अमृत काल के बाद सवाल: क्या हम शहीदों के सपनों वाला भारत बना पाए?

15 अगस्त विशेष लेख
_डॉ. बालाराम परमार_
सवाल सीधा है। और जवाब हम सब की जुबान पर में है। आजादी के अमृतोत्सव काल के 4 पूर्ण हो चुके है। 2047 में भारत आज़ादी के 100 साल मनाएगा। सरकारें योजना बना रही हैं। कॉर्पोरेट टारगेट दे रहे हैं। पर इन सबके बीच एक आवाज़ दब गई है। वो आवाज़ उन 20-25 साल के शहीदों की है जिन्होंने 1947 से पहले फांसी का फंदा चूमा था। वो सवाल पूछ रहे हैं। “तुमने हमारे सपने का क्या किया?”तो चलिए आज आजादी के 79 के आईने देखते हैं। और खुद से पूछते हैं।
सवाल 1: क्या हमने “डर मुक्त” भारत बनाया?* शहीदों का सबसे पहला सपना था। एक ऐसा भारत जहां किसान लगान के नाम पर थर-थर न कांपे। जहां छात्र अंग्रेज अफसर को देखकर रास्ता न बदले। आज 2026 है। अंग्रेज नहीं हैं। पर डर के नए ठेकेदार आ गए हैं। गांव का लड़का पिताजी द्वारा लिये गये बैंक लोन के डर से आत्महत्या करता है। नोकरी न चली जाए, इसके डर से शहर का युवा बॉस की गाली को चुपचाप सहता रहता है। यूट्यूबर ट्रोल आर्मी के डर से सच नहीं बोलता। छोटा दुकानदार टैक्स नोटिस के डर से रात भर सो नहीं पाता। क्या यही वो भारत था जिसका सपना चंद्रशेखर आजाद ने देखा था? क्या फांसी इसलिए चढ़े थे कि 79 साल बाद हम अपने ही सिस्टम से डरें? असली आज़ादी तब होगी जब एक गरीब भी आंख में आंख डालकर सवाल पूछ सके। बिना डरे।
सवाल 2: क्या हमने “भूख मुक्त” दिमाग वाला भारत बनाया? भगत सिंह जेल में लेनिन को पढ़ते थे। रामप्रसाद बिस्मिल कविता लिखते थे। उनके पास समय कम था पर विचार बहुत थे। आज हमारे पास बर्गर है। नेटफ्लिक्स है। 2GB डेटा रोज फ्री है। पर दिमाग खाली है। हमारा युवा 3 घंटे रील स्क्रॉल करता है। 10 मिनट किताब नहीं पढ़ता। हम गूगल पर “कैसे अमीर बनें” सर्च करते हैं। “देश कैसे बनाएं” नहीं। हमारे कॉलेज में डिग्री मिलती है। दिशा नहीं मिलती। शहीदों ने खून देकर हमें समय दिया था। हमने उस समय को रील में उड़ा दिया। क्या ये उनके सपने वाला भारत है?
अमृत काल के बाद की असली परीक्षा अभी बाकी है मेरे युवा साथी । क्या हम 1 करोड़ युवाओं को “सोचने वाला” बना पाएंगे या सिर्फ “उपभोग करने वाला”?
सवाल 3: क्या हमने “काम देने वाला” भारत बनाया या “काम मांगने वाला”? 1947 के बाद नेहरू ने कहा था “आराम हराम है”। जनता और युवाओं को कड़ी मेहनत, निरंतर कर्म और राष्ट्र निर्माण में जुट जाने का संदेश दिया था।लाल बहादुर शास्त्री जी ने नारा दिया था: “जय जवान, जय किसान”। सन् 1965 के युद्ध और खाद्यान्न संकट के दौरान देश के सैनिकों के बलिदान और किसानों के परिश्रम को एक सूत्र में पिरोकर राष्ट्रीय स्वाभिमान जगाया था। इंदिरा गांधी का नारा था “गरीबी हटाओ”। चुनावी राजनीति और सामाजिक कल्याण को केंद्रबिंदु बनाते हुए वंचित वर्ग तथा गरीबी उन्मूलन को मुख्य मुद्दा बनाया था। अटल बिहारी वाजपेयी जी ने लालबहादुर शास्त्री के नारे : “जय जवान, जय किसान में, जय विज्ञान” जोड़कर देश की रक्षा, अन्न उपजाने के साथ-साथ तकनीकी और वैज्ञानिक प्रगति को राष्ट्र की प्राथमिकता बनाया था। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी का नारा है: “सबका साथ, सबका विकास”, “आत्मनिर्भर भारत”। जिसके माध्यम से राष्ट्र समावेशी विकास और देश को आर्थिक रूप से स्वदेशी व मजबूत बनाने की दिशा में अग्रसर हो रहा है। राष्ट्र पिता महात्मा गांधी ने कहा था “हर हाथ को काम”।आज स्थिति क्या है? 10 करोड़ युवा। 1 करोड़ सरकारी नौकरी। बाकी 9 करोड़ क्या करें? हमने एक पूरी पीढ़ी को “अप्लाई करो” मोड में डाल दिया है। SSC का फॉर्म, बैंक का फॉर्म, पुलिस का फॉर्म। रिजल्ट 3 साल बाद। शहीदों ने अपना जीवन देकर हमें “निर्माता” बनाना चाहा था। हमने खुद को “आवेदक” बना लिया। अमृत काल के बाद हम ये कह सकते हैं कि हर युवा के पास 2 रास्ते हैं। नौकरी या अपना स्टार्टअप? हम गांव-गांव में “काम के कारखाने” खोल पाएंगे या सिर्फ कोचिंग सेंटर?जब तक एक युवा को अपने शहर में रोजगार नहीं मिलेगा तब तक वो पलायन करेगा। और पलायन करने वाली प्रवृतियों से कभी राष्ट्र नहीं बनाता।
सवाल 4: क्या हमने “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” बनाया या “एल्गोरिदम वाला भारत”?आजाद, भगत, बिस्मिल, अशफाक। चारों अलग मजहब, अलग प्रदेश। पर एक झंडे के नीचे भारत माता के लिए न्यौछावर हो गये।आज हमारा झंडा एक है। पर फीड अलग-अलग है। तुम्हारा इंस्टाग्राम कुछ और दिखाता है। मेरा कुछ और। तुम्हारा व्हाट्सएप ग्रुप कुछ और बोलता है। मेरा कुछ और। हम एक ही देश में रहते हैं पर अलग-अलग सच्चाई में जीते हैं।
शहीदों ने “भारत माता” के लिए जान दी थी। हमने “भारत माता” को भी हैशटैग में बांट दिया। क्या अमृत काल के बाद हम 140 करोड़ लोगों को किसी राष्ट्रीय समस्या पर एक टेबल पर बिठाकर बात करवा पाएंगे? बिना गाली दिए? बिना ब्लॉक किए? अगर नहीं, तो ये खंड-खंड भारत शहीदों का सपना नहीं हो सकता।
सवाल 5: क्या हमने “गर्व वाला” भारत बनाया या “शर्म वाला”? ये सबसे कड़वा सवाल है।हम चांद पर पहुंचकर गर्व करते हैं। और अगले दिन उसी चांद रोवर तैयार करने वालों पर राजनीतिक जिंटा अस्सी करते नहीं थकते हैं। हम ओलंपिक में मेडल पर गर्व करते हैं। और खेल के मैदान को कचरा घर बना देते हैं। हम योग दिवस पर गर्व करते हैं। और योग करने के बाद प्लास्टिक की बोतल पार्क में फेंक देते हैं। शहीदों ने हमें “स्वाभिमान” दिया था। हमने उसे “शो ऑफ” बना दिया।क्या हम उस दिन को देख पाएंगे जब एक विदेशी भारत आकर कहे “यहां की हवा साफ है”। “यहां के लोग समय के पाबंद हैं”। “यहां भ्रष्टाचार नहीं है”। उस दिन हम कह पाएंगे कि हमने शहीदों का सिर ऊंचा किया।सरकारें GDP, एक्सपोर्ट, FDI का रिपोर्ट कार्ड बनाती हैं। युवाओं को अब एक नया रिपोर्ट कार्ड बनाना होगा। “शहीद सपना रिपोर्ट कार्ड”
1. पिछले साल तुमने कितनी बार अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाई? 2. पिछले साल तुमने कितने जरूरतमंद लोगों की मदद की।
3. तुमने अपने 1 किमी के दायरे को कितना साफ रखा?
4. फोन के अलावा तुमने कितने घंटे किताब को दिए?
5. तुमने कितने लोगों से दोस्ती की जो तुमसे अलग सोचते हैं? अगर 18 से 30 साल का हर युवा इस रिपोर्ट कार्ड में पास हो गया। तो समझो अमृत काल सफल हो गया है।*3 काम जो सिर्फ युवा ही कर सकता है बुजुर्ग भाषण देंगे। सरकार योजना बनाएगी। पर धरती पर उतारने का काम तुम्हारा है।
काम 1: “डिजिटल फौज” बनो। बंदूक की जगह लैपटॉप। गोली की जगह कोड। हर युवा एक समस्या चुने। पानी, ट्रैफिक, शिक्षा। और 6 महीने में उसका टेक समाधान बनाए। सरकार को दो। कंपनी को बेचो। दुनिया को दिखाओ। ये नई सरफरोशी है।
काम 2: “मोहल्ला संसद” चलाओ।हर महीने अपने सोसाइटी, कॉलेज, गांव में 1 घंटे की मीटिंग। कोई नेता नहीं। सिर्फ युवा। 3 मुद्दे। 3 समाधान। 3 जिम्मेदारी। व्हाट्सएप ग्रुप से निकलकर जमीन पर आओ। लोकतंत्र यहीं से जिंदा रहेगा।काम 3: “पहला वेतन, पहला कर्तव्य”। जिस महीने पहली तनख्वाह आए। उसका 5% हिस्सा। 500 रुपये ही सही। एक गरीब बच्चे की फीस में। ये दान नहीं है। ये “ऋण” है। वो ऋण जो हम चुका नहीं सकते। पर निभा सकते हैं।
अगर जवाब “नहीं” है तो?मान लो 2047 में हम फेल हो शकी श्रेणी में गिने जाएंगे । प्रदूषण है। बेरोजगारी है। नफरत है। तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। वो लिखेगा। “एक पीढ़ी को मौका मिला था। उसके पास इंटरनेट था। लोकतंत्र था। दुनिया का बाजार था। पर उसने रील बनाना चुना। देश बनाना नहीं।”क्या हम ये धब्बा अपने माथे पर लेना चाहते हैं?और एक अंतिम सवाल ।इस 15 अगस्त को झंडा फहराने के बाद 2 मिनट आंख बंद करना।और कल्पना करना। भगत सिंह तुम्हारे सामने खड़े हैं। उम्र 23। हाथ में किताब। और वो पूछते हैं “भाई, तुम क्या कर रहे हो?”तुम्हारे पास क्या जवाब होगा?”सर, मैं सरकारी नौकरी का इंतजार कर रहा हूं” या “सर, मैं 10 लोगों को नौकरी दे रहा हूं””सर, मैं रोज 4 घंटे ट्रैफिक में हूं” या “सर, मैं अपने शहर की ट्रैफिक की समस्या हल कर रहा हूं”स्वर्ण जयंती हमें विरासत में नहीं मिलेगी। उसे कमाना पड़ेगा। पसीने से। ईमानदारी से। एकता से। क्योंकि शहीदों ने हमें भारत दिया था। अब हमें तय करना है कि हम भारत को क्या देंगे।तो जवाब क्या है? *क्या हम शहीदों के सपनों वाला भारत बना पाए?*बनाना पड़ेगा। क्योंकि अब कोई और नहीं आएगा। अब देश के युवा आपकी ही बारी है।
जय हिंद।