अधिक आवाज़, अधिक मजबूत भारत – नए भारत के भविष्य के लिए लोकसभा की सीटें बढ़ाना जरूरी है।

डॉ. बालाराम परमार,

संविधान क्या कहता है:

भारतीय संविधान के अनुच्छेद इक्यासी में लोकसभा की संरचना और सदस्यों की संख्या से संबंधित प्रावधान है। प्रारंभ में लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या पाँच सौ निर्धारित थी, जिसमें आंग्ल-भारतीय समुदाय के दो मनोनीत सदस्य शामिल थे। बाद में इकत्तीसवें संविधान संशोधन उन्नीस सौ तिहत्तर के माध्यम से इसे बढ़ाकर पाँच सौ पच्चीस किया गया और वर्तमान में अधिकतम संभावित संख्या पाँच सौ पचास है। आंग्ल-भारतीय आरक्षण समाप्त होने के बाद अब पाँच सौ तैंतालीस सीटों पर चुनाव होता है।

सदस्य संख्या बढ़ाने की आवश्यकता:उन्नीस सौ इकहत्तर में जब लोकसभा की सीटों को पाँच सौ तैंतालीस पर रोका गया था, तब जनसंख्या पचपन करोड़ थी। आज जनसंख्या एक सौ पैंतालीस करोड़ है और भारत दुनिया का सबसे युवा लोकतांत्रिक देश है। सवाल सीधा है – क्या पाँच सौ तैंतालीस सांसद एक सौ पैंतालीस करोड़ आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं? जवाब है – नहीं। भारत की सामान्य जनता और विशेषकर नई पीढ़ी के लिए सांसदों की संख्या बढ़ाना कोई राजनीतिक शौक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है।

लोकतंत्र का मूल सिद्धांत – एक मत, एक समान मूल्य:लोकतंत्र का अर्थ है प्रतिनिधित्व। आज भारत में एक सांसद औसतन छब्बीस लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। तुलना करें तो ब्रिटेन में एक सांसद एक लाख लोगों का और अमेरिका में एक जनप्रतिनिधि साढ़े सात लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर से लेकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय तक सभी विचारकों का मानना था कि प्रतिनिधि जनता के निकट होना चाहिए। अम्बेडकर ने संविधान सभा में चेतावनी भी दी थी कि दूर का प्रतिनिधि, दूर का शासक बन जाता है। दीनदयाल उपाध्याय का अंत्योदय का विचार कहता है कि कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति की भी अपने जनप्रतिनिधि तक पहुँच होनी चाहिए।जब हम लोकसभा सदस्य संख्या पाँच सौ तैंतालीस से बढ़ाकर आठ सौ या आठ सौ अठासी करते हैं, जिसके लिए ही नया संसद भवन बनाया गया है, तो एक सांसद छब्बीस लाख के बजाय पंद्रह-सोलह लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करेगा। बाड़मेर, बस्तर या उधमपुर के एक आम नागरिक के लिए इसका अर्थ है कि उसका सांसद अधिक निकट, अधिक जवाबदेह और अधिक उपलब्ध होगा। यह राष्ट्र के लिए सीधा लाभ है।

विचारक और विपक्षी दल क्या कहते हैं:पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी जैसे विचारक संघीय संतुलन के लिए पाँच सौ तैंतालीस को बनाए रखने की वकालत करते हैं। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों द्वारा लोकसभा की सदस्य संख्या पाँच सौ तैंतालीस पर ही बनाए रखने के पीछे मुख्य रूप से कुछ बड़े तर्क दिए जाते हैं।पहला तर्क संघीय न्याय का है कि दक्षिण भारत को सज़ा न मिले। उन्नीस सौ छिहत्तर में इंदिरा गांधी सरकार ने बयालीसवें संविधान संशोधन से यह तय किया था कि लोकसभा सीटों की संख्या उन्नीस सौ इकहत्तर की जनगणना पर ही रुकी रहेगी, ताकि जो राज्य परिवार नियोजन में अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें सज़ा न मिले। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना ने जनसंख्या नियंत्रित की। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान में जनसंख्या तेजी से बढ़ी। कांग्रेस, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम, तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दलों का कहना है कि यदि सीटें पाँच सौ तैंतालीस से बढ़ाकर आठ सौ की जाती हैं, तो उत्तर प्रदेश की सीटें अस्सी से एक सौ बीस हो जाएंगी और तमिलनाडु की उनतालीस से उनसठ ही होंगी। अनुपात तो वही रहेगा, पर बहुमत का अंतर इकतालीस से बढ़कर इकसठ हो जाएगा। इससे हमेशा उत्तर भारत के मत से ही सरकार बनेगी और दक्षिण की आवाज कमजोर हो जाएगी। यह संघवाद के खिलाफ है।दूसरा तर्क बड़ी लोकसभा और कमजोर बहस का है। विपक्ष के साथ कुछ चिंतकों का कहना है कि लोकतंत्र संख्या से नहीं, गुणवत्ता से चलता है। आज पाँच सौ तैंतालीस सांसदों में भी बहुत से सांसदों को बोलने का मौका नहीं मिलता। यदि आठ सौ से अधिक सांसद हो गए, तो एक सांसद को वर्ष में दो-तीन मिनट ही बोलने को मिलेगा। संसद हाट-बाजार बन जाएगी और गंभीर कानूनों पर चर्चा कम हो जाएगी। उदाहरण देते हैं कि अमेरिका ने सौ वर्ष से अपने प्रतिनिधि सदन को चार सौ पैंतीस पर रोक रखा है, जबकि जनसंख्या तीन गुनी हो गई। इटली ने छह सौ तीस से घटाकर चार सौ और हंगरी ने तीन सौ छियासी से घटाकर एक सौ निन्यानवे कर दिया।

तीसरा तर्क महिला आरक्षण को तुरंत लागू करने का है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सहित तमाम विपक्षी दलों का यही मुख्य प्रस्ताव है कि महिला आरक्षण इसी संख्या में तय किया जाए। सरकार ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम दो हजार तेईस पास तो कर दिया, पर कहा कि यह नए परिसीमन के बाद लागू होगा। विपक्ष का आरोप है कि सीटें बढ़ाने के नाम पर सरकार महिला आरक्षण को दो हजार उनतीस तक टालना चाहती है। अगर पाँच सौ तैंतालीस पर ही तैंतीस प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया जाए, तो तुरंत एक सौ इक्यासी महिला सांसद आ जाएंगी।चौथा तर्क खर्च और व्यावहारिकता का है। तीन सौ नए सांसदों का अर्थ है वेतन, निवृत्ति वेतन, बंगले, कार्यालय, कर्मचारी और सुरक्षा पर हर वर्ष अतिरिक्त खर्च बढ़ेगा। विपक्ष का मानना है कि यह हजारों करोड़ का बोझ आम जनता के कर पर पड़ेगा, जबकि आज भी संसद में हंगामे के कारण तीस प्रतिशत समय बर्बाद होता है।

पाँचवां तर्क यह है कि परिसीमन बिना संख्या बढ़ाए भी संभव है। विपक्ष का तकनीकी तर्क है कि जनसंख्या के हिसाब से निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तो बदली जा सकती हैं, पर कुल संख्या पाँच सौ तैंतालीस ही रखी जाए। जैसे महाराष्ट्र में मुंबई की एक सीट में बाईस लाख मतदाता हैं और गढ़चिरौली में ग्यारह लाख हैं। तो मुंबई को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है, बिना पूरे देश की सीटें बढ़ाए। विधानसभाओं की सीटें बढ़ाई जा सकती हैं ताकि नेता जनता के निकट आए, पर लोकसभा की पाँच सौ तैंतालीस की संघीय संतुलन वाली व्यवस्था को छेड़ना देश की एकता के लिए लाभदायक नहीं होगा।वहीं कई अन्य प्रतिष्ठित विचारक विस्तार के पक्ष में हैं। अर्थशास्त्री प्रो. शमिका रवि का मानना है कि परिसीमन को उत्तर बनाम दक्षिण की सज़ा के रूप में नहीं, बल्कि प्रति-व्यक्ति विकास के घाटे को सुधारने के रूप में देखना चाहिए। उत्तरी राज्यों में अधिक युवा हैं जिन्हें अधिक विद्यालय, चिकित्सालय और रोजगार चाहिए। वहाँ अधिक सांसद होने से युवाओं के लिए विकास निधि पर अधिक बहस होगी। राजनीति शास्त्र के विद्वान सुहास पालशिकर कहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र अब विशिष्ट वर्ग के प्रतिनिधित्व से जन-प्रतिनिधित्व की ओर बढ़ गया है। अधिक सीटें अधिक सामाजिक समूहों, अधिक पहली पीढ़ी के नेताओं और अधिक महिलाओं को संसद में आने का मौका देंगी, जो लोकतंत्र को गहरा करने के लिए अच्छा है। पूर्व वित्त मंत्री स्वर्गीय अरुण जेटली का तर्क था कि उन्नीस सौ इकहत्तर का स्थगन परिवार नियोजन के लिए एक अस्थायी प्रोत्साहन था, कोई स्थायी लोकतांत्रिक रूपरेखा नहीं। हम उन्नीस सौ इकहत्तर के मानचित्र पर इक्कीसवीं सदी के महाशक्ति भारत को नहीं चला सकते। राम मनोहर लोहिया का मानना था कि भारत में चौखंभा राज है। सत्ता का बंटवारा चार खंभों – गाँव, जिला, राज्य और केंद्र में होना चाहिए। बड़ी लोकसभा इसी विकेंद्रीकृत आदर्श के अधिक निकट है।

आम जनता के नजरिए से देश को लाभ:बेहतर पहुँच और शासन का लाभ मिलेगा। आज एक सांसद के अधीन पाँच से दस विधानसभा क्षेत्र हैं, जो सौ-डेढ़ सौ किलोमीटर में फैले हैं। हर गाँव में जाना शारीरिक रूप से असंभव है। छोटे निर्वाचन क्षेत्रों के साथ सांसद महीने के बीस दिन अपने क्षेत्र में रह सकेगा। जनता की शिकायतें तेजी से सुनी जाएंगी।अधिक केंद्रित विकास होगा। सांसद निधि और केंद्रीय योजनाएं छोटे क्षेत्रों में बंटेंगी, जिससे अधिक लक्षित खर्च होगा। छोटे क्षेत्र का अर्थ है सड़कों, विद्यालयों और स्वास्थ्य केंद्रों की बेहतर निगरानी।

अपराधीकरण पर अंकुश लगेगा। बहुत बड़े निर्वाचन क्षेत्रों में जीतने के लिए भारी धन और बाहुबल की आवश्यकता होती है। छोटे निर्वाचन क्षेत्र प्रचार लागत को कम करते हैं और एक ईमानदार, शिक्षित मध्यमवर्गीय उम्मीदवार के लिए चुनाव लड़ना संभव बनाते हैं।महिला आरक्षण वास्तविक होगा। नारी शक्ति वंदन अधिनियम में तैंतीस प्रतिशत महिला आरक्षण है। अगर हम पाँच सौ तैंतालीस रखते हैं, तो केवल एक सौ इक्यासी महिला सांसद मिलेंगी। अगर हम आठ सौ करते हैं, तो दो सौ चौंसठ महिला सांसद मिलेंगी। यानी तिरासी अधिक महिला नेता, हमारी युवा बेटियों के लिए अधिक आदर्श उपलब्ध होंगे।

नई पीढ़ी के लिए विशेष संदेश:आज के भारत की बावन प्रतिशत आबादी अंकीय पीढ़ी है। आपको ऐसा नेता नहीं चाहिए जो पाँच साल में एक बार आए। आपको सामाजिक माध्यमों पर रोज जवाबदेही चाहिए। आज की युवा पीढ़ी को रोजगार दिलाने वाले और बदलाव लाने वाले नेतृत्व की जरूरत है। यह पीढ़ी रोजगार, कौशल शिक्षा, नवाचार और जलवायु संरक्षण के लिए लड़ रही है। सांसद-विधायक की संख्या कम होने से इनकी आवाज दब जाती है क्योंकि एक सांसद को किसान, व्यापारी और छात्र सबको एक साथ देखना पड़ता है। बड़ी लोकसभा शहरी-केंद्रित निर्वाचन क्षेत्र बनाएगी – जैसे पुणे-मध्य-तकनीक, बेंगलुरु-नवाचार। जहाँ आपका सांसद केवल आपके विषयों – प्रशिक्षुता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता नीति, पर्यावरण पर बात करेगा। यह उनके लिए सांसद-विधायक बनने के द्वार भी खोलेगा। अधिक सीटों का अर्थ है युवा चेहरों के लिए अधिक अवसर। राजनीतिक दलों को साठ वर्ष से अधिक के बजाय तीस-चालीस वर्ष के युवाओं को अवसर देने का मौका मिलेगा।विचारक योगेंद्र यादव का मानना है कि यदि भारत को युवा रहना है, तो उसकी संसद को भी युवा बनना होगा। विस्तार ही इसका रास्ता है। आने वाली पीढ़ी जो आज दस-तेरह वर्ष की है, दो हजार चौंतीस-सैंतीस में जब मतदाता बनेगी, वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वार्तालाप प्रणाली और जलवायु संकट के साथ बड़ी हो रही है। उनको ऐसी संसद चाहिए जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता नियमन, आंकड़ा गोपनीयता और हरित ऊर्जा को समझे। एक बड़ी संसद में बीस-तीस युवा सांसदों की विशेष समितियां हो सकती हैं जो केवल भविष्य की तकनीक पर काम करें, जो पाँच सौ तैंतालीस की साठ-सत्तर वर्ष की भीड़ भरी सदन में असंभव है, जहाँ एक ही समिति सब कुछ संभालती है। युवल नोआ हरारी जैसे विचारक चेतावनी देते हैं कि यदि प्रतिनिधित्व सूचना विस्फोट के साथ नहीं बढ़ा तो भविष्य के लोकतंत्र विफल हो जाएंगे। आने वाली पीढ़ी के लिए बड़ी लोकसभा केवल संख्या के बारे में नहीं है, यह लोकतंत्र को भविष्य के लिए तैयार करने के बारे में है।

डर का समाधान – क्या दक्षिण भारत हारेगा:यह सबसे भावनात्मक तर्क है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जैसे विचारकों ने इसका समाधान सुझाया था – सीटें आनुपातिक रूप से बढ़ाओ, लेकिन साथ ही राज्यसभा में प्रतिनिधित्व और वित्तीय बंटवारे में उन राज्यों को अधिक सम्मान दो जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रित की। सीटों में वृद्धि सज़ा नहीं होनी चाहिए। इसे एक ऐसे सूत्र से किया जा सकता है जहाँ हर राज्य को कुछ वृद्धि मिले और उत्तरी राज्यों को जनसंख्या के कारण थोड़ा अधिक मिले। इससे संतुलन बना रहेगा। देश एकजुट रहेगा और कोई भी राज्य खुद को ठगा हुआ महसूस नहीं करेगा।आठ सौ अठासी सीटों वाला नया संसद भवन केवल एक इमारत नहीं, एक दृष्टिकोण है। दो हजार छब्बीस में पाँच सौ तैंतालीस पर टिके रहना पाँचवी पीढ़ी के भारत को दूसरी पीढ़ी के तंत्र पर चलाने जैसा है। आम जनता के लिए इसका अर्थ है – निकट का नेता, तेज काम और अधिक ईमानदार राजनीति। नई पीढ़ी के लिए इसका अर्थ है आवाज के लिए अधिक रोजगार, आयु के लिए अधिक अवसर और एक ऐसा सांसद जो उनके सपनों का जवाब दे सके। आने वाली पीढ़ी के लिए इसका अर्थ है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु और अंतरिक्ष के लिए तैयार संसद। लोकसभा सदस्यों की संख्या बढ़ाना किसी एक दल को लाभ पहुँचाने के बारे में नहीं है। यह भारत को लाभ पहुँचाने के बारे में है। एक बड़ी, युवा और अधिक विविध लोकसभा भारत को न केवल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनाएगी, बल्कि दुनिया का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व वाला और भविष्य के लिए तैयार लोकतंत्र भी बनाएगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *