समाज के विघटन की आहट: नैतिक अवनति और समुदाय-आधारित समाधान।

कैलाश चंद्र।

आक्रामक समय का सचित्र: युवाओं के संकट, सामाजिक अव्यवस्था और नीति-निर्माण की चुनौती।

राष्ट्रीय विमर्श का अपहरण : घुमन्तु–विमुक्त समाज की उपेक्षा, LGBTQIA++ फंडिंग विस्फोट और FCRA Draft 2026 की नई चुनौतियाँ–कैलाश चन्द्रभूमिका :

भारत के 11 करोड़ “अदृश्य नागरिक”भारत की सामाजिक संरचना में एक ऐसा विशाल समुदाय मौजूद है, जिसकी संख्या 8 से 11 करोड़ के बीच मानी जाती है—यानी भारत का हर बारहवाँ व्यक्ति। ये हैं घुमन्तु, अर्धघुमन्तु और विमुक्त जातियाँ (DNT/NT/SNT), जिन्हें न स्थायी घर मिला, न पहचान, न नागरिक सुविधाएँ, न राजनीतिक आवाज़।हालाँकि देश तेजी से आर्थिक और सामाजिक विकास की ओर बढ़ रहा है, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र—भारत—के भीतर ही करोड़ों लोग सरकारी राडार के बाहर हैं।

इसी पृष्ठभूमि में एक और महत्वपूर्ण सच्चाई उभरती है—भारतीय विमर्श में LGBTQIA++ आधारित गतिविधियों, फंडिंग और अंतरराष्ट्रीय अभियानों का विस्फोटक विस्तार। सवाल यह नहीं कि LGBTQIA++ के अधिकारों पर काम क्यों हो रहा है। सवाल यह है कि—क्या यह प्राथमिकता भारत की वास्तविक सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप है? या क्या विदेशी फंडिंग और पश्चिमी एजेंडा भारत के विमर्श को नई दिशा दे रहे हैं?

इन्हीं प्रश्नों को यह लेख गहराई से परखता है।

भाग 1 : घुमन्तु–विमुक्त समाज — भारत का सबसे उपेक्षित तबका

1. ये लोग कौन हैं? घुमन्तु एवं अर्धघुमन्तु समुदाय परंपरागत रूप से घूमते हुए आजीविका कमाते रहे—• सपेरे • मदारी • नट • बंजारा • गाड़िया लोहार• कलंदर • बावरिया आदि। स्थायी निवास न होने के कारण ये औपनिवेशिक राजस्व ढाँचे में कभी फिट नहीं बैठे। इसके बाद 1871 में अंग्रेज़ी सरकार ने Criminal Tribes Act बनाया और इन समुदायों को “जन्मजात अपराधी” घोषित कर दिया। 1949 में कानून हट गया, लेकिन कलंक नहीं।

2. इनकी संख्या कितनी है? भारत सरकार के पास कोई औपचारिक आँकड़ा नहीं।• Renke Commission (2007) : 11 करोड़+• Idate Commission (2017) : अधूरा डेटा, कोई स्पष्ट संख्या नहीं• स्वतंत्र अनुमान : 8–11 करोड़इसका तात्पर्य —भारत में इतने लोग हैं जिनका कोई भी आधिकारिक जानकारी नहीं है।

3. समस्या क्या है?• पहचान पत्र नहीं → कोई सरकारी लाभ नहीं• स्थायी पता नहीं → स्कूल में प्रवेश कठिन• पुलिस की ऐतिहासिक निगरानी → निरंतर उत्पीड़न• स्वास्थ्य सेवाओं से दूरी• सामाजिक संस्थानों से अलगाव• विकास योजनाओं से लगभग पूर्ण अनुपस्थितिUNICEF, UNDP, अधिकांश NGO—इन पर केंद्रित कोई ठोस कार्यक्रम नहीं चलाते।

भाग 2 : दूसरी ओर — LGBTQIA++ गतिविधियों का 400% विस्फोट2015–2025 के बीच भारत में LGBTQIA++ आधारित— • वेब सीरीज़ • OTT फ़िल्में • फेस्टिवल• सेमिनार • UN–INGO अभियान • कॉर्पोरेट DEI प्रोजेक्ट • जेंडर स्टडीज़ पाठ्यक्रम—इन सबमें 400% वृद्धि दर्ज की गई।कौन पैसा दे रहा है?वैश्विक दाता नेटवर्क में प्रमुख नाम—• ओपन सोसायटी फाउंडेशन • फोर्ड फाउंडेशन • युसेड • आस्ट्रिया लेस्बियन फन्ड • वेल स्प्रिंग Philanthropic Fund• ग्लोबल इक्वलिटी फन्ड (US State Dept.)• अर्कस फाउंडेशन • हिवोस आदि।भारत में पैसा कहाँ जा रहा है?• प्राइड परेड जैसे कार्यक्रम • युथ जैंडर सेमिनार• LGBTQ-आधारित वेब-सीरीज• कॉर्पोरेट सेंसिटाइजेशन• जेंडर स्टडीज़ डिपार्टमेंट• ह्यूमन-राइट्स लिटिगेशन सपोर्ट• सोशल मीडिया इन्फ्लुएंस कैंपेनफंडिंग तुलना बेहद चौंकाने वाली है—● DNT समुदाय पर भारत में कुल वार्षिक खर्च : < ₹50 करोड़● LGBTQIA++ पर प्रत्यक्ष + अप्रत्यक्ष खर्च : ₹800–₹1200 करोड़ (अनुमान)यानी—11 करोड़ भारतीयों पर 50 करोड़ vsकुछ लाख आबादी वाले विषय पर 1000 करोड़ तकयह अनुपात किस प्राथमिकता की ओर संकेत करता है?

भाग 3 : प्राथमिकता असंतुलन क्यों?1. बाज़ार-लॉजिक (Market Incentives)LGBTQIA++ विषय मनोरंजन, फैशन, OTT, ब्रांडिंग और डिजिटल मार्केटिंग के लिए अत्यंत “लाभदायक” है।• सामग्री निर्माण • ब्रांड सक्रियता • कॉर्पोरेट विविधता—ये सब निवेशकों को सीधे मुनाफा देते हैं।वहीं— DNT समाज का upliftment किसी भी तरह बाजार को लाभ नहीं देता।

2. अंतरराष्ट्रीय दाताओं का एजेंडाविदेशी फंडिंग का झुकाव—• अधिकारों पर आधारित पहचान की राजनीति• अल्पसंख्यक लामबंदी • बहुसंख्यकवाद-विरोधी विमर्श • लैंगिक न्याय के ढाँचे—की ओर अधिक होता है।इसलिए LGBTQ विषय उनके लिए प्राकृतिक रूप से प्राथमिकता में होता है। घुमन्तु–विमुक्त समाज कभी उनकी सूची में रहा ही नहीं।

3. नीति-निर्माण में प्रभाव2020–2025 के बीच—• 80+ नीति मसौदों में gender-inclusion भाषा शामिल• अनेक विश्वविद्यालयों में जेंडर स्टडीज़ की स्थापना• Corporate DEI निर्देश 10 गुना बढ़ेलेकिनDNT/NT समुदाय एक भी नीति में प्राथमिकता सूची में नहीं आया।

भाग 4 : वैश्विक नेटवर्क और विमर्श का पुनर्निर्देशनवैश्विक विचार-नेटवर्क—• साहित्यक सम्मेलन • फिल्म समारोह• ज्ञान कुम्भ के नाम पर • सोशल मीडिया कन्कलेव • युवा आदान-प्रदान सम्मेलन—इन सबमें LGBTQIA++, उत्तर-आधुनिक पहचान और न्याय, बहुसंख्यक-विरोधी विचारधारा को केंद्रीय स्थान दिया जा रहा है।परिणाम— भारतीय विमर्श का केंद्र ग्रामीण, गरीब और उपेक्षित समुदायों से हटकर शहरी-एलीट “पहचान के” मुद्दों की ओर खिसक गया।

भाग 5 : FCRA—भारत में विदेशी प्रभाव का प्रवेश बिंदुFCRA का मूल उद्देश्य• विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग को रोकना• राजनीतिक हस्तक्षेप पर रोक• धर्मांतरण नेटवर्क की निगरानीलेकिन वास्तविक चुनौती बनी— हर वर्ष भारत में आने वाले 22,000 करोड़ रुपये की विदेशी फंडिंग का दिशा-निर्देशन।रिपोर्टें समय–समय पर इंगित करती हैं कि—• मतांतरण का नेटवर्क • पहचान-आधारित विरोध• सक्रियतावादी दबाव समूह• अकादमिक प्रभाव • नीतिगत लॉबिंग—इनके पीछे विदेशी फंडिंग की भूमिका रही है।कश्मीर से लेकर शाहीनबाग तक अनेक घटनाओं में इसकी झलक मिल चुकी है।

भाग 6 : FCRA Draft 2026 — बड़ा बदलाव, बड़ा संदेशसरकार की तरफ से प्रस्तावित नया मसौदा विदेशी फंडिंग मॉडल को कठोर बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा सकता है।A. Draft के प्रमुख उद्देश्य• पारदर्शिता • त्रैमासिक आडिट• High-risk sectors पर कठोर निगरानी• राजनैतिक हस्तक्षेप पर जीरो टालरेंस की नीति• मतांतरण-संबद्ध संस्थाएँ पर तुरंत कार्रवाई• पहचान की लामबंदी पर प्रावधानित रोकB. मसौदे की मुख्य बातें1. उच्च जोखिम वाली श्रेणियाँनया मसौदा निम्न क्षेत्रों को “सर्वाधिक जोखिमपूर्ण” घोषित करता है:-• आस्था पर आधारित संगठन • पहचान जुटाने वाले ग्रुप • LGBTQIA++ एक्टिविज़्म जिन्हें विदेशी राजनीतिक फंड मिलते हैं • मानवाधिकार मुकदमेबाज़ी करने वाले संगठन • एकेडमिक असर नेटवर्कइन पर रियल-टाइम ऑडिट ज़रूरी है।

2. बेहतर ऑडिटिंग स्टैंडर्ड• Big-4 या सरकारी पैनल द्वारा अनिवार्य बाहरी ऑडिट• संदिग्ध क्रियाकलापों पर फोरेंसिक ऑडिट• हर ₹50 लाख से ऊपर के प्रोजेक्ट की विस्तृत रिपोर्टिंग• NGO कर्मियों के विदेश प्रवास की पूर्व सूचना अनिवार्य

3. उद्देश्य-आधारित टैगिंगअब हर विदेशी फंड को पाँच श्रेणियों में टैग करना आवश्यक—• शिक्षा • स्वास्थ्य • शोध • डिज़ास्टर रिलीफ• सामाजिक न्यायइसमें आइडेंटिटी-बेस्ड प्रोजेक्ट्स पर विशेष निगरानी की जाएगी।

4. डिजिटल मॉनिटरिंग : FAMS 2.0• AI-पावर्ड पैटर्न डिटेक्शन • जियो-टैग्ड ऑडिट्स• सोशल मीडिया इन्फ्लुएंस मैपिंग• ट्रांज़ैक्शन एनोमली अलर्ट्स5. कन्वर्ज़न और कल्चरल सबवर्ज़न क्लॉज़यदि कोई NGO— • कन्वर्ज़न • पॉलिटिकल मोबिलाइज़ेशन • कल्चरल सबवर्ज़न—से जुड़ता पाया जाता है → लाइसेंस तुरंत कैंसिल।

6. विदेशी दानी दाता पात्रता• दानी दाता को अपने देश की सरकार से सर्टिफाइड होना होगा• राजनीतिक चंदे पर प्रतिबंध• क्रिप्टोकरेंसी फंडिंग पर पूर्ण प्रतिबंध• शैल फाउंडेशन पर गहन जांच7. LGBTQIA++ वित्तपोषण जाँच खंड ड्राफ्ट में यह साफ किया गया है कि— पहचान-आधारित सक्रियता जो राजनैतिक प्रभाव उत्पन्न करे, उस विदेशी निवेश को बड़ा खतरा माना जाएगा।

भाग 7 : मूल समस्या—राष्ट्रीय विमर्श का अपहरणआज भारत में स्थिति ऐसी बन गई है कि—• 11 करोड़ नागरिकों का कोई डेटा नहीं• उनके लिए कोई राष्ट्रीय कार्यक्रम नहीं• न नीति-निर्माण में जगह • न मीडिया में चर्चा• न विश्वविद्यालयों में शोध • न CSR फंडिंग• न राजनीतिक प्रतिनिधित्वलेकिन दूसरी ओर—LGBTQIA++ पर आधारित• उत्सव • अभियान • वेब सीरीज़ • पाठ्यक्रम• कारपोरेट के द्वारा कार्यक्रम • यु एन प्रायोजित सेमिनार की बाढ़—तेजी से बढ़ते चले जा रहे हैं। अर्थात विमर्श का केंद्र वास्तविक सामाजिक समस्याओं से हटकर विदेशी फंडेड एजेंडों की ओर जा रहा है।भारत को अपना विमर्श स्वयं ही निश्चित करना होगाभारत एक युवा, उभरती हुई, निर्णायक शक्ति है।परंतु यदि राष्ट्रीय विमर्श—• विदेशी निवेशक • वैश्विक परोपकारी नेटवर्क,• पश्चिमी पहचान की राजनीति • कॉर्पोरेट ब्रांडिंग—द्वारा संचालित होगा, तो वह भारत की जमीनी जरूरतों को कभी प्रतिनिधित्व नहीं करेगा।

FCRA Draft 2026 इस दिशा में सुधार का एक बड़ा कदम है, लेकिन असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि—• DNT/NT/SNT समाज • ग्रामीण गरीब• असंगठित मजदूर • सीमांत समुदाय—इन सबके मुद्दे राष्ट्रीय प्राथमिकता बनें।

जब तक भारत अपने विमर्श की बागडोर स्वयं नहीं पकड़ता, तब तक विदेशी एजेंडा भारत के वास्तविक सामाजिक प्रश्नों को पीछे धकेलता रहेगा।

__________________

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *