काले धागे और ताबीज: सुरक्षा का भ्रम या मानसिक दासता का द्वार?

*बांगरु-बाण*श्रीपाद अवधूत की कलम से *

**नोट:- आज का यह लेख समाज में फैली भ्रांतियों अंधविश्वासों के यथार्थ सत्य को उद्घाटित करने हेतु लिखा गया है। इसकी भाषा और इसके विषय से आप असहमत हो सकते हैं लेकिन इसके सार्वत्रिक सत्य को आप नकार नहीं सकते।* *

विगत दिनों प्रयागराज कुंभ में रुद्राक्ष की माला बेचने वाली मोनालिसा नामक लड़की ने एक मुस्लिम के साथ विवाह कर लिया। अभी यह बाद ठंडी भी नहीं हुई थी कि नासिक के पास सिन्नर में तथाकथित ज्योतिषी कैप्टन अशोक खरात का मामला पूरे मीडिया में छाया रहा। जिसके पास हजारों की संख्या में विशेष कर महिला भक्तों का जमघट लगा रहता था और वह उनके साथ तंत्र-मंत्र के नाम पर वह व्यभिचार करता था।* *पुलिस को अब तक एक पेन ड्राइव में 58 महिलाओं के अश्लील वीडियो प्राप्त हुए हैं। इन दोनों ही घटनाओं में पीड़ित बेटियां और महिलाएं हैं जो अंधविश्वास के नाम पर पांव में काला धागा बांधे हाथों में कलावा बांधे अपने मनोवांछित इच्छा को पूर्ण करने के लिए इन बाबा, फकीरों व मौलवियों के चक्कर में पड़ जाती हैं।

**हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ हम मंगल ग्रह पर बस्तियाँ बसाने की योजना बना रहे हैं, लेकिन विडंबना देखिए कि आज भी हमारे समाज का एक बड़ा वर्ग विशेषकर शिक्षित परिवार काले धागे, गंडे और ताबीजों के जाल में फंसा हुआ है। यह केवल एक धागा नहीं है, बल्कि अज्ञानता के कारण अंधविश्वास, हमारे टूटते मनोबल और तार्किक शून्यता का प्रतीक है।

**मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण* *भय का व्यापार**मनोविज्ञान के अनुसार, जब मनुष्य अत्याधिक असुरक्षित या भयभीत अनुभव करता है, तो वह किसी ‘बाहरी सहारे’ की तलाश करता है। इसे ‘प्लेसिबो इफेक्ट’ (Placebo Effect) कहा जाता है। व्यक्ति को लगता है कि गले में बंधा ताबीज, हाथ में बंधा कलावा या पांव में बंधा काला गंडा उसे बचा लेगा, जबकि वास्तव में वह सुरक्षा की भावना उसके अपने मस्तिष्क की उपज होती है। ठग और ढोंगी इसी मानसिक कमजोरी का लाभ उठाते हैं।**सबसे पहले समझते हैं कि प्लेसिबो इफेक्ट क्या है..??

**जब किसी व्यक्ति को ऐसी दवा या इलाज या तंत्र मंत्र लाल/काला धागा दिया जाए जिसमें कोई वास्तविक औषधीय तत्व न हो, लेकिन फिर भी वह व्यक्ति सिर्फ विश्वास के कारण स्वयं को बेहतर महसूस करने लगे, तो इसे Placebo Effect कहते हैं।”* *यह कैसे काम करता है?**हमारा मन (मस्तिष्क) शरीर पर गहरा प्रभाव डालता है। अगर व्यक्ति को विश्वास हो जाए कि यह धागा ताबीज या दवा उसे ठीक करेगी, तो मस्तिष्क खुद ही कुछ रसायन (जैसे एंडोर्फिन, डोपामिन) छोड़ता है। ये रसायन दर्द कम करते हैं, मन शांत करते हैं, और सुधार का अनुभव कराते हैं। यानी असली “दवा” “धागा या ताबीज” नहीं, बल्कि विश्वास (श्रद्धा) काम करती है।* *

उदाहरण**डॉक्टर ने आपको एक साधारण चीनी की गोली दी, और कहा कि यह दर्द कम करने की दवा है। आपने उसे खाया और सच में दर्द कम हो जाता है।* *ऐसा ही एक मिलता-जुलता उदाहरण मेरे बचपन का भी है। मेरे गांव में डॉक्टर मालवीय नाम के एक व्यक्ति आते थे। उनके पास एक काला बैग होता था जिसमें प्राथमिक उपचार के लिए कुछ गोलियां और इंजेक्शन की कुछ बोतलें होती थी। एक बार मैं तीव्र ज्वर अर्थात बुखार से पीड़ित हुआ पिताजी ने डॉक्टर साहब को बुलाया उन्होंने कुछ गोलियां दी लेकिन मेरा ज्वर कम नहीं हुआ। डॉक्टर साहब अगले दिन फिर आए उन्होंने कुछ गोलियां और बढ़ा दी फिर भी लगातार तीन दिनों तक मेरा ज्वर कम नहीं हो रहा था। तब डॉक्टर साहब ने कहा कि गुरुजी बेटे को आप देवास ले जाइए।* *

हमारे गांव में मान्यता थी की गांव वालों को कोई भी बीमारी हो तो डॉक्टर मालवीय से पिचकारी अर्थात इंजेक्शन लगा लो बीमारी ठीक हो जाती है। पिताजी ने डॉक्टर साहब से कहा “डॉक्टर साहब आप बेटे को इंजेक्शन क्यों नहीं लगाते हैं..??? पूरा गांव आपके इंजेक्शन से ठीक होता है।” तब डॉक्टर साहब ने जो कहा वह प्लेसिबो इफेक्ट को ही सिद्ध करता है। वे बोले “मैं इंजेक्शन के नाम पर लोगों को डिस्टिल्ड वॉटर और टेरामाइसिन नामक एक दवाई इंजेक्शन में भरकर के लगाता हूं।‌ लोगों की धारणा बन चुकी है कि मेरा इंजेक्शन लगते ही उनकी बीमारी ठीक हो जाएगी उनकी बीमारी मेरा इंजेक्शन नहीं उनके अंदर का विश्वास ठीक करता है लेकिन आपके बेटे को संभवत टाइफाइड है जो मेरे इस इंजेक्शन से ठीक नहीं होगा। इसलिए कृपा करके आप इसे देवास ले जाइए।”**

अब मुख्य बिंदु पर चर्चा करते हैं। सदैव ‘लव जेहाद’ या अन्य प्रकार के शोषण के मामलों में एक सामान्य कड़ी देखने को मिलती है पीड़ित युवती के शरीर पर काला धागा या ताबीज बंधा हुआ रहता है। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि उस परिवार का मनोबल कमजोर है और वे अंधश्रद्धा के शिकार हैं।* *शोषक के लिए ऐसी युवती का ‘मानसिक दोहन और शोषण’ करना आसान हो जाता है क्योंकि वह पहले से ही ‘अदृश्य शक्तियों’ के डर में जी रही होती है।

**विज्ञान बनाम अंधविश्वास**

विचार करिए- यदि मुल्ला मौलवियों द्वारा कलमा पढ़े हुए या भोंदू बाबाओ के द्वारा मंत्र पढ़ें हुए और फूंक मारे हुए धागे में कोई शक्ति होती तो बड़े अपराधी, राजनेता, अधिकारी और उद्योगपतियों के शरीर पर सैंकड़ों धागे बंधे होते। बुरी नजर, ओपरी पराई, जिन्न, भूत, पिशाच, चुड़ैल और पीर आदि केवल मानसिक भ्रम हैं।

**CCTV और तकनीक* *

दुनिया भर में करोड़ों हाई-डेफिनिशन कैमरे लगे हैं। यदि इन अदृश्य शक्तियों का कोई भौतिक अस्तित्व होता, तो वे आज तक किसी कैमरे या सेंसर में दर्ज क्यों नहीं हुईं?”

* *मुल्ला मौलवियों की दुआओं में इतना असर होता तो विचार कीजिए भारत, पाकिस्तान व बांग्लादेश के लगभग 50 करोड़ शांति दूत नेक बंदे रोज सनातन हिंदू धर्म के विनाश की विशेष कर संघ और नरेंद्र मोदी के विनाश की कामना करते हैं।*

*’गजवा ए हिंद’ की सफलता की कामना करते हैं। पूरे विश्व को हरे रंग के परचम के नीचे लाने की दुआ करते हैं। और यह दुआ जबसे इनका संप्रदाय का आरंभ हुआ तब से निरंतर जारी है। तो उनकी दुआ अब तक कबूल हो गई होती और यह सारा हिंदुस्तान शांतिदूतों का टापू बन चुका होता लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। ईश्वर की आराधना उपासना किसी दूसरे के विनाश के लिए कभी भी उपयोगी नहीं होती।

**चिकित्सा शास्त्र* *असंख्य शारीरिक बीमारियों या अवसाद (Depression) जैसे मानसिक रोगों का इलाज ‘मिया जी’ की फूंक या धागे में नहीं, बल्कि चिकित्सा विज्ञान में है। धागा बांधकर, मंत्राकर इलाज की उम्मीद करना न केवल मूर्खता है, बल्कि जानलेवा लापरवाही भी है।**ऐतिहासिक और शास्त्रीय परिप्रेक्ष्य**अथर्ववेद: मैं चिकित्सा रक्षा अर्थात भभूति या भस्म-मणि वनस्पति के औषधीय गुणों पर आधारित थी किसी मौलवी की फूँक पर नहीं।*

*स्कन्दपुराण: रक्षा-सूत्र केवल प्रेम व आशीर्वाद का प्रतीक था कोई तांत्रिक शक्ति नहीं।* *चरकसंहिता: मानसिक रोगों का उपचार योग, आहार व औषधि से होता था ताबीज या झाड़-फूँक से नहीं।**इससे सिद्ध होता है कि प्राचीन काल में ये ‘गंडे-ताबीज’ शास्त्र सम्मत नहीं थे? सत्य तो यह है कि भारतीय ऋषि-मुनियों ने ‘कर्म’ और ‘ज्ञान’ पर बल दिया था। उपनिषदों का मार्ग तर्क और अन्वेषण का मार्ग है।* *प्राचीन काल में ‘रक्षा सूत्र’ (मौली) केवल एक संकल्प का प्रतीक था, न कि किसी तांत्रिक डर का। मध्यकाल के अंधकार युग में जब समाज शिक्षा से दूर हुआ, तब इन कुरीतियों ने जड़ें जमा लीं। शास्त्रों में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि एक काला धागा आपके प्रारब्ध या कर्मफल को बदल सकता है। यह प्रथा न शास्त्र-सम्मत है, न विज्ञान-सम्मत।

**सामाजिक शोषण का मार्ग**

अक्सर घरों में नवविवाहित बहुओं या बेटियों के व्यवहार में बदलाव आने पर उन्हें मनोचिकित्सक के पास ले जाने के बजाय ‘झाड़-फूंक’ कराने ले जाया जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ से शोषण का आरंभ होता है। ‘मियां जी’ बाबाजी या तांत्रिक इसी बहाने घरों तक पहुँचते हैं और फिर शुरू होता है नकदी, गहनों की चोरी और शारीरिक-मानसिक शोषण का एक अंतहीन सिलसिला।**अब जागने का समय है। यह लेख लिखने का एकमात्र उद्देश्य समाज को आइना दिखाना है। गले, हाथ या पैर में बंधा ताबीज या काला धागा नजर-रक्षा यंत्र, विभिन्न ग्रहों के पत्थरों की या अष्टधातु की अंगूठी आपकी सुरक्षा नहीं, बल्कि आपकी बौद्धिक अज्ञानता का विज्ञापन है।**आभूषण पहनें, अंधविश्वास नहीं: यदि आर्थिक क्षमता है तो सोने-चांदी के आभूषण पहनें, लेकिन मानसिक कमजोरी के इन प्रतीकों को आज ही उतार फेंकें।आत्मबल बढ़ाएं: सबसे बड़ा रक्षा कवच आपका आत्मविश्वास और विवेक है। अपनी बेटियों को महिलाओं को ताबीज नहीं, तर्कशक्ति और साहस का हथियार दें। जिस दिन हम इन धागों को तोड़ देंगे, उस दिन हम मानसिक रूप से स्वतंत्र हो जाएंगे।

* *उपरोक्त सारा लेख पढ़ने के बाद आपके मन में यह प्रश्न उठा होगा कि हमें कोई भी धार्मिक कार्य नहीं करना है या यह सब तो पाखंड और गलत है तो ऐसा नहीं है। ईश्वर की साधना आराधना या उपासना जो हमारे मन को प्रेरित करें हमारे मनोबल को बढ़ाएं निस्वार्थ सेवा में सहयोग करें। वह सारे कार्य जिससे स्वयं का परिवार का समाज का राष्ट्र का उत्थान हो। सनातन हिंदू धर्मशास्त्रों में और परंपराओं से चली आ रही उपासना पद्धतियों का ही अनुशीलन करें। स्नान, ध्यान, संध्या, ईश्वरी-पूजा, व्रत-वैकल्य यही सब असली धर्म है। असली धर्म वही है जो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ व ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ की बात उद्घाटित करें। असली गुरु वही है जो आपको इन मानसिक दुर्बलताओं से मुक्त करें।* और अंत में यह गीत इस पूरे आलेख को अपने अंदर समेटे हुए हैं इसको गुनगुनाएं और इस पर चिंतन करें…*स्वयं अब जागकर हमको, जगाना देश है अपना..**जगाना देश है अपना, जगाना देश है अपना ॥ध्रु.॥

**हमारे देश की मिट्टी हमें प्राणों से प्यारी है**यहीं के अन्न जल वायु परम श्रद्धा हमारी है**स्वभाषा है हमें प्यारी ओ प्यारा देश है अपना

॥1॥**जगाना देश है अपना जगाना देश है अपना**समय है अब नहीं कोई गहन निद्रा में सोने का**समय है एक होने का न मतभेदों में खोने का**बढ़े बल राष्ट्र का जिससे वो करना मेल है अपना

॥2॥**जगाना देश है अपना जगाना देश है अपना**जतन हो संगठित हिंदू सक्रिय भाव भरने का**जगाने राष्ट्र की भक्ति उत्तम कार्य करने का**समुन्नत राष्ट्र हो भारत यही उद्देश्य है अपना

॥3॥**जगाना देश है अपना जगाना देश है अपना

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

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