जल स्तर पर संकट, प्रदेशभर में उद्योगों से निकला दूषित पानी भूजल को कर रहा विषेला।

रिंकेश बैरागी,

जल संकट बढ़ता जा रहा है और पेयजल संकट का खतरा सिर पर मंडरा रहा है। मध्यप्रदेश में नीमच जिला जल अभाव ग्रस्त घोषित किया जा चूका है वहीं जल संकट के साथ पेयजल संकट ने मालवा-निमाड़ की घेराबंदी कर ली है। जबकि हमारे प्रदेश में 200 से अधिक छोटी-बड़ी नदियां है, क्योंकि सभी नदियों की स्थिति में गिरावट आंकी गई है यहां तक कि प्रदेश में लगभग 100 छोटी नदियों में पानी का बहना समाप्त हो चुका है। नदियों में सीवेज का दूषित जल, उद्योग का केमिकल युक्त अपशिष्ट एवं गंदा पानी, और शहरों की गंदगी से भरे पड़े नालों का दुर्गंध और सड़े कचरे से मिला पानी नदियों में मिलकर माता रुपी नदी के पावन देवरुपी जल को विषैला और मैला कर उसे दानवी रुप दे रहा है।

प्रदेश के सभी जिलो में जलस्त्रोत शहरी प्रदूषण के कारण दूषित हो रहे हैं। मुख्यतः प्रदेश में 2515 उद्योग ऐसे है जो नदी, झील, तालाब, जलाशय के साथ भूजल को भी दूषित कर रहे हैं। वहीं प्रदूषण बोर्ड की लापरवाही या राजनेताओं के सहयोग और मनमानी के कारण प्रदेश में संचालित 5961 उद्योगों ने मध्यप्रदेश प्रदूषण बोर्ड से समेकित सहमति और प्राधिकरण (कंसोलिडेटेड कंसेंट एंड अथाराइजेशन – सीसीए) को नवीनीकरण नहीं कराया है। जबकि नेता, अधिकारी सभी को पता है कि, इन उद्योगों से निकलने वाले रसायनयुक्त गंदा पानी जलस्त्रोतो में मिलने से आम लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। प्रदेश में सात हजार अमृत मित्र जल गुणवत्ता पर परीक्षण का कार्य कर रहे हैं इसके लिए भारत सरकार द्वारा अमृत 2.0 योजना के तहत 3.70 करोड़ रुपये का बजट मध्यप्रदेश को दिया गया है, और अमृत मित्र के अंतर्गत 184 परियोजनाएं केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत की जा चूकी है। बावजूद इसके मध्यप्रदेश में 305 नदियां तालाब, झीले, और जलाशय प्रदुषित है और लगातार दूषित हो रहे हैं।

झाबुआ जिले के मेघनगर औद्योगिक क्षेत्र में भी फेक्ट्रियों से निकला केमिकल युक्त पानी, नदी, नालों, तालाबो के शुद्ध जल में मिलकर जलीय जंतु के साथ जीवन को गंभीर प्रभावित करता है। अनेको बार दूषित पानी पीने से पशुओं की मौत हो जाती है। पास पड़ौस के ग्रामीण अक्सर बिमार रहते हैं। नेता एक दिन होशियारी में दूषित पानी के विरोध में प्रदर्शन करते हैं उनको सहयोग के तौर पर फैक्ट्री मालिको की तरफ से हां में ईशारा मिल जाता है। प्रदेश के प्रत्येक स्थान जहां उद्योग लगे हुए है वहां ऐसा ही हो रहा है। जल संकट बढ़ रहा है, पेयजल का ठीक से प्रबंधन नहीं होने के कारण बहुत सा पानी व्यर्थ ही बह जाता है जबकि पेयजल की उपलब्धता अर्थात उसके स्त्रोत सिर्फ चार प्रतिशत ही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 20 सबसे अधिक जल संकट ग्रस्त शहर है जिसमें से 6 शहर भारत में ही है। दिल्ली, चेन्नई, कोलकत्ता, मुंबई, बेंगलुरु और हेदराबाद। नई समस्या के नये समाधान निकालने होगे, बड़े पैमाने पर ग्रामीण जनसंख्या रोजगार, बच्चों की पढ़ाई के लिए शहरों में आ रही है। लोग शहरों में आकर बिना ले-आउट स्वीकृत कराए, टाऊन एवं कंट्री प्लानींग से अनुमति के बिना ही मकान बना लेते हैं। सीवेज सिस्टम होता नहीं है होता भी है तो उसमें भ्रष्टाचार का पलिता लग जाता है। प्रदेश के बहुत सारे ऐसे स्थान है जहां पानी में प्रदूषण है, पेयजल पाईप लाईन बरसो बरस पुरानी है। नदियों तालाबों में सीवेज का पानी मिल रहा है। पूरे प्रदेश में नागरिको को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए जिम्मेदार स्थानीय निकायों अकर्मण्यता कैसे एक स्वच्छ शहर की छवि खराब कर सकती है इंदौर के भागीरथपुरा की बीते दिनों की दर्दनाक घटना जिसमें दर्जनों मौतें इसका उदाहरण हैं।

नदियों, का जल स्तर घट रहा है। बहुत सी नदियां सिर्फ बरसाती नदी बन चूकी है। बरसतें पानी से इन सूखती नदियों में भी प्राण आ जाते हैं, पानी बहने के साथ ही गंदा कचरा और दूषित सड़ा पदार्थ भी साथ में बहने लगता है। उद्योगों के समिप नदी नालों में बरसाती पानी के साथ गर्मी के कारण सूख चुका केमिकल भी बहता है जिससे नालो और नदियों के पानी का रंग लाल और काला हो जाता है। बारिश समाप्त होती है नदियां सूखकर प्राणहीन हो जाती हैं। बेलगाम उद्योगों का दूषित जल भूमि के जल और पेयजल में विष घोल रहा हैं जिसकी हजारों शिकायतों के बावजूद भी सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। केन्द्रीय भूजल बोर्ड ने तो पहले ही चेतावनी दे दी कि इंदौर सहित दर्जनों ब्लाक में भूजल स्तर बहुत तेजी से नीचे जा रहा है जो कि भयावह स्थिति है।

यह सिस्टम की नाकामी है कि, उद्योगों का विष भूजल को प्रदूषित और संक्रमित कर रहा है, क्योंकि औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाला केमिकल युक्त औद्योगिक अपशिष्ट बिना किसी ट्रीटमेंट प्लांट के धरती में छोड़ा जा रहा है, जो कि भूजल को संक्रमित कर जहरीला बना रहा है और भूजल बोरिंग, हैंडपंप, पाइपलाइन के नर्मदा जल नेटवर्क के माध्यम से लोगों के घरों तक पहुंच रहा है। यहीं पानी खेती का सहारा भी बना हुआ है जिससे फसलों, सब्जियों में संक्रमण पनप रहा है। चिंता का विषय यह है कि इस संकट को सिर्फ वर्तमान का संकट समझा जा रहा है, गौर करने वाली बात है कि यह संकट भविष्य में गंभीर परिणाम भावी पीढ़ी को देगा, जिसकी कल्पना भी वर्तमान में नहीं की जा सकती है। इंदौर के रंगवासा क्षेत्र, पीथमपुर, खरगौन की 150 से ज्यादा फैक्ट्रियां, देवास के 500 उद्योग, उज्जैन, शाजापुर, मंदसौर, रतलाम, मेघनगर समेत प्रदेश के 6000 उद्योगों की एक सी स्थिति है जहां ट्रीटमेंट प्लांट नहीं होने के कारण उद्योगों का सारा रसायनयुक्त अपशिष्ट नदी, नालों में मिलने के साथ भूमिगत भी किया जा रहा है। जिसके प्रभाव दिखाई दे रहे हैं, लोग रोगी हो रहे हैं बच्चों में बिमारियां बढ़ रही है और अधिकांश बच्चों की आंखों में कमजोरी आ चुकी है। संक्रमित पानी से सिंचाई की गई फसल और सब्जियों के खाने से लोगों में पेट की बिमारी ने घर कर लिया है। प्रतिवर्ष जलस्तर में लगातार गिरावट के साथ भूजल का संक्रमण और प्रदूषण भी बढ़ता जा रहा है, फिर भी इस विषय पर विचार के लिए कोई व्यवस्थित टीम तैयार नहीं होती न ही इस बढ़ते संकट के रोकथाम के लिए कोई कार्य योजना सामने रखी जाती है। भावी पीढ़ी के सुख स्वास्थ्य और उनकी खुशियों के लिए सरकार और समाज को नदियों के पुनः जागरण में सहयोग करते हुए, स्वच्छता के साथ जल संकट के समाधान में साथी बनना चाहिए।

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