मायके में संरक्षण को तरस रही नदियां।
रिंकेश बैरागी,
भारत नदियों का देश है, और मध्यप्रदेश नदियों का मायका, जहां बहुत सी नदियां कलकल करती बहती रहती थी, जिसे बहुत से लेखको और कवियों ने अपने शब्दों के साथ बहती नदी की सुंदरता का बखान किया। बहुत से लोगों ने बहती नदियों के पास बैठकर अनेक रचनाएं की, नदियों के पास के मैदान में बच्चों ने अनेक खेल खेले, पशुओं के लिए उचित मैदान जो बहती नदी के किनारे होते हैं। सुबह, शाम नदियों में स्नान करते लोग और दोपहर में नदी किनारे पेड़ के नीचे सुस्ताते लोग अब नहीं दिखाई देते, क्योंकि बहती नदियां अब बहते बहते चली गई और सूख गई।
मध्य प्रदेश जिसे नदियों का मायका कहा जाता है यहां लगभग 207 से अधिक छोटी बड़ी नदियां है, जिसमें मुख्यरुप से नर्मदा, क्षिप्रा, चंबल, ताप्ती, बेतवा, सोन, पार्वती, माही, कालीसिंध नदियां है। राज्य की 207 नदियां, वर्तमान में वे भी अपने घटते हुए जल स्तर का शिकार हो रही है। बहुताय जिलो में बहने वाली नदियां अब सिर्फ मौसमी नदी के रुप में ही रह गई है, बरसात में जब आकाश से बरसता पानी धरती की प्यास बुझाता है तब धीरे-धीरे इन सूखती नदियों में भी प्राण आ जाते हैं और इठलाती चाल से नदी में पानी बहना शुरु हो जाता है, किंतु नदी का यह बहाव तीन से चार माह का रहता है, उसके बाद नदी फिर से सूखती हुई प्राणहीन हो जाती हैं और सूखी नदियां अपने भीतर तपते पत्थरों के साथ अगली बारिश की प्रतिक्षा में पानी की प्यास में पल-पल तपती रहती हैं।इन नदियों की पीड़ा यहीं समाप्त नहीं होती इनकी पीड़ा अब तो और बढ़ती चली जा रही है, यह पीड़ा बढ़ते हुए अपनी काली जड़े फैला रही है, और नदी सूखते हुए पानी के साथ असहाय होकर अस्वस्थ हो गई है। नदियों का मायका मध्यप्रदेश हो या भारत देश, सभी नदियों की स्थिति एक सी होती जो रही है, प्रत्येक छोटी या बड़ी नदी में प्रदुषण और जल स्तर कम होने के लगभग एक जैसे कारण सभी के सामने दिखाई दे रहे हैं। गांव हो चाहे हो शहर सभी जगह का ड्रेनेज का गंदा पानी सीधा आकर मिलता नदी में, जिसके कारण नदियां दुषित होती जा रही है। ओद्योगिक क्षेत्र में और भी ज्यादा बूरी स्थिती बनी हुई है, वहां का केमिकल युक्त गंदा, दुषित जल फेक्ट्री से निकलकर नदी नालों में मिलकर उसे प्रदुषित कर रहे हैं, अवैध रेत उत्खनन, से भी नदियां सिमटती जा रही है, वहीं जिला स्तर पर कलेक्टर जल गंगा संवर्धन की मिटींग में उंची-उंची ढींगे हांकते हुए अपने आप की पीठ थपथपा रहे हैं। एक बुजुर्ग ने सूखी नदी के तपते पत्थरों को देखते हुए कहा कि एक समय था जब हम युवा थे और नदी का योवन पर्यावरण की सुंदरता को पल-पल निखारते हुए प्रकृति की शोभा को बढ़ाता था, अब हम भी बुढ़े हो गए और नदी भी थकी थकी हुई दिखती है न पानी है न नमी, धूप में झुलसी हुई अपने किनारो की मिट्टी की पकड़ को ढीला सा पाती है।
नदियों में गिरते जल स्तर और छोटी-छोटी नदियों के सूख जाने के कारण भूजल स्तर भी समाप्त होता जा रहा है। गर्मी के मौसम की शुरुआती दौर में ही बहुतो के बोरिंग फेल हो जाते हैं। इसी तरह पेयजल को लेकर शासन की कोई भी योजना सफलता के पायदान पर दिखाई नहीं देती है। गांव-गांव में आज भी दूर-दूर से जाकर पेयजल का पानी लेकर आना होता है। वहीं इन छोटी नदियों के सूख जाने से किसानों को भी बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ता है, उनके खेत जो इन नदियों से लहलहाते हैं उनको अब चिंता सताने लगी है। किसान इसी दुख के कारण घर छोड़ पलायन के रास्ते जाने को विवश है। शासन प्रशासन ने इसे कमाई का जरिया बना कर रखा है हर वर्ष कुछ न कुछ काम के बहाने योजना के माध्यम से नदियों के उद्धार के लिए पैसा निकालते हैं और फिर न योजना फलीभूत होती है न ही नदियों का उद्धार होता है, होता है तो बस नेताओं की सम्पत्ती में वृद्धी। शहरो की गंदगी को ढोते हुए कई नदियों ने नाले का रुप ले लिया है। पहले ऐसा क्या था जो नदियां हमारी बहती रहती थी, फिर धीरे-धीरे इन नदियों के पानी को कैसे समाप्त कर दिया गया। इस समस्या को समझना जरुरी है अन्यथा सूखी नदियां आने वाले भविष्य में एक विमर्श खड़ा कर देगी। भावी पीढ़ी सिर्फ इतना ही समझेगी कि इन छोटी नदियों में पानी सिर्फ बारिश के मौसम में दिखाई देता है।
मायके में नदियां विलुप्त हो रही है और सरकार ने कुछ 40 नदियों को चिन्हित किया है जिसे पुनर्जीवित करने के प्रयास में कदम आगे बढ़ाए है। मध्यप्रदेश सरकार के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल का कहना है कि वे दूसरी बार 109 नदियों के उद्गम स्थल पर गए है, उनको लगभग 50 नदियों के स्त्रोत सूखे मिले है। इससे पहले वे 32 नदियों के उद्गम स्थल पर गए थे जिनमें 7 नदियों में ही पानी मिला था। प्रहलाद पटेल का कहना है कि, यदि बड़ी नदियों को बारहमासी रखना है तो छोटी नदियों को भी बारहमासी रखना होगा। प्रदेश की छोटी नदियां बड़ी नदियों में ही तो जा कर मिलती है। अतः छोटी नदियों पर कार्य करने की बहुत गुंजाइश है। मध्यप्रदेश की जीवन रेखा कही जाने वाली नर्मदा नदी की सहायक नदियों में निरंतर प्रदुषण बढ़ता जा रहा है जिसका प्रभाव नर्मदा नदी में भी देखने को मिल जाता है। मध्यप्रदेश प्रदुषण बोर्ड ने महेश्वर, मंडलेश्वर, बडवानी, सनावद, बड़वाह नगरिय निकाय के अधिकारियों को नर्मदा नदी में गंदा और प्रदूषित जल सीधा छोड़ने पर अनेको बार नोटीस दिए, दूषित जल को उपचार करने की व्यवस्था करने के लिए निर्देशित किया परंतु फिर भी गंदा पानी नर्मदा में जा ही रहा है। सभी छह निकाय के विरुद्ध न्यायालय में परिवाद प्रचलित है।
बहरहाल, छोटी नदियों के प्रभावित होने से बड़ी नदियों पर प्रभाव पड़ेगा ही। बिगड़ती सूखती इन छोटी नदियों को संरक्षित करने के लिए नागरिको को जागरुक होकर नदियों के आस पास पौधारोपण कर अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए साथ ही यह भी याद रखना कि बहुत छोटी सी बात है कि नदियों को किसी भी प्रकार से दूषित नहीं करना है।