देवकी की पीड़ा और न्यायिक मर्यादा : क्या ऐसी उपमाएँ न्याय की गरिमा बढ़ाती हैं?

✍️कैलाश चन्द्र

भारतीय न्यायपालिका केवल कानून का व्याख्याकार नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा और समाज के विश्वास की संरक्षक भी है। न्यायालयों के निर्णय जितने महत्त्वपूर्ण होते हैं, उतनी ही महत्त्वपूर्ण होती है उनकी भाषा। न्यायिक आदेशों में प्रयुक्त प्रत्येक शब्द केवल एक मुकदमे का हिस्सा नहीं होता, बल्कि वह समाज में न्याय, संस्कृति और संवैधानिक मर्यादा के प्रति दृष्टिकोण का निर्माण भी करता है। इसलिए न्यायिक विवेक केवल निर्णय तक सीमित नहीं रहता, उसकी अभिव्यक्ति भी उतनी ही संयमित और उत्तरदायी होनी चाहिए।

नासिक की एक अदालत द्वारा टीसीएस धर्मांतरण एवं यौन उत्पीड़न प्रकरण की आरोपी निधि (निदा) खान को जमानत देते समय भगवान श्रीकृष्ण के जन्म और माता देवकी के कारावास का उल्लेख इसी कारण व्यापक बहस का विषय बन गया है। न्यायालय का उद्देश्य संभवतः गर्भस्थ शिशु के हितों की रक्षा करना था, जो निस्संदेह एक मानवीय और विधिसम्मत विचार है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या उस मानवीय संवेदना को व्यक्त करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उदाहरण आवश्यक था?

भारतीय परंपरा में श्रीकृष्ण का जन्म केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध धर्म की उद्घोषणा है। माता देवकी और पिता वसुदेव किसी अपराध के कारण कारागार में नहीं थे। वे एक निरंकुश शासक की क्रूरता के शिकार थे। उनका कारावास सत्ता द्वारा निर्दोषों पर किए गए अत्याचार का प्रतीक है। इसलिए उनकी स्थिति की तुलना किसी ऐसे व्यक्ति से करना, जो विधिक प्रक्रिया के अंतर्गत आपराधिक आरोपों का सामना कर रहा हो, अनेक लोगों को असंगत प्रतीत होना स्वाभाविक है।

यह भी उतना ही सत्य है कि जमानत का अर्थ दोषमुक्ति नहीं होता। भारतीय न्यायशास्त्र का मूल सिद्धांत है कि प्रत्येक अभियुक्त तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक उसका अपराध न्यायालय में सिद्ध न हो जाए। इसलिए किसी भी आरोपी को जमानत मिलना उसके संवैधानिक अधिकारों और न्यायिक विवेक का विषय है। किंतु न्यायिक आदेश का आधार संविधान, विधि और स्थापित न्यायिक सिद्धांत होने चाहिए; धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीकों का सहारा तब तक नहीं लिया जाना चाहिए, जब तक उसकी स्पष्ट आवश्यकता न हो।

भारत जैसे बहुलतावादी समाज में न्यायपालिका की सबसे बड़ी शक्ति उसकी निष्पक्षता है। यही कारण है कि न्यायिक भाषा में धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग सदैव अत्यंत सावधानी से होना चाहिए। न्यायालय यदि किसी धार्मिक उपमा का उल्लेख करता है, तो उससे जुड़ी सांस्कृतिक संवेदनाएँ भी स्वतः न्यायिक विमर्श का हिस्सा बन जाती हैं। परिणामस्वरूप निर्णय के विधिक पक्ष से अधिक चर्चा उसके प्रतीकों पर होने लगती है। इससे मूल न्यायिक तर्क अनावश्यक विवादों के बीच दब सकता है।

यह प्रकरण एक और महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाता है। क्या भारतीय न्यायालयों को अपने निर्णयों में ऐसी उपमाओं से बचना चाहिए, जिनसे किसी धार्मिक आस्था या ऐतिहासिक प्रसंग की भिन्न व्याख्या का विवाद खड़ा हो? उत्तर संभवतः ‘हाँ’ में है। भारतीय संविधान स्वयं न्यायपालिका को पर्याप्त विधिक आधार प्रदान करता है। गर्भस्थ शिशु के हित, महिला की गरिमा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जमानत के सिद्धांत—ये सभी संवैधानिक आधार अपने-आप में पर्याप्त हैं। इनके रहते किसी धार्मिक उदाहरण की आवश्यकता नहीं प्रतीत होती।

माता देवकी भारतीय चेतना में निर्दोष मातृत्व, अन्याय-सहन और धर्म की विजय की प्रतीक हैं। उनकी पीड़ा किसी आपराधिक प्रकरण की सामान्य उपमा नहीं बन सकती। सांस्कृतिक प्रतीकों की गरिमा तभी सुरक्षित रहती है, जब उन्हें उनके मूल संदर्भ में समझा और प्रस्तुत किया जाए।अंततः यह विवाद किसी एक जमानत आदेश का नहीं, बल्कि न्यायिक अभिव्यक्ति की मर्यादा का प्रश्न है। न्यायपालिका से समाज की अपेक्षा केवल निष्पक्ष निर्णय की नहीं, बल्कि ऐसी भाषा की भी है जो संविधानसम्मत, सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील और विवादों से परे हो। न्याय जितना निष्पक्ष होना चाहिए, उसकी अभिव्यक्ति भी उतनी ही संतुलित, मर्यादित और विवेकपूर्ण होनी चाहिए। यही न्यायपालिका की गरिमा है और यही भारत की संवैधानिक संस्कृति की अपेक्षा भी।

✍️कैलाश चन्द्र

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