युवा पीढी नशे में भविष्य को कर रही दुर्बल, निर्बल, और क्षीणकाय- जिम्मेदार निष्क्रीय, असहाय, और लापरवाह।

रिंकेश बैरागी,

नशा नाश की जड़ है, नशा कुछ समय का वह घातक गंभीर रोगी सुख है जिसे पाकर युवा अपने आने वाले वंश को शक्तिहीन और अनेक रोगों को मुफ्त में देने की तैयारी कर रहे हैं। नशे में लिप्त मनुष्य अपने अंदर धीरे-धीरे समस्त कुसंगतों और कुकर्मों को अपनाने लगता है। वर्तमान समय में समाज का 70 प्रतिशत से ज्यादा युवा नशे में मकड़जाल में जकड़ा हुआ है, जिसे अपनी जिम्मेदारी भर का अहसास नहीं है और वह बेपरवाह होकर बेसुध बेवजह की कल्पनाओं के वश में स्वयं को बंधा हुआ पा कर नशे की सड़ती हुई स्वतंत्रता की ओर कदम ताल करता जा रहा है। जबकि वह यह नहीं जानता है कि, जिस घीनौनी कालप्निक स्वतंत्रता को वह अपनी सुख और शांति के साथ जोड़ रहा है असल में वह स्वतंत्रता है ही नहीं, वह तो भ्रामिक सुखद अनुभूति की एक प्रकार की परतंत्रता है। ऐसी परतंत्रता जिसमें भविष्य में कुकर्मों का काला काल है। यह अंधकार का बना हुआ अंधा कुआं है जिसमें जीवन का अंत और परिवार की समाप्ती के साथ सम्पूर्ण कूल का नाश होकर जगत का विनाश है। मध्य प्रदेश का प्रत्येक जिला नशे के काले अंधकार में लिप्त है, यहां तक कि, जनजाति क्षेत्रों में भी इसका प्रभाव है, जहां ग्रामीण शराब के नशे में तो शुरु से अपना जीवन व्यर्थ कर रहे है, फिर अब यहां ड्रग्स और अन्य नशीली दवाओं का भी उपयोग नशे के रुप में होने लगा है, साथ ही साथ शहरी क्षेत्र में जिस गति से नशीली दवाओं और ड्रग्स ने अपनी पैठ जमाई है, उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि, 20 से 25 वर्ष के युवा स्वयं को नशे में धुर्त कर जीवन को बर्बाद कर रहे हैं। बुद्धीजीवियों की माने तो ऐसा कोई समाज ही नहीं बचा जिसका युवक नशीली दवाओं, शराब, सिगरेट, बीड़ी या ड्रग्स की चपेट में न हो। यहां तक कि सिगरेट, बीड़ी, तम्बाकु, या बाजार में मिलने वाले तम्बाकु पान मसाला, इसका सेवन तो अब छोटे-छोटे बच्चें तक कर रहे हैं।

नशा इस तरह लोगों पर हावी है कि, वाहन चलाते समय भी लोग नशे का सेवन कर फर्राट वाहन को तेज गति से दौड़ाते हैं। नशे में लिप्त वाहन चालक को इस बात का भ्रम होता है कि वह वाहन की गति को नियत्रंण में रखकर नियमों के साथ वाहन चला सकता है लेकिन नशे के बूरे प्रभाव में आकर वह कल्पना की कोरी उड़ान में सारे कायदे कानून भूल जाता है। नशे में ड्रायवर के स्मृति पटल से बहुत सी बातें शुन्य हो जाती है और दृष्टी दोष के कारण सामने दिखाई देने वाले दृष्य में परिवर्तन हो जाता है। वाहन चलाने का जजमेंट बिगड़ जाता है, और नशा मस्तिष्क को विश्राम की स्थिति में ले जाता है तब आंखों में धुंधलापन आने लगता है फिर भारीपन पलको पर चढ़कर पलको को धीमें से झपकने पर विवश करता है। नशा इस प्रक्रिया को मधुरता के साथ करता है जिसका पता वाहन चालक को तब चलता है जब वह भारी पलकों को झपक लेता है, और इसी बीच सड़क पर हादसे का जन्म हो जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार ही 2025 में करीब मध्यप्रदेश में 15 हजार 800 लोगों की हादसों ने जीवन लीला समाप्त कर दी, इनमें से 44 प्रतिशत दो पहिया वाहन चालक या सवार थे, अधिकतर मौतों का आकंड़ा उन लोगों का है जिन्होंने हेलमेट या सीटबेल्ट नहीं लगाया था, इनमें 25 से 30 प्रतिशत ऐसे थे जिन्होंने नशे में वाहन चलाया था और हेलमेट या सीटबेल्ट नहीं लगाया था। 108 एंबुलेंस सेवा ने होली के दिन 948 दुर्घटना में सहायता प्रदान की थी जिसमें आधे से ज्यादा हादसे शराब पी कर वाहन चलाने के कारण हुए थे। विडंबना यह है कि हर वर्ष दुर्घटना के आंकड़े बढ़ते क्रम में सामने आते हैं, जो सरकार के सारे सड़क सुरक्षा के दावों को खोखला साबित कर देते हैं।

झाबुआ आलीराजपुर के हर नगर हर शहर यहां तक कि यह नशा गांव में भी पहुंच चुका है। लेकिन जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी निभाने में असहाय असक्षम से महसुस होते दिखाई दे रहे है। या फिर यह कहा जा सकता है कि, छोटे से लाभ के लिए वे एक बड़ी त्रासदी को आमंत्रण दे रहे है। यहां हम झाबुआ जिले की बात करे तो सर्व व्यापी है कि जिले में ड्रग्स कहां-कहां से आ रही है और नशीली दवाएं किस दिशा से शहर में मुड़ती है और फिर यहां कि शराब कहां-कहां जा रही है। इन सब स्थिति का स्तर देखे तो लगता है जैसे झाबुआ और आलीराजपूर जिला नशे के व्यापार का मुख्य गढ़ बना हुआ है। इस नशे से लड़ने के लिए न तो प्रशासन के पास कोई विकल्प है न ही पुलिस इस तरफ अपनी लाठी घुमाती नज़र आती है। और जब ये दोनों पंगु की तरह दिखाई दे रहे होते हैं तो जनता को समझ जाना चाहिए कि राजनीति इसमें पुरी तरह से सम्मिलीत है और उन्हीं राजनैतिक लोगों के संरक्षण में सारी नशीली दवा और ड्रग्स जिले में आसानी से आकर जनता के मासूम बच्चों को लत के रुप में लग जाती है। तभी तो न पुलिस कोई कार्रवाही करती है न ही प्रशासन इस ओर किसी कार्यवाही के निर्देश देता है।

इस तुफान से लड़ने के लिए एक अस्त्र है मगर वो भी अपने मियां मिठ्ठु बना फिरता है और वो है अपने-अपने क्षेत्र के सामाजिक संगठन… लेकिन ऐसे सामाजिक संगठनों को तो बस कुछ प्रसंसनिय कार्य कर के समाचार पत्रों में फोटो और अपने नाम से सरोकार होता है। बरसात के मौसम में 10 लोग मिलकर एक पौधा लगाकर फोटो खींचवाते है, इस तरह पौधे 50 लगा देगे मगर बारिश के बाद उन पौधो का क्या होता है ये सभी जानते हैं। ये सामाजिक संगठन समाज की मूल समस्या पर न तो कभी विचार करते है न ही कभी उस समस्या के समाधान पर विमर्श खड़ा करते हैं। नशे के कारण से जब भी कोई अप्रिय घटना घटती है तो समाज में अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए ज्ञापन के माध्यम से खेद जताते हैं और अधिकारी के साथ हंसते मुस्कुराते फोटो खींचवाकर अपनी पीठ थपथपाते हैं।

हालांकि, पिछले दिनों प्रदेश मुखिया ने नाइट कल्चर को समाप्त करने की बात कहीं लेकिन उसे अभी इंदौर जैसे बड़े शहरो में ही लागु किया जा रहा है, और उस पर भी कुछ विरोधी प्रवृति के जन मानस रोक लगाने के लिए एड़ी चौटी का जोर लगा रहे हैं। लेकिन प्रशासन या पुलिस चाहे तो अपने बल बूते पर जिले में नाइट कल्चर पर तुरंत रोक लगा सकती है जिससे रात को शहरों के मुख्य चौराहों पर जो लोगों की भीड़ जमा होती है चाय, गुटखा, पान मसाला या बीड़ी सिगरेट के बहाने से वह समाप्त होगी तब बाहर से आने वाला नशा भी प्रवेश करने में बाधित होगा जो कि अधिकतर रात में सफर करता है।

बहरहाल, पुलिस की गश्त, चाक चौबंद के बावजुद नशीले पदार्थ शहरों की सीमा में प्रविष्ट हो जाते है। जिसकी भनक तक पुलिस को नहीं लगती या पुलिस उस भनक को जानबुझ कर देखना ही नहीं चाहती, क्योंकि राजनीति संरक्षण और उपहार आंख बंद कर लेने पर मजबूर कर देता है।

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