगणना में महाराष्ट्र में 65 लाख से अधिक बौद्ध दर्ज हैं। नई पीढ़ी प्रश्न पुछती है — बाबासाहेब के अनुयायियों ने बुद्ध की शिक्षा और 22 प्रतिज्ञाओं का कहाँ तक पालन किया? इसका उत्तर ‘श्याम और श्वेत’ नहीं, ‘धूसर’ है।

1. सामाजिक परिवर्तन — बड़ी उपलब्धि! पालन हुआ क्या? सबसे बड़ी सफलता आत्म-सम्मान की पुनर्स्थापना है। नव बौद्ध समाज ने ‘अछूत’ का कलंक धो दिया। शिक्षा पर जोर दिया। बाबासाहेब का मंत्र “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो” घर-घर पहुँचा। आज इस समाज से आईएएस, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, लेखक निकले हैं। महाराष्ट्र के दलित बस्तियों में पहले जहाँ स्कूल नहीं थे, वहाँ आज बुद्ध विहार के साथ लाइब्रेरी हैं। अंतरजातीय विवाह बढ़े हैं। राजनीतिक चेतना आई है। यह बुद्ध के ‘समता’ और बाबासाहेब के ‘शिक्षा’ के सिद्धांत का सीधा पालन है।

चूक कहाँ हुई ?: फिर भी, जाति का दंश पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। नव बौद्धों में भी ‘महार’, ‘मातंग’, ‘चर्मकार’ की उप-जातियाँ बनी हुई हैं। शादी-विवाह में अभी भी अपनी उप-जाति देखी जाती है। बुद्ध ने संघ में जाति मिटाई थी, पर समाज में वह अभी शेष है।

2. धार्मिक आचरण — दोहरा चरित्र: पालन हुआ क्या? लाखों घरों से हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ हटीं। बुद्ध और बाबासाहेब की प्रतिमाएँ स्थापित हुईं। दीक्षाभूमि, चैत्यभूमि तीर्थ बन गए। धम्मचक्र प्रवर्तन दिन लाखों लोग सफेद वस्त्र में मनाते हैं। पंचशील का पाठ होता है। यह बाहरी कर्मकांड से मुक्ति की दिशा में बड़ा कदम है।

चूक कहाँ हुई: 22 प्रतिज्ञाओं में पहला वचन था — “मैं ब्रह्मा, विष्णु, महेश को नहीं मानूँगा।” पर व्यवहार में कई नव बौद्ध परिवारों में दिवाली पर लक्ष्मी पूजन, सत्यनारायण कथा, और गांव के देवता को नारियल चढ़ाना जारी है। डर से, समाज के दबाव से, या आदत से। बाबासाहेब ने कहा था — “धर्म परिवर्तन मन का परिवर्तन है।” पर कई जगह केवल बोर्ड बदला, भीतर वही अंधश्रद्धा रही। महाराष्ट्र के कुछ गाँवों में ‘बौद्ध’ नाम लिखकर भी ‘माता की चौकी’ बैठती है। यह बुद्ध की ‘प्रज्ञा’ — तर्क की शिक्षा — का उल्लंघन है।

3. नैतिक आचरण और पंचशील! पालन हुआ क्या: नव बौद्ध समाज में नशामुक्ति आंदोलन चले। कई बस्तियों में शराब की भट्टियाँ बंद करवाई गईं। ‘दारू छोड़ो, बुद्ध को जोड़ो’ जैसे नारे लगे। हिंसा और अपराध दर में भी तुलनात्मक कमी आई क्योंकि शिक्षा बढ़ी।

चूक कहाँ हुई: ‘सम्यक आजीविका’ का पालन अधूरा है। कुछ क्षेत्रों में अवैध धंधे, ब्याज का काम, या सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार के आरोप भी इसी समाज के लोगों पर लगते हैं। ‘मुसावादा वेरमणी’ — झूठ न बोलना — का सिद्धांत व्यवहार में पूरी तरह नहीं दिखता। बुद्ध ने कहा था ‘सम्यक वाणी’ — कठोर, निंदा, चुगली से बचो। पर सोशल मीडिया पर नव बौद्ध युवाओं का एक वर्ग प्रतिक्रिया में उतनी ही घृणा और गाली का प्रयोग करता है जितनी उन पर की जाती है। यह ‘करुणा’ और ‘मैत्री’ के विरुद्ध है। बाबासाहेब ने दुश्मन से भी नफरत नहीं, व्यवस्था से संघर्ष सिखाया था।

4. शिक्षा और प्रज्ञा — सबसे मजबूत पक्ष। यहाँ पालन सबसे अधिक हुआ। बाबासाहेब का संदेश था — “शिक्षा शेरनी का दूध है, जो पिएगा वो दहाड़ेगा।” नव बौद्ध समाज ने इसे अक्षरशः माना। पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी, मिलिंद कॉलेज जैसे संस्थान खड़े किए। आज इस समाज की साक्षरता दर महाराष्ट्र की औसत से अधिक है। लड़कियों की शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया। यह बुद्ध के ‘अप्प दीपो भव’ और बाबासाहेब के ‘शिक्षित बनो’ का सबसे सुंदर संगम है।

चूक कहाँ हुई: शिक्षा डिग्रियाँ तक सीमित रह गई। ‘प्रज्ञा’ यानी विवेकशील चिंतन कम विकसित हुआ। कई शिक्षित युवा भी व्हाट्सएप फॉरवर्ड पर आँख मूंदकर विश्वास कर लेते हैं। बुद्ध ने कहा था ‘एहि पस्सिको’ — आओ, खुद देखो, परखो। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण अभी जन-जन तक नहीं पहुँचा।

5. संगठन और संघर्ष। पालन हुआ क्या?: बाबासाहेब का दूसरा मंत्र ‘संगठित रहो’ था। रिपब्लिकन पार्टी, बामसेफ, भारत मुक्ति मोर्चा जैसे संगठन बने। अन्याय के खिलाफ आवाज उठी। नामांतर आंदोलन, रिडल्स आंदोलन इसके उदाहरण हैं।

चूक कहाँ हुई: ‘संगठित’ के स्थान पर ‘विखंडित’ ज्यादा हुए। एक रिपब्लिकन पार्टी टूटकर 50 गुटों में बंट गई। अहंकार, पद की लड़ाई, और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा ने ‘संघ’ की भावना को चोट पहुँचाई। बुद्ध का संघ ‘त्याग’ पर आधारित था, आज का संगठन अक्सर ‘सत्ता’ पर आधारित दिखता है। बाबासाहेब ने कहा था — “मुझे मेरे समाज के शिक्षित लोगों ने धोखा दिया।” यह दर्द आज भी प्रासंगिक है। निष्कर्ष निकलता है कि: आगे का मार्ग क्या हो! हर शहर और गांव चौराहे पर बाबासाहेब की मूर्ति के हाथ के इसारे को अनुयायियों ने कहाँ तक पालन किया? उत्तर है — कुछ भी नहीं!!

90% राजनीतिक असफलता। नोकरी पेशा में चुनौती ही चुनौती। मन का पूर्ण परिवर्तन अभी बाकी है। 22 प्रतिज्ञाओं का अक्षरशः पालन, पंचशील का आचरण, जाति-पाँति का पूर्ण निर्मूलन, और घृणा के बदले करुणा का व्यवहार — यह अभी साध्य है, सिद्ध नहीं। बाबासाहेब ने धर्म दिया, पर धम्म बनाना समाज को है। उन्होंने मार्ग दिखाया, चलना उनके अनुयाई को है। बुद्ध ने कहा था — “तुम्हें अपना काम खुद करना है, तथागत तो केवल मार्गदर्शक हैं।” नव बौद्ध समाज के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती ‘नवयान’ को ‘कर्मकांड’ बनने से बचाना है। बुद्ध की मूर्ति लगाकर अगर मन में वही द्वेष, वही अंधश्रद्धा, वही जाति-अभिमान रहे, तो यह धर्मान्तरण नहीं, केवल ‘लेबल’ परिवर्तन होगा।

आवश्यकता है ‘प्रज्ञा, शील, करुणा’ के त्रिरत्न को व्यक्तिगत जीवन में उतारने की। जब हर नव बौद्ध युवा 22 प्रतिज्ञाओं को केवल जुबान से नहीं, जीवन से दोहराएगा; जब वह किसी से नफरत नहीं करेगा, बल्कि अन्याय से लड़ेगा; जब वह शिक्षा को डिग्री नहीं, विवेक बनाएगा — तभी बाबासाहेब का सपना पूरा होगा। बाबासाहेब ने अपने समाज को बुद्ध दिया। अब महार, मातंग ,मेहतर ,चमार जातियों को बुद्ध को जीना है। क्योंकि धम्म अंततः पोथी में नहीं, बर्ताव में बसता है। और यही नव बौद्ध समाज का सबसे बड़ा सरोकार होना चाहिए। इन सब से बढ़कर झुग्गी झोपड़ी बनाकर रहना और नशा की आदत से छुटकारा पाने का हर सदस्य, नेता, अभिनेता, लेखक और चिंतक को बाबा सहाब की ही भांति प्रयास करने की आवश्यकता है।

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