यूरोप की भीषण गर्मीभारतीय सनातन जीवनशैली की ओर जाने का समय।

लेखक: सुमित गर्ग

यूरोप इस समय अपने आधुनिक इतिहास की सबसे भीषण गर्मी की चपेट में है। यह केवल एक मौसमी आपदा नहीं, बल्कि उस पश्चिमी विकास मॉडल की ऐतिहासिक परीक्षा है जिसने दशकों तक स्वयं को पर्यावरण संरक्षण का वैश्विक आदर्श और शेष विश्व का मार्गदर्शक घोषित किया। जिस सभ्यता ने औद्योगिक विकास, कार्बन-नीतियों और जलवायु नैतिकता के नाम पर विकासशील देशों को उपदेश दिए, वही आज अपने ही नागरिकों को भीषण ताप से सुरक्षित रखने में संघर्ष करती दिखाई दे रही है। यह संकट केवल मौसम का नहीं, बल्कि उस विकास-दृष्टि का भी है जिसने प्रकृति पर विजय को प्रगति का पर्याय मान लिया।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 21 जून के बाद से यूरोप में लू से संबंधित 1,300 से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है। जर्मनी, चेक गणराज्य, डेनमार्क और स्पेन में तापमान के दशकों पुराने रिकॉर्ड टूट गए। जर्मनी के नाइसेमुंडे में तापमान 41.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया, जबकि चेक गणराज्य ने अपने इतिहास का सबसे गर्म दिन दर्ज किया। दक्षिणी स्वीडन के मालमो में भी अभूतपूर्व गर्मी दर्ज की गई। गोएटबोर्ग–बोरोस रेलमार्ग की पटरियाँ गर्मी से टेढ़ी हो गईं और बर्लिन में नागरिकों को राहत पहुँचाने के लिए पुलिस को वॉटर कैनन तक चलाने पड़े। ये दृश्य केवल एक प्राकृतिक आपदा का वर्णन नहीं करते; वे उस तकनीकी रूप से अत्यधिक विकसित व्यवस्था की सीमाओं को भी उजागर करते हैं, जो स्वयं को प्रकृति का नियंत्रक समझने लगी थी।फ्रांस की स्थिति इस विडंबना को और अधिक स्पष्ट करती है। यही वह देश है जहाँ 2015 का पेरिस जलवायु समझौता हुआ था, जिसके आधार पर विश्वभर, विशेषकर विकासशील देशों, पर कार्बन उत्सर्जन कम करने का नैतिक और राजनीतिक दबाव बनाया गया। किंतु आज उसी फ्रांस में सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के अनुसार इस लू के दौरान लगभग 1,000 अतिरिक्त मौतें दर्ज की गईं, जिनमें लगभग 85 प्रतिशत पीड़ित 65 वर्ष से अधिक आयु के थे। एक ही दिन में 1,200 से अधिक मृत्यु और एम्बुलेंस सेवाओं को 1,22,000 से अधिक आपातकालीन कॉल प्राप्त होना इस तथ्य का प्रमाण है कि जलवायु नेतृत्व का दावा करने वाला राष्ट्र अपने ही नागरिकों को इस संकट से पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे सका।

पेरिस की सड़कों पर छातों की ओट में खड़े पर्यटक और लूव्र संग्रहालय के बाहर तपती धूप से बचने का प्रयास करते लोग आधुनिक यूरोप की उस असहायता का प्रतीक बन गए, जो लंबे समय तक स्वयं को जलवायु समाधान का केंद्र मानता रहा।

इस संकट की वास्तविक जड़ को समझने के लिए केवल बढ़ते तापमान को देखना पर्याप्त नहीं है; उस सभ्यता की भौतिक संरचना और जीवन-दृष्टि को भी समझना होगा जिसने इसे जन्म दिया। यूरोप के अधिकांश नगर और भवन ऐसे समय में निर्मित हुए जब कठोर शीत ऋतु सबसे बड़ी चुनौती थी। मोटी दीवारें, भारी इन्सुलेशन, छोटी और बंद खिड़कियाँ तथा ऊष्मा को भीतर रोकने वाली निर्माण शैली उस समय की आवश्यकता थी। किंतु जलवायु परिवर्तन के वर्तमान दौर में यही संरचना अभिशाप बनती जा रही है। दिनभर सूर्य की ऊष्मा सोखने वाली इमारतें रातभर गर्म रहती हैं और यूरोप की लंबी ग्रीष्मकालीन संध्याएँ पर्याप्त शीतलता नहीं ला पातीं। परिणामस्वरूप पूरे शहर विशाल ऊष्मा-द्वीप (Urban Heat Islands) में बदल जाते हैं। यह केवल स्थापत्य की विफलता नहीं, बल्कि उस सोच की सीमा भी है जिसने हर प्राकृतिक चुनौती का समाधान केवल तकनीक, निर्माण और ऊर्जा-प्रधान अवसंरचना में खोजा। जब प्रकृति का संतुलन ही बदल गया, तब वही तकनीकी मॉडल अपने ही निर्माताओं के लिए संकट का कारण बन गया।किंतु यह केवल भवन-निर्माण की तकनीकी भूल नहीं है; यह उस व्यापक सभ्यतागत दृष्टिकोण का परिणाम है जिसने सदियों से यह मान लिया कि प्रकृति मनुष्य की असीमित इच्छाओं की पूर्ति का साधन मात्र है। इस सोच ने एक ऐसी उपभोक्तावादी संस्कृति को जन्म दिया जिसमें आवश्यकता नहीं, बल्कि निरंतर बढ़ती इच्छाएँ आर्थिक विकास का आधार बन गईं। घरों में महीनों का जमे हुए भोजन से भरे विशाल रेफ्रिजरेटर, हर मौसम में उपलब्ध हर प्रकार की वस्तुएँ, वर्षभर दुनिया के किसी भी कोने से मँगाए गए फल-सब्जियाँ, बार-बार बदलते फैशन, कुछ वर्षों में अनुपयोगी घोषित कर दिए जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, और “उपयोग करो और फेंक दो” की मानसिकता—ये सब केवल व्यक्तिगत जीवनशैली नहीं हैं; इनके पीछे एक विशाल औद्योगिक तंत्र खड़ा है।

इस जीवनशैली को बनाए रखने के लिए महाद्वीपों को जोड़ने वाली लंबी आपूर्ति-श्रृंखलाएँ (Supply Chains), चौबीसों घंटे संचालित विशाल सुपरमार्केट, लाखों शीत-भंडार (Cold Storage), निरंतर चलने वाली प्रशीतन प्रणाली, समुद्रों को पार करते मालवाहक जहाज़, डीज़ल ट्रकों के अनगिनत बेड़े, हवाई माल परिवहन, अत्यधिक पैकेजिंग, कृत्रिम संरक्षण तकनीकें और विशाल ऊर्जा-आधारित लॉजिस्टिक नेटवर्क की आवश्यकता पड़ती है। इन सभी को संचालित करने के लिए असाधारण मात्रा में ऊर्जा चाहिए, जिसके परिणामस्वरूप भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। विडंबना यह है कि जिस व्यवस्था का मूल उद्देश्य मनुष्य को आवश्यकता से कहीं अधिक सुविधा उपलब्ध कराना है, वही व्यवस्था पृथ्वी पर सबसे अधिक पर्यावरणीय दबाव उत्पन्न करती है।इसके विपरीत, भारत की सनातन जीवन-दृष्टि का आधार “अधिकतम उपभोग” नहीं, बल्कि “संयमित उपभोग” और “सहअस्तित्व” है। यहाँ प्रकृति को संसाधन नहीं, बल्कि सृष्टि के सहजीवी परिवार का अंग माना गया है। “अपरिग्रह”, “संतोष”, “यथा आवश्यक ग्रहण”, “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”, पंचमहाभूतों की उपासना, नदियों को माता, वृक्षों को देवस्वरूप और पशु-पक्षियों को जीवन-चक्र का अभिन्न अंग मानने वाली परंपरा केवल धार्मिक प्रतीक नहीं हैं; वे हजारों वर्षों से पर्यावरण संरक्षण की व्यवहारिक जीवन-पद्धति रही हैं। भारत ने प्रकृति की रक्षा कानूनों और कार्बन बाज़ारों से पहले संस्कारों के माध्यम से की।आज जब विश्व जलवायु संकट के समाधान खोज रहा है, तब उसे केवल नई तकनीकों या कार्बन-क्रेडिट व्यवस्था की ओर नहीं, बल्कि उन सभ्यताओं की ओर भी देखना चाहिए जिन्होंने सीमित संसाधनों के साथ संतुलित जीवन जीने की कला विकसित की। भारत की सनातन संस्कृति यही संदेश देती है कि पृथ्वी को बचाने का सबसे प्रभावी उपाय केवल स्वच्छ तकनीक नहीं, बल्कि संयमित जीवनशैली, सीमित उपभोग और प्रकृति के प्रति श्रद्धा है। संभव है कि भविष्य का टिकाऊ विकास किसी नई विचारधारा से नहीं, बल्कि भारत की उस प्राचीन जीवन-दृष्टि से प्रेरणा ले, जिसने सहस्राब्दियों पहले ही मनुष्य और प्रकृति के संतुलित सहअस्तित्व का मार्ग दिखा दिया था।

—धन्यवाद—

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