सरस्वती का सूर्योदय: शिव चतुर्दशी ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष संवत् 2083 पर भोजशाला को युगों बाद मिला पूर्ण सम्मान।

डॉ बालाराम

वसंत पंचमी, शुक्रवार, माघ शुक्ल पक्ष संवत् 2082 युगाब्द 5127 के दो दिन पहले, 24 जनवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने धार स्थित भोजशाला के संबंध में ऐतिहासिक निर्णय सुनाया । न्यायालय ने आदेश दिया था कि माँ वाग्देवी के प्रकट उत्सव वसंत पंचमी पर हिंदू समाज को सूर्योदय से सूर्यास्त तक भोजशाला में पूजा-अर्चना का पूर्ण अधिकार होगा। साथ ही ग़ैर-हिंदू समुदाय के लिए पृथक समय में नमाज अदा करने की व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई। इस निर्णय ने 1514 ईस्वी में हुए 1400 हिंदुओं के बलिदान को सार्थक कर दिया। 510 वर्ष बाद सत्य का पताका फहराया और असत्य को इतिहास के पन्नों में दफन कर दिया। लेकिन गैर हिंदू पक्ष ने इस पर पुनः प्रश्नचिन्ह लगा कर अनर्गल दलीलें दी और निर्णय को अमान्य करने की कुचेष्टा की। दोनों पक्षों की शेष और विषेश दलीलें सुनी और 15 मई 2026 को मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने एक बार फिर दुध का दुध और पानी का पानी कर दिया।

13वीं-14वीं सदी में मालवा पर आक्रमण शुरू हुए। 1456 में महमूद खिलजी ने धार की भोजशाला को तोड़कर मौलाना कमालुद्दीन के मकबरे और दरगाह का निर्माण कराया। निहत्थे 1400 हिंदुओं ने इसका पुरजोर विरोध किया और क्रूरता से मारे गए। तभी से माँ सरस्वती की जन्मस्थली को मुक्त कराने की कसम खाई गई। कारण यह था कि मौलाना की मृत्यु अहमदाबाद में हुई थी, पर खिलजी ने मकबरा भोजशाला में बनवाया। मालवा, यानी लक्ष्मी का निवास, अपनी भौगोलिक और सांस्कृतिक खूबियों के लिए विश्वप्रसिद्ध है। इसमें चार चांद लगाती है धार स्थित परमार कालीन भूमज शैली में निर्मित भोजशाला। स्वस्तिकाकार-ताराकृत आकार वाली यह संरचना सरस्वती मंदिर, भोज का कमरा और मध्य प्रदेश की अयोध्या कहलाती है। 11वीं सदी में निर्मित इस भवन की स्थायी शुकनासा, घंटाकृति छत और 84 नक्काशीदार चौकोर स्तंभ राजपूत शैली के साक्षी हैं।तक्षशिला और नालंदा के बाद भारत में तीसरे स्थान पर विराजमान भोजशाला प्राचीन विश्वविद्यालय थी। यहाँ 500 से अधिक विद्यार्थी अध्यात्म, राजनीति, आयुर्वेद, व्याकरण, ज्योतिष, कला, संगीत, योग, दर्शन के साथ वायुयान, जलयान और स्वचलित यंत्र जैसे विषय भी पढ़ते थे। राजा भोज स्वयं जलयान निर्माण, बांध निर्माण, भूमिगत जल-स्तर और काल गणना में पारंगत थे और शिक्षण में भाग लेते थे।

शिलालेख बताते हैं कि यह विश्व का प्रथम संस्कृत अध्ययन केंद्र था। मान्यता है कि फागुन की वसंत पंचमी को यहीं ज्ञान की देवी वाग्मिता प्रकट हुईं। इसी वरदहस्त से राजा भोज 72 कलाओं और 36 प्रकार के आयुध निर्माण में निपुण हुए।*वास्तु का वैभव* 84 स्तंभों पर टिकी भोजशाला के प्रत्येक स्तंभ पर सूक्ष्म बेल-बूटे, रथ पर सवार देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ उकेरी गई हैं। पूर्वी, दक्षिणी और उत्तरी बरामदे में 16-16 कलापूर्ण स्तंभ हैं। मुख्य द्वार पूर्व में है, जो 10 पूर्ण और दो अर्ध स्तंभों पर टिका विशाल गुंबददार है। उत्तर में बड़ा द्वार 12 स्तंभों पर और छोटा द्वार 4 स्तंभों पर बना है। पश्चिमी भाग में स्तंभों की पांच पंक्तियाँ हैं। एक स्तंभ से दूसरे स्तंभ की दूरी 6 फीट 4 इंच है। बीचों-बीच हवन कुंड और सामने माँ सरस्वती का प्रकट स्थान है। दीवारों पर संस्कृत की पट्टिकाएँ सुशोभित हैं। किवला यानी धनुषाकार मेहराब अत्यंत कलापूर्ण है। *न्याय की यात्रा: 1995 से 2026 तक* स्वतंत्रता के बाद पहला संगठित आंदोलन 1995 में हुआ। प्रशासन ने मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और शुक्रवार को मुसलमानों को नमाज की अनुमति दी। 1997 में आम प्रवेश पर रोक लगा दी गई। हिंदुओं को वर्ष में केवल वसंत पंचमी पर पूजा और मुसलमानों को प्रत्येक शुक्रवार नमाज की अनुमति मिली। इस दोहरे निर्णय के विरुद्ध न्यायालय की लड़ाई शुरू हुई। 18 फरवरी 1997 को न्यायालय ने हिंदुओं को पुनः पूजा की अनुमति दी। 2003 में उमा भारती सरकार ने लंदन म्यूजियम में रखी वाग्देवी प्रतिमा को वापस लाने की मांग उठाई और भोजशाला की पूर्ण मुक्ति तक आंदोलन का संकल्प लिया। इसी क्रम में इंदौर खंडपीठ ने भोजशाला के वैज्ञानिक सर्वेक्षण का आदेश दिया।

आज के फैसले का महत्व*

22 जनवरी 2026 के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश और 24 जनवरी 2026 को वसंत पंचमी पर उसके क्रियान्वयन ने स्पष्ट कर दिया कि भोजशाला माँ सरस्वती का प्रकट स्थल है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक अबाध पूजा का अधिकार मिलना 510 साल के संघर्ष की परिणति है। न्यायालय ने दोनों पक्षों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए संतुलन स्थापित किया है। अब मालवा की अयोध्या केवल वसंत पंचमी के दिन ऋतु उत्सव नहीं रहा, अपितु 510 वर्ष से चले आ रहे संघर्ष पर विजय उत्सव है। मालवा की अयोध्या मुक्त हुई। 1400 बलिदानियों की आत्मा को शांति मिली और माँ सरस्वती का ज्ञान-दीप फिर से अखंड जला।

जय हो विजय हो भारत माँ।

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