दिल्ली में धरना करते धरनारतों की धमकियों में अराजकता और जनता में फैलता झुठा विमर्श।

रिंकेश बैरागी।
भारत देश जहां का इतिहास ज्ञान, शिक्षा, और जागरुकता से भरा पड़ा है उस देश में शिक्षा और उसके माध्यमों की महत्वपूर्णता को समाप्त करते हुए विरेधियों द्वारा उसमें भ्रष्टाचार का बीज बोया, देखते ही देखते वर्षों में भारत में शिक्षा के माध्यमों में भ्रष्टाचार की जड़े फैलती गई जिसके कारणवश लोगों के अंदर अज्ञानता ने जन्म लिया और उनमें धैर्य की कमी ने मूल कारण को जानने या उसे समझने की क्षमता को धीरे-धीरे समाप्त कर दिया। इसका लाभ विरोधियों ने उठाना शुरु कर भारत के विषय में यहां की परंपराओं पर झुठा विमर्श गढ़ते हुए उसे फैलाना शुरु किया।
किसी विषय को फैलाना हो तो उसे एक समस्या का रुप देकर उसमें मजबूरी और लाचारी को जोड़ दिया जाकर अन्याय का स्वरुप बनाकर प्रचार जोर शोर से किया जाता है। सोशल मीडिया के माध्यम से जनता तक उस कुप्रचार को फैलाया जाता है। अब भारतीय जनता जिसमें धैर्य की कमी हो चूकी है उसमें झुठे विमर्श की गहराई में जाने की क्षमता होती नहीं फिर जो उसे दिखाया जाता है उसमें हालातो के मारो पर अन्याय होते देख नागरिक उसे ही सत्य मान लेते हैं किंतु उसकी सच्चाई जानते नहीं है न ही किसी प्रकार की खोज करते हैं फिर विडंबना यह भी है कि, जब प्रमाणिकता से न्युज या समाचार पत्रों द्वारा सच्चाई बताई जाती है तब वे या तो देखते-पढ़ते नहीं है या फिर बिना प्रमाण की बातों पर विश्वास करते हुए सच्चाई से मुंह मोड़ लेते हैं।
ऐसा ही माहौल दिल्ली में धरने पर बैठे काकरोच जनता पार्टी ने बनाया और उनका साथ देने के लिए विपक्ष सड़क पर आ गया। विद्यार्थियों को लेकर सीजेपी जिस उद्देश्य से धरने पर बैठी थी उसके लिए सरकार से वार्ता होनी थी फिर भी आंदोलन में हिंसा हो गई क्योंकि भीड़ बेलगाम थी, और विद्यार्थियों के साथ अराजक तत्व भी इसी आंदोलन में उपस्थित थे। जब धरना शुरु हुआ तब आंदोलनकारियों ने सरकार के विरोध में नारेबाजी की और साथ-साथ भारत के विरोध में भी, जो कि सरासर गलत है। बेलगाम आंदोलन में अराजक तत्वों ने मौको देखा और अपनी मनमानी का अवसर निकाल लिया, क्योंकि नेतृत्वहीन संसद मार्च की भीड़ को निर्देशित करने वाला कोई नहीं था।
जब दिल्ली की सड़कों पर हंगामा हो रहा था तब काकरोच जनता पार्टी के दो नेता केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा से भेंट करने और ज्ञापन दे गए हुए थे, जिसमें चार घंटे का समय लगा और कुछ नेता भीड़ को संसद के करीब ले जाने में जी जान जुटा रहे थे बाकि एक नेता बर्गर से भूख मिटा रहा था।पुलिस और प्रदर्शनकारी बड़ी संख्या में घायल हुए दर्जनों वाहन क्षतिग्रस्त किए गए जिससे यह स्पष्ट होता है कि, हिंसा फैलाने वाले पहले से ही सोच समझ कर हिंसा की तैयारी से आए और शामिल हुए थे। जिन्होंने मीडिया पर भी हिंसा का प्रयोग किया और गोदी मीडिया से संबोधित कर आंदोलन से दूर किया।
प्रदर्शनकारी विद्यार्थी ही थे जो इस तरह विरोध करते हुए नारे लगाते आंदोलनकारी बने और सरकार का विरोध करते-करते सम्मान भी भूल गए। संसद में मानसून सत्र चल रहा है जहां विपक्ष नीट पेपर लीक कांड के साथ अन्य मुद्दों पर सरकार को घेरने का मौका नहीं छोड़ेगा साथ ही साथ विपक्ष को नया मुद्दा सीजेपी के संसद मार्च में हुई हिंसा का मुद्दा भी मिल गया है।
संसद सत्र में पहला दिन विपक्ष के हंगामें में बेकार ही गया और दूसरा दिन भी, हर बार हंगामें के बीच संसद सत्र को स्थगित किया जाता रहा है, इससे यही पता चलता है कि विपक्ष का कार्य संसद को नहीं चलने देना है, जबकि विपक्ष कानून या बनाए गए बिल की समिक्षा और उसमें मौजुद कमियां निकालने का होता है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी अपने साथियों के साथ अचानक सड़क की राजनीति करने के लिए प्रधानमंत्री आवास के पास धरने पर जा बैठे और नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगने लगे, उनकी बहन प्रियंका वाड्रा भी पेपर लीक मामले को सड़क पर उछालने लगी। राहुल गांधी जिसका विरोध संसद में कर सकते हैं उसका विरोध करने के लिए उनको सड़क पर बैठने की क्या आवश्यकता पड़ गई। क्या राहुल गांधी काकरोच पार्टी के धरने से चिंतित हो उठे कि कथित राजनीति दल काकरोच पार्टी इतनी जल्दी चर्चा का विषय बन गई। जब दोनों का विरोध करने का विषय एक था तब राहुल गांधी क्यों अलग धरना लगाकर बैठे और उस समय जब कई विपक्षी दलों के नेता सीजेपी के मंच पर जाने लगे, अपना समर्थन देने लगे तब कांग्रेस को उसी मुद्दे पर अलग से मौर्चा खोलना क्या यह दर्शाता है कि, सरकार का विरोध करने के मामले में कांग्रेस अपने आप को सबसे आगे खड़ी देखे। विरोध करने में विपक्षी दलों की आगे दिखने कि होड़ हास्यासपद है क्योंकि जिसक बहस सदन में की जा सकती है उसे सड़क पर करने से क्या लाभ।
जिस तरह से देश की जनता के सामने यह झुठा विमर्श फैलाया जा रहा है जिसमें दिखाया जा रहा है कि विद्यार्थियों पर अन्याय हो रहा है, पुलिस द्वारा उन पर लाठिया चलाई जा रही है आसू गैस के गोले छोड़े जा रहे हैं। उससे अधिक सत्यता इसमें भी है कि भीड़ ने अराजकता का सहारा लिया और पुलिस पर पहले जमकर पत्थरबाजी की। हिंसा करने वालों ने पुलिस पर अमानक स्प्रे भी छीड़का। इस आंदोलनी हिंसा में पुलिस भीड़ का अनुमान नहीं लगा सकी और न ही नेतृत्वहीन हिंसा करने वाली भीड़ के इरादें का।
बहरहाल, बीते सात वर्षों में यह तीसरी बार है जब देश की राजधानी आंदोलन से उपजी अराजकता की चपेट में आई है, और हर बार होता कुछ है और जनता को सोशल मीडिया के माध्यम से दिखाया और कुछ जाता है। भारतीय जनता को अपने अंदर के धैर्य को बनाकर उसे प्रबल करना होगा और हर उस बात की सच्चाई को समझना होगा। जब प्रधानमंत्री ने पेपर लीक करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा देने की बात कह दी है सरकार ने तत्काल कार्यवाही करते हुए सीबीआई जांच में 13 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
हालांकि यह पहला मामला नहीं है जब किसी परिक्षा का पेपर लीक हुआ है, इससे पहले बहुत सी परिक्षाओं के पेपर लीक हो चुके है। सरकार को बीते वर्षों में हुए शिक्षा के माध्यम के इस भ्रष्टाचार को ध्यान में रखते हुए पेपर लीक करने वाले दोषियों को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा तभी भारत के भविष्य के भाव में प्रसन्नता आगेगी।