गुरु तत्व: सांत्वना नहीं, सत्य का संहारक रूप और नव-जागरण उद्गाता..
*बांगरु-बाण* श्रीपाद अवधूत की कलम से*
*आज गुरु पूर्णिमा है, जिसे सनातन परंपरा में व्यास पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है। यह केवल किसी गुरु का जन्मदिन अथवा सम्मान दिवस नहीं है, बल्कि उस दिव्य गुरु-तत्त्व की आराधना का पर्व है, जिसके कारण मानव पशुता से मनुष्यता और मनुष्यता से देवत्व की यात्रा करता है।
महर्षि वेदव्यास ने वेदों का विभाजन किया, महाभारत की रचना की, अठारह पुराणों का संकलन किया तथा उपनिषदों के गूढ़ ज्ञान को जनसामान्य तक पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त किया। इसलिए इस दिन उन्हें आदिगुरु के रूप में स्मरण किया जाता है। किंतु व्यास भी कहते हैं कि व्यक्ति नहीं, ज्ञान का प्रवाह ही गुरु है।
गुरु हमारे जीवन का वह सर्वश्रेष्ठ और एकमात्र तत्व है, जो हमें अस्तित्व की असीम गहराइयों और अध्यात्म की अनंत ऊंचाइयों से स्पर्श कराकर पुनः चेतना के धरातल पर प्रामाणिकता के साथ खड़ा कर देता है। गुरु कोई दिलासा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि सत्य का साक्षात्कार कराने वाली एक प्रचंड ऊर्जा है। *साधारणतया, हमने ‘गुरु’ शब्द को बहुत सीमित और सतही अर्थों में समेट लिया है। जिसे हम आधुनिक भाषा में शिक्षक या टीचर कहते हैं जो हमें जीवन-यापन, सामाजिक उन्नति, और भौतिक विकास के नियम सिखाता है। वह निश्चय ही आदरणीय है, परंतु वह ‘गुरु’ नहीं है।* गुरु इससे अत्यंत परे है। गुरु कोई व्यक्ति या पेशा नहीं, *गुरु चेतना की एक अवस्था (State of Consciousness) है। निस्संदेह शिक्षक समाज का निर्माता है, परंतु शिक्षक और गुरु में वही अंतर है जो दीपक और सूर्य में है।
*शिक्षक जानकारी देता है। गुरु जागरूकता देता है। शिक्षक बुद्धि को प्रशिक्षित करता है। गुरु चेतना को प्रकाशित करता है। शिक्षक संसार में सफल बनाता है। गुरु स्वयं पर विजय प्राप्त करना सिखाता है। इसलिए भारतीय परंपरा में गुरु को माता-पिता से भी उच्च स्थान दिया गया।
*”यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥”*(श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.23) अर्थात् *जिस प्रकार ईश्वर में श्रद्धा हो, वैसी ही गुरु में हो, तभी ज्ञान के रहस्य उद्घाटित होते हैं।*गुरु शब्द का वास्तविक अर्थ “*स्कन्द पुराण* में कहा गया*”गु” अन्धकारः।**”रु” तन्निरोधकः।*अर्थात् *जो अज्ञानरूपी अंधकार का नाश करे वही गुरु है।*किन्तु मुझे लगता है कि इसकी एक और भी गहरी व्याख्या है।गुरु वह है जो हमारी नींद तोड़ दे।यह नींद केवल शरीर की नहीं है।यह अज्ञान की नींद है।यह अहंकार की नींद है।यह लोभ, मोह, ईर्ष्या, भय, प्रतिष्ठा और कल्पनाओं की बेहोशी है।हम आँखें खोलकर भी सो रहे हैं।हम सोचते हैं कि हम स्वतंत्र हैं, जबकि वास्तव में हमारी प्रतिक्रियाएँ हमारे संस्कारों द्वारा नियंत्रित होती हैं।*
कठोपनिषद् का अमर उद्घोष है**” उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।”**उठो।**जागो।**और जब तक सत्य न मिल जाए तब तक रुको मत।*ध्यान दीजिए ऋषि केवल “उठो” नहीं कहते। उठना शरीर का कार्य है। जागना चेतना का कार्य है। इसीलिए यह कहना कि *”पानी पीजै छान के, गुरु कीजै जान के”,* गुरु के संदर्भ में एक अज्ञानतापूर्ण बात है। क्योंकि जो स्वयं अज्ञान की नींद में सोया हो, वह अपनी सोई हुई इंद्रियों से जागरण के फल को कैसे परख सकता है? यह तो वैसी ही बात हुई *जैसे कोई हीरा किसी पारखी (जौहरी) की परख कर उसके पास पहुंच जाए।”* वास्तविक प्रश्न यह है कि हम गुरु को जान ही कैसे सकते हैं? गुरु वह परा-ऊर्जा है जो हमें उस ‘अज्ञात’ को जानने की क्षमता देती है जिसे हम नहीं जानते; वह हमें वह ‘अदृश्य’ देखने की दृष्टि देती है जो हमारी सीमित इंद्रियाँ (Five Senses) नहीं देख सकतीं।उपनिषद कहते हैं:”*”तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥”*(अर्थात्: *उसी के प्रकाश से यह सब प्रकाशित होता है, वही परम प्रकाश गुरु है।)*गुरु का केवल एक ही वास्तविक अर्थ है: आपकी सदियों पुरानी नींद को निर्दयतापूर्वक तोड़ देना। आपको सम्मोहन (Hypnosis) से जगा देना, आपके सपनों को तितर-बितर कर देना और आपको शुद्ध ‘होश’ (Awareness) से भर देना।हमारी यह नींद केवल एक रात की थकान नहीं है। *मनोविज्ञान की भाषा में इसे ‘कलेक्टिव अनकन्शसनेस’ (Collective Unconsciousness) या आनुवंशिक बेहोशी कहा जाता है।* आधुनिक मनोविज्ञान स्वीकार करता है कि मनुष्य का ९५ प्रतिशत जीवन उसके *अवचेतन मन (Unconscious Mind) के स्वचालित ढर्रों से संचालित होता है। हम जागते हुए भी सोए हुए हैं।*जब कोई हमें इस गहरी आध्यात्मिक बेहोशी से झकझोरता है, तो हमारा *’अहंकार’ (Ego)* उसे मित्र नहीं, अपना शत्रु मानता है। मन आलस्य और सुरक्षा की खोज का नाम है। मन सत्य नहीं चाहता, मन केवल *सांत्वना (Consolation)”* चाहता है।और *इसी सांत्वना की मांग के कारण बाज़ार में ‘मांग और आपूर्ति’ (Demand and Supply) का अर्थशास्त्रीय नियम लागू हो जाता है।* चूँकि *करोड़ों लोगों को सत्य नहीं, केवल मीठी लोरियाँ और सांत्वना चाहिए, अर्थात उनके जो तात्कालिक दुख है सांसारिक दुख है उनकी मुक्ति या उनसे छुटकारा पाने का जो रास्ता उन्हें बता दे वही व्यक्ति उन्हें गुरु लगने लगता है। एक लोटा जल सारी समस्याओं का हल या पर्चा निकाल कर भविष्य बांचने वाले असंख्य कथाकार, टोना टोटका करने वाले बाबा, झाड़ फूंक करने वाले ओझा, तंत्र के नाम पर व्यभिचार करने वाले तांत्रिक मांत्रिक भी उन्हें एक आध्यात्मिक गुरु के रूप में लगने लगते हैं।* और यह लोग समाज में केवल झूठ और पाखंड ही फैलाते हैं क्योंकि वही उनके पास में है। उनके पास आध्यात्मिक शक्ति, साधना, तपश्चर्या का अभाव होता है। इसलिए दुनिया में ९९ प्रतिशत गुरु पाखंडी और झूठे पैदा होते हैं। असद्गुरु इसलिए फलते-फूलते हैं क्योंकि शिष्य गलत और असत्य की मांग कर रहे हैं।यदि आपको किसी स्थान पर जाकर अपनी नींद और गहरी होती मालूम हो, जहाँ आपकी वासनाओं और अंधविश्वासों को सहलाया जाए, तो यह समझ लेना की अंधविश्वासों पर आधारित पाखंड की ही दुनिया है और ऐसे स्थान को तत्काल त्याग देना ही उचित है।*गुरु की तलवार: शांति नहीं, आत्यंतिक रूपांतरण**श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ४, श्लोक ४२)* में योगेश्वर श्रीकृष्ण इस तलवार का उल्लेख करते हैं:*”तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः। छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥”*(अर्थात्: *अपने हृदय में स्थित अज्ञानजनित संशय को ‘ज्ञान रूपी तलवार’ से काट डालो और युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।)*यही गुरु की तलवार है। यह तलवार शरीर नहीं काटती।यह अहंकार काटती है। यह भ्रम काटती है।यह झूठी पहचान काटती है।भगवान बुद्ध ने भी इसी प्रकार की कुछ बात कही है। *”लोग कहते हैं कि मैं शांति लाया हूँ, लेकिन मैं तुमसे कहता हूँ कि मैं तलवार लेकर आया हूँ।”*धार्मिक पाखंडियों को योगेश्वर कृष्ण और बुद्ध के इन कथनों को समझने में सदा कठिनाई हुई है। एक ओर जहाँ बुद्ध असीम करुणा और अहिंसा के प्रतीक हैं, वहीं वे ‘तलवार’ की बात करते हैं! यह तलवार कोई लोहे या शस्त्र की तलवार नहीं है; यह विवेक और बोध की आध्यात्मिक तलवार है।गुरु की यह तलवार आपके रक्त की एक बूंद बहाए बिना आपको काट फेंकती है। यह आपके असत्य (False Ego) को जलाकर राख कर देती है, ताकि आपके भीतर छिपा हुआ शुद्ध ‘स्वर्ण’ बाहर आ सके।*क्वांटम भौतिकी (Quantum Physics) का ‘ऑब्जर्वर इफेक्ट’ (Observer Effect) कहता है कि केवल एक ‘दृष्टा’ या ‘सचेतन चेतना’ की उपस्थिति मात्र से कणों का व्यवहार और पूरी भौतिक संरचना बदल जाती है। गुरु आपके जीवन में वही ‘परम दृष्टा’ है, जिसकी उपस्थिति आपके अज्ञान के ढाँचे को ढहा देती है।**जब गुरु आपकी नींद छीनता है, तो वह केवल आपका संसार ही नहीं छीनता, वह आपसे आपका तथाकथित ‘मोक्ष’ और ‘परमात्मा’ भी छीन लेता है। क्योंकि सोए हुए मनुष्य ने नींद में जिस ईश्वर, जिस मंदिर, और जिन शास्त्रों की कल्पना की थी, वे सब उस सोए हुए मन की ही उपज थे। नींद में बनाई गई दुकान यदि असत्य थी, तो नींद में बनाए गए मंदिर और पढ़े गए शास्त्र सत्य कैसे हो सकते हैं?*इसी परम क्रान्ति की घोषणा करते हुए *गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं:**”सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।”*गुरु के पास जाते ही आपकी सारी संकीर्ण पहचानें चाहे वह हिंदू, जैन, बौद्ध होने का अहंकार हो भस्म हो जाती हैं। यदि *गुरु के पास जाकर भी आप किसी पंथ के पंथिक या किसी उपासना पद्धति के उपासक ही बने रहे, तो समझ लेना कि आप अभी तक गुरु के पास पहुँचे ही नहीं है।**शास्त्र तो केवल अंधे की लकड़ी हैं। जिनसे वह रास्ता टटोलता है। गुरु की संनिधि में पहुँचकर आपके सारे सिद्धांत, सारे संप्रदाय और आपका ‘स्वयं का होना’ (Identity) विलीन हो जाता है। इसलिए गुरु के पास जाना ब्रह्मांड का सबसे बड़ा साहस है।* *लौह से स्वर्ण: पारस का रूपांतरण*वैदिक ऋषियों ने प्रार्थना की थी:*”असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय।”**(हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, और मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।)*यह यात्रा स्वयं के बल पर संभव नहीं है। गुरु वह ‘पारस पत्थर’ है जो शिष्य रूपी लोहे को स्पर्श करते ही कंचन (स्वर्ण) में रूपांतरित कर देता है। शिष्य का केवल एक ही कर्तव्य है—वह पूरी ईमानदारी, तपस्या और पुरुषार्थ से स्वयं को ‘लोहा’ (पात्र) बनाने का प्रयास करे। *जैसे ही जीवन में सौभाग्य से गुरु रूपी पारस का प्रवेश होता है, हमारा आमूल-चूल रूपांतरण हो जाता है। हम अपनी संकीर्णता, भय और अज्ञान से मुक्त होकर परम ज्योति से जगमगा उठते हैं।*गुरु : पारस से भी महान है। हमारी प्राचीन लोककथा कहती है कि पारस जो लोहे को स्वर्ण बना देता है।परंतु सद्गुरु पारस से भी श्रेष्ठ है।पारस केवल धातु बदलता है।गुरु चेतना बदल देता है।पारस लोहे को सोना बनाता है।गुरु मनुष्य को देवत्व की दिशा में अग्रसर करता है।*गुरु पूर्णिमा का संकल्प**आज यदि हम गुरु पूर्णिमा पर केवल पुष्प अर्पित कर लौट जाएं तो यह पर्व अधूरा रह जाएगा।**आज संकल्प लेना होगा कि हम अपने भीतर के अज्ञान को पहचानेंगे। अपने अहंकार को देखेंगे। अपने भय का सामना करेंगे। अपने भ्रमों को तोड़ेंगे और ऐसे सद्गुरु की प्रतीक्षा करेंगे जो हमें हमारी सुविधा नहीं, सत्य दे; हमारी नींद नहीं बढ़ाए, बल्कि हमें जगा दे।*अंत में कबीर की अमर वाणी*गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाय।**बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥*और उपनिषद् की प्रार्थना *असतो मा सद्गमय।**तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय॥**इसी मंगलकामना के साथ गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर समस्त गुरु-परंपरा, महर्षि वेदव्यास तथा प्रत्येक हृदय में विद्यमान गुरु-तत्त्व को कोटिशः प्रणाम। ईश्वर करे हमें ऐसा सद्गुरु प्राप्त हो जो हमारे भीतर सोई हुई चेतना को जागृत कर दे, अहंकार का आवरण हटा दे और आत्मा के सूर्य का साक्षात्कार करा दे। यही गुरु पूर्णिमा का वास्तविक उत्सव है।
अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त