हिंदुत्व विरोधी राहुल गांधी जाति- धर्म में विभेद पैदा कर विदेशी एजेंट के रूप में कार्य कर रहे हैं।

डॉ बालाराम परमार,
भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव चुनाव होता है और चुनाव में सबसे बड़ा हथियार राजनीतिक दलों का विचार होता है। परंतु पिछले कुछ वर्षों से विचार की जगह विभाजन ने ले ली है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान में लोकसभा के विपक्षी दल के नेता राहुल गांधी की राजनीति को यदि आप गहराई से देखेंगे तो आपको एक पैटर्न दिखाई देगा – हिंदुओं को जातियों में बांटो, मुसलमानों को डराओ, अनुसुचित जाति जनजाति को हजारों साल पहले का मनघड़ंत इतिहास बताओं और फिर वोट बैंक तैयार करो।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 8 अगस्त 2026 को उत्तराखंड के हल्द्वानी रामलीला मैदान में रेली को संबोधित किया था और ‘शुद्धिकरण’ का यह प्रकरण भी वहीं का है। दो दिन बाद 10 अगस्त को श्री राम सेना के लोगों ने उसी मंच पर हवन और ‘शुद्धिकरण’ अनुष्ठान किया था। कांग्रेस पार्टी ने इस शुद्धिकरण को दलित नेता के अपमान और छुआछूत से जोड़ते हुए कड़ा विरोध जताया और संसद से लेकर सड़क तक यह मुद्दा उठाया। वहीं, भाजपा ने इस मामले से किनारा करते हुए कहा कि अनुष्ठान मंच पर कथित तौर पर लगाए गए कुछ नारों के विरोध में था न कि किसी की जाति को लेकर। शुद्धिकरण के नाम पर जो विमर्श राहुल गांधी ने मल्लिकार्जुन खड़गे जी की सभा के बाद खड़ा किया, वह इसी पैटर्न का हिस्सा है।
सच्चाई यह है कि जहां खड़गे जी की सभा हुई थी, वहां किसी भी प्रकार का जातिगत शुद्धिकरण नहीं हुआ था। सभा के बाद जो कचरा, प्लास्टिक, कागज बिखरा पड़ा था, उसे नगरपालिका के कर्मचारियों ने एक जगह इकट्ठा करके जलाया था। यह एक सामान्य स्वच्छता प्रक्रिया है। परंतु राहुल गांधी ने इसे दलित अपमान से जोड़कर देश में एक नया जातिगत जहर घोलने का प्रयास किया। यह कार्य किसी दलित को अपमानित करने के लिए नहीं किया गया था।
कांग्रेस सहित विपक्ष की 32 राजनीतिक पार्टियों का नेतृत्व राहुल को भविष्य का प्रधानमंत्री मानते हैं। ऐसे में राहुल गांधी की धार्मिक और सामाजिक पृष्ठभूमि समझना बहुत जरूरी है। राहुल गांधी, इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी के पौत्र हैं। उनकी दादी इंदिरा जी के पति का वास्तविक नाम फिरोज जहांगीर घांडी था। कई लोग अज्ञानतावश उन्हें फिरोज खान कहते हैं, जो बिल्कुल गलत है। फिरोज गांधी एक पारसी थे। उनका संबंध गुजरात के एक अत्यंत प्रतिष्ठित पारसी परिवार से था। उनके पिता का नाम फरीदून जहांगीर घांडी और माता का नाम रतिमाई था। वे एक स्वतंत्रता सेनानी थे, जेल गए थे, एक निडर पत्रकार थे और एक तेजस्वी सांसद थे।
उनके सरनेम को लेकर जो भ्रम फैलाया जाता है, उसकी सच्चाई यह है कि उनका मूल उपनाम Ghandy था। महात्मा गांधी से प्रेरणा लेकर और स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी गहरी आस्था के कारण उन्होंने अपने उपनाम की वर्तनी बदलकर Gandhi कर ली थी। उनका इस्लाम या खान से कोई संबंध नहीं था। वे पारसी थे। पारसी धर्म अग्नि को पूजता है और सच्चाई को ही ईश्वर मानता है। उनकी माताजी सोनिया गांधी इटली की रहने वाली हैं और एक ईसाई परिवार से आती हैं।
अब प्रश्न यह उठता है कि जब राहुल गांधी के अपने दादा पारसी थे, माता ईसाई है तो उन्हें स्वयं अपनी जाति और धर्म का बोध क्यों नहीं है? पिता राजीव गांधी की हत्या के बाद से राहुल गांधी की परवरिश ईसाई पृष्ठभूमि में हुई है। ऐसे में जब वे स्वयं को जनेऊधारी ब्राह्मण बताते हैं, कभी दलितों के घर खाना खाते हैं और दलित राजनीति करते हैं, तो आम हिंदू भ्रमित होता है। धर्म और जाति वह विषय है जो आचरण से आता है, केवल भाषण से नहीं।
पिछले 22 सालों से राहुल गांधी ने एक ही राजनीति की है – मुसलमानों को यह बताना कि तुम खतरे में हो, और हिंदुओं को जातियों में बांटना कि तुम अलग-अलग हो। अनुसूचित जाति- जनजाति को यह कह कर डरना कि ‘संविधान खतरे में है और वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की सरकार पिछले दरवाजे से आरक्षण खत्म करने जा रही है। यह अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति का ही नया रूप है। यदि हम पिछले 80 साल की कांग्रेस की राजनीति का अध्ययन करें तो पाएंगे कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सबसे पहले जाति और मुस्लिम तुष्टिकरण की नींव रखी। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से लेकर गुजरात के सोमनाथ मंदिर तक, हर जगह एक विशेष समुदाय को खुश करने का काम किया। इंदिरा गांधी ने नारा दिया गरीबी हटाओ, पर गरीबी नहीं हटी, जातियां और मजबूत हो गई। राजीव गांधी ने भी शाह बानो केस में यही किया।और अब राहुल गांधी उसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन एक नए रूप में। वे विदेशी धरती पर जाते हैं, अमेरिका में जाकर कहते हैं कि भारत में लोकतंत्र खत्म हो गया है, लंदन में जाकर कहते हैं कि संसद में माइक बंद कर दिए जाते हैं। क्या यह किसी 140 साल पुराने और 60 साल तक देश में शासन करने वाले दल और वर्तमान संसद में विपक्ष के नेता को शोभा देता है?
भारत में विद्यमान आर्थिक विपन्नता, जाति भेद और प्रांतवाद तथा भाषावाद की लड़ाई भारत में लड़ी जाएगी, अमेरिका या युरोप में नहीं। जब आप विदेश में जाकर भारत को बदनाम करते हैं, तो आप अनजाने में उन विदेशी ताकतों के एजेंट के रूप में काम करते हैं जो भारत को सर्वगुण संपन्न और विश्वगुरु बनते नहीं देखना चाहतीं। अब बात करते हैं पारसी समुदाय की उस दुखद दुर्दशा पर, जिसके बारे में राहुल गांधी को बोलना चाहिए , पर वे और उनकी बहन कभी नहीं बोले।
पारसी धर्म का पैतृक स्थान ईरान है। आज से 3000 साल पहले जरथुस्त्र ने इस धर्म की स्थापना की थी। पारसी लोग अग्नि के पुजारी हैं। कभी ईरान पारसी समुदाय की मातृभूमि थी। फिर इस्लाम का आगमन हुआ। धीरे-धीरे पारसियों पर अत्याचार शुरू हुए। 1979 में जब ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई, तो पारसियों पर कहर टूट पड़ा।
ठीक वैसे ही जैसे 1990 में कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को मस्जिदों से ऐलान करके भगाया गया, उनकी बहन-बेटियों के साथ अत्याचार हुआ, उनके घरों पर कब्जा किया गया, ठीक वैसे ही ईरान में पारसियों के साथ हुआ। उनके आतिश बेहराम – अग्नि मंदिर – तोड़ दिए गए। उनकी जमीनें छीन ली गईं। उन्हें जबरन धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया। उनकी किताबें जलाई गईं। आज ईरान में जो कभी लाखों पारसी थे, वे अब केवल 15 से 20 हजार बचे हैं और वे भी दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर, डर-डर कर जी रहे हैं। जो पारसी भारत आए, उन्होंने इस देश को बहुत कुछ दिया है ।
जमशेद टाटा ने इस देश को उद्योग दिया, होमी भाभा ने परमाणु ऊर्जा दी, फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ ने 1971 का युद्ध जिताया, फिरोज गांधी ने खुद लोकतंत्र को मजबूत किया। पारसी समुदाय कभी भारत पर बोझ नहीं बना। उसने कभी आरक्षण नहीं मांगा। उसने कभी अल्पसंख्यक होने का रोना नहीं रोया। आज भारत में पारसी केवल 50 हजार से भी कम बचे हैं। यह समुदाय विलुप्त होने के कगार पर है। भारत देश का प्रबुद्ध नागरिक होने के नाते मेरी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा से विनम्र सलाह है। आप भारत में दलित बनाम सवर्ण, ओबीसी बनाम जनरल की राजनीति छोड़िए। आप अपने दादा के धर्म के लिए एक बार तो बोलिए। प्रयागराज के मंफोर्डगंज मोहल्ले में आबकारी कार्यालय के पास स्थित कब्रिस्तान में जाकर एक बार फूल-माला तो चढ़ाइए । फिरोज गांधी पारसी समुदाय से थे, लेकिन 1960 निधन के बाद उनका अंतिम संस्कार पारसी रीति-रिवाजों के बजाय दफनाकर किया गया था। आप संसद में एक बार तो ईरान में पारसियों पर हो रहे अत्याचार पर प्रस्ताव लाइए। आप संयुक्त राष्ट्र में पारसियों के संरक्षण की बात कीजिए। आप भारत में पारसियों को विलुप्त होने से बचाने के लिए योजना बनाइए। इससे आपको सच्चा पुण्य मिलेगा।
जाति और धर्म का ध्रुवीकरण लोकतंत्र के निर्मल आकाश को धूमिल करता है। राहुल गांधी को यह समझना होगा कि आज का भारत 1950 का भारत नहीं है। 1950 में अनुसूचित जाति और जनजाति की जो स्थिति थी, वह आज नहीं है। आज का दलित अब बेचारा नहीं है। आज दलित देश का राष्ट्रपति है – के. आर. नारायणन, रामनाथ कोविंद जी दलित समाज से थे। वर्तमान राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपति मुर्मू आदिवासी समुदाय से हैं ।
आज दलित मुख्यमंत्री बन रहा है। दामोदरम संजीवैया, भोला पासवान शास्त्री, राम सुंदर दास, जगन्नाथ पहाड़िया, मायावती, सुशील कुमार शिंदे, जीतन राम मांझी और चरणजीत सिंह चन्नी उदाहरण हैं। आज दलित अरबपति उद्योगपति बन रहा है, आज दलित आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर, इंजीनियर बन रहा है। बाबा साहेब अंबेडकर ने मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में जो संविधान दिया, उसने उन्हें वह ताकत दी है जो दुनिया में किसी और देश में नहीं है।
आज अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए हजारों करोड़ की योजनाएं हैं। केंद्र सरकार की मुद्रा योजना, स्टैंड अप इंडिया, स्कॉलरशिप, आवास योजना, आयुष्मान भारत – इन सबका सबसे बड़ा लाभ दलित और मुसलमान समाज को ही मिला है। वे अब सहानुभूति नहीं, बराबरी चाहते हैं। ऐसे में उन्हें बार-बार यह कहना कि तुम पर आज भी अत्याचार हो रहा है, तुम आज भी गुलाम हो, यह उन्हें सशक्त नहीं, बल्कि कमजोर बनाता है।
दलित और हिंदू- मुसलमान की राजनीति से न तो देश का भला होगा, न कांग्रेस का भला होगा और न ही राहुल गांधी – प्रियंका वाड्रा का भला होने वाला है। देश का भला केवल एक मंत्र से होगा – सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास। जब तक हम हिंदू को ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया, दलित में बांटते रहेंगे, तब तक भारत विश्वगुरु नहीं बन सकता।
राहुल गांधी और उनकी पार्टी कांग्रेस को सोचना चाहिए कि क्या उन्हें अपनी पार्टी के अंदर भी जातिवाद नहीं दिखता? क्या कांग्रेस में दलितों को सच में नेतृत्व दिया जाता है? खड़गे जी को अध्यक्ष बनाया गया, पर निर्णय आज भी एक परिवार ही लेता है। 15 अगस्त 1926 को वंदे मातरम गान को सोनिया गांधी द्वारा रोकने से यह सिद्ध हो गया है।
भारत की जनता और प्रजातंत्र के साथ यह कितना बड़ा मजाक है कि राहुल भारत जोड़ो यात्रा करते हैं, अच्छी बात है। पर भारत जोड़ो यात्रा पैदल चलने से नहीं, दिलों को जोड़ने से होगी। दिल तब जुड़ेंगे जब आप जाति की राजनीति छोड़कर, अपने दादा फिरोज गांधी के पारसी धर्म के उसूल – हुमत, हुक्त, ह्वरस्त – अच्छे विचार, अच्छे वचन, अच्छे राजनीतिक कर्म – को अपनाएंगे। भारत को तोड़ने की नहीं, जोड़ने की राजनीति कीजिए।
इसके साथ भी अनुसूचित जाति जनजाति और इस्लाम धर्म के मानने वाले नागरिकों से भी अपील है कि आप अपने धर्म और जाति को 21वीं सदी के हिसाब से परखिए। आज हमारे भारत में शिक्षा का तारा बड़ा है आर्थिक व्यवस्था भी बहुत मजबूत है। विदेश में भारत का सम्मान निरंतर बढ़ रहा है। 12 साल में नरेंद्र मोदी को 36 देश का सर्वोच्च सम्मान इस बात का प्रतीक है कि अब भारत विकसित हो रहा है। भारत की जनता और उसके नेतृत्व में दम है।
ऐसी सुखद स्थिति में बार-बार मनुस्मृति और रामायण में स्त्री, शुद्र और छूआ -छुत – भेद-भाव की बात उठाना बहुत ज्यादा अकाल बंदी का काम नहीं है। राष्ट्र की संस्कृति समृद्ध होगी तो विदेशों में हमारे नेताओं का सम्मान बढ़ेगा। राष्ट्रगान का सम्मान समूचे राष्ट्र का सम्मान है। जन्मभूमि का सम्मान है। पुण्य भूमि की पूजा है और कर्मभूमि का ऋण चुकाना है।