शिक्षा के स्तर में गुणवत्ता का सुधार और सरकारी विद्यालयों से नीजी विद्यालयों में जाते विद्यार्थी।

रिंकेश बैरागी।

देश में सबसे अधिक सरकारी स्कूल और शिक्षक मध्यप्रदेश में है, और प्रदेश में 463 स्कूल ऐसे है, जहां पर इस वर्ष एक भी नए बच्चें ने प्रवेश नहीं लिया, इसी तरह आंकड़ो के अनुरुप बनती रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश में मध्य प्रदेश तीसरा प्रदेश है जहां अत्यधिक संख्या में विद्यालय नए विद्यार्थियों के प्रवेश से वंचित रहा है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफार्मेशन सिस्टम फार एजुकेशन (युडाइस) की रिपोर्ट में देशभर के स्कूलों की सूची सामने आई थी। इसी प्रकार प्रदेश एकल शिक्षक स्कूल में पांचवे स्थान पर है, रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश में 7217 विद्यालय ऐसे हैं जहां पर सिर्फ और सिर्फ एक शिक्षक ही है, और उसी एक शिक्षक के विश्वास में स्कूल चल रहे हैं। आंकड़ो की माने तो मध्यप्रदेश में पहली कक्षा से 12वी कक्षा तक के एक लाख 22 हजार सरकारी स्कूल है, इन स्कूलों में करीब सात लाख शिक्षक पदस्थ है। देखा जाए तो यह आंकड़ा देश में सर्वाधिक है। सरकार बच्चों को आकर्षित करने के लिए सबकुछ करती है, प्रवेश के दौरान, स्कूल चले हम, और गृह संपर्क जैसे अभियान भी चलाती है। लेकिन सरकार के सारे अभियान असुविधा की आड़ में अव्यवस्थित होते हुए असफल हो जाते हैं।देश में सरकारी स्कूली शिक्षा का और भी बूरा हाल पिछले दो वर्षों में देखा गया है।

देश में सरकारें सरकारी स्कूलों में सुविधाएं और शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए कार्य करने के साथ-साथ शिक्षको की संख्या भी बड़ी है, जिससे शिक्षक विद्यार्थी अनुपात भी उत्तम हुआ है, परंतु इसके पश्चात भी पिछले दो वर्षों में सरकारी स्कूल से 86 लाख विद्यार्थी बाहर हुए है और निजी स्कूलों में 88 लाख विद्यार्थी इन दो वर्षों में बढ़ गए है। इसका अर्थ यह हुआ कि, सरकारी स्कूलों के मुल्य पर निजी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्यां बढ़ रही है। नीति निर्माताओं के लिए यह चिंतनिय विषय है कि, इतने बड़े पैमाने पर सरकारी विद्यायलों पर संसाधन खर्च करने के बाद भी सरकारी स्कूल विद्यार्थियों और अभिभावकों की अपेक्षा पर खरे क्यों नहीं उतर रहे हैं, जबकि निजी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्न है, और निजी स्कूल तय किए गए मानकों का पालन भी नहीं करते हैं। सरकारी और निजी विद्यालय में इस अंतर का मुख्य कारण क्या हो सकता है, जबकि रिपोर्टस् के अनुसार निजी विद्यालय की तुलना में सरकारी स्कूलों में पढ़ाई ज्यादा अच्छी होती है। शिक्षा विशेषज्ञों और स्वतंत्र सर्वे के अनुसार अंग्रेजी माध्यम की इच्छा में अभिभावक अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में भेज रहे हैं, उनकी अवधारण है कि, उज्जवल भविष्य और नौकरी के लिए अंग्रेजी आना आवश्यक है। अधिकतर स्कूलों में क्षेत्रिय भाषा में शिक्षा देते हैं। दूसरा मुख्य कारण बच्चों की देखभाल, निगरानी, और जवाबदेही की सरकारी स्कूलों में कमी होती है जबकि सरकारी शिक्षकों को वेतन भी बहुत अच्छा मिलता है, फिर भी सरकारी स्कूलों में ढीले रवैये और शिक्षको की अनुपस्थिति की शिकायतें मिलती रहती है, वहीं प्रायवेट स्कूलों में बच्चों को मेनेजमेंट का डर बना हुआ रहता है। तीसरा कारण यह भी हो सकता है कि गांवों में और शहरों की कॉलोनियों में भी छोटे-छोटे प्राइवेट स्कूल खुले है जिनकी माह की फीस भी बहुत कम होती है, जहां निर्धन परिवार भी अपने पेट काटकर बच्चों को निजी विद्यालय में भेज देता है।

सरकार द्वारा बच्चों को स्कूल लाने के लिए बहुत से प्रलोभन दिए जाते हैं फिर भी पढ़ाई के लिए बच्चा वर्तमान समय में सरकारी विद्यालय जाने से मुंह मोड़ रहा है। बच्चों के लिए मध्यान भोजन, स्कूल ड्रेस, पुस्तकें इत्यादी निश्शुल्क दिए जाते हैं, उसके पश्चात भी बच्चों में सरकारी विद्यालय में जाने की रुची नहीं बनती दिखाई पड़ती। उसके विपरित बहुत से ऐसे बच्चें जिन्होंने महामारी के समय सरकारी विद्यालयों की ओर कदम बढ़ाए थे वे अब फिर से निजी विद्यायलों में प्रवेश कर चुके है। पिछले एक दशक में इन समस्या से जुझते हुए देश के 94,000 सरकारी स्कूल कम विद्यार्थी होने के कारण मर्ज किए गए है या फिर बंद कर दिए है, यह नीति आयोग की एक समीक्षा रिपोर्ट में दर्शाया गया है। इस के साथ ही कोरोना महामारी के बाद वर्षों में बहुत बड़ा उलटफेर दिखाई दिया है, जब कोरोना महामारी के समय आर्थिक तंगी के चलते बहुते अभिभावकों ने अपने बच्चों को सरकारी विद्यायल में प्रवेश दिलाया था, उससे अधिक अभिभावकों ने अपने बच्चों को अब निजी विद्यालयों में ले जा चुके है। दुरस्त ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी स्कूल अभी भी अभाव में चल रहे हैं, बहुत से प्राथमिक स्कूल ऐसे है जिनमें बच्चों की संख्या 9 से 10 या 12 ही है, वहां सुविधाओं का अभाव है, उनके माता-पिता अक्सर वहीं के शिक्षको से कहते हैं कि, हम अपने बच्चों को बिना सुविधा के नहीं पढ़ाएगे। बहुत से स्कूल ऐसे है जहां बारिश में छत टपकती है, जहरीले जानवर स्कूलों के कोने में, बाथरुम में घुस जाते हैं। बहुत से स्कूलों में पहुंचने की समस्या समान रुप से होती है जहां बारिश के मौसम में तो समस्या विकराल रुप लेकर शिक्षक और विद्यार्थियों को नहीं आने देती ऐसे में असुविधा वाली स्कूलों में माता-पिता कैसे अपने लाडले को शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजेगे। सरकारी स्कूलों की शिक्षा के स्तर में इस तरह तो सुधार नहीं हो पाएगा, सरकर को इस विषय की तरफ ध्यान रखकर चिंता करना जरुरी है। वहीं शाला त्यागी बच्चों का तो विषय ही अगल है।

बहरहाल इस बदलाव के पीछे क्या कारण हो सकता है… इसका सबसे बड़ आधार है मानवीय आकांक्षा। प्रत्येक माता-पिता यही चाहते है कि उनका बच्चा अच्छी शिक्षा प्राप्त कर उनसे बेहतर जीवन जिए। निजी स्कूलों का आकर्षण सरकारी स्कूलों से कई गुना ज्यादा होता है विशेषतौर पर वे सुरक्षा और अंग्रेजी माध्यम को सामने रखते है। आज के दौर में अंग्रेजी माध्यम, निजी विद्यालय और एक सुरक्षित बेहतर भविष्य को लगभग एक ही अर्थ में देखा जाने लगा है। इसके पीछे गहरा और गंभीर सामाजिक मनोविज्ञान काम करता है। किसी भी गांव, कस्बें, शहर नगर में प्रशासनिक अधिकारी, चिकित्सक, व्यापारी या जन प्रतिनिधि अपने बच्चों को निजी विद्यालय में भेजते हैं तब अन्य परिवार भी प्रतिष्ठावश उसी दिशा में बढ़ते है। यह अंतर एक दिन सरकारी और निजी स्कूल के बच्चों में गहरी गंभीर खाई न पैदा कर दे सरकार को इस विषय पर विचार-विमर्श करने की अत्धिक आवश्यकता है।

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