नर्मदा नदी नहीं, भारत की जीवित चेतना-रेखा व आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक उत्थान की प्रयोगशाला है…

*बांगरू-बाण* श्रीपाद अवधूत की कलम से *

भारत की नदियों में नर्मदा एकमात्र ऐसी नदी है जिसे केवल जलधारा नहीं, बल्कि सभ्यता की धड़कन माना गया। जहाँ गंगा यमुना जनसमुदाय की नदी बनी, वहीं नर्मदा संन्यासियों, ऋषियों और साधकों की नदी रही। यही कारण है कि *नर्मदा परंपरा में “पूजी” ही नहीं गई जी गई इसीलिए अमर हो गई।*नर्मदा नदी की उत्पत्ति के बारे में *पुराण कहते हैं कि यह भगवान शंकर के तपस्या से उत्पन्न पसीने से निर्मित हुई है। इसे ही विज्ञान कहता है नर्मदा भारत की सबसे प्राचीन “टेक्टॉनिक प्लेट भ्रंश रेखा” (tectonic fault line) व “नर्मदा–सोन भ्रंश रेखा” या “नर्मदा–सोन रेखिक भू-संरचना” (Narmada–Son Lineament) से उत्पन्न ऐसी नदी जिसका प्रमुख जलस्त्रोत वर्षा नहीं, बल्कि भूमिगत झरने और प्राकृतिक स्रोत है। इसे “स्रोत-पोषित नदी” या “झरना-आधारित नदी” (spring-fed river) कहते है।**“शिव का पसीना” दरअसल धरती के भीतर संचित ऊर्जा और भूजल का प्रतीक है। शिव के पसीने की कथा शब्दशः नहीं, प्रतीकात्मक (symbolic) रूपक है, जबकि सत्य भौगोलिक परिस्थितियाँ हैं।* शिव विंध्याचल पर्वतीय क्षेत्र का भू-ऊर्जा केंद्र है। शिव का तप अर्थात विंध्याचल पर्वत के दीर्घकालीन भूगर्भीय दबाव (geological stress) हैं। एवं *शिव का पसीना अर्थात विंध्याचल पर्वत के भीतर संचित जल का प्रस्फुटन (spring eruption) हैं। सामान्य भाषा में कहें तो धरती के भीतर संचित ऊर्जा और जल-भंडार का फूट पड़ना है।* *उल्टी बहने वाली अर्थात पश्चिम की ओर बहने वाली नदी और भूगर्भीय परिस्थितियाँ* भारत का भूभाग सामान्यतः पूर्व-दक्षिण की ओर ढलान लिए है, इसलिए अधिकांश नदियाँ पूर्व की ओर बहती हैं। पर नर्मदा पश्चिम की ओर बहती है क्योंकि वह “भ्रंश घाटी” या “दरार घाटी” (rift valley) में बहती है। पुराण में इसे कहा गया कि *“नर्मदा नाराज़ होकर उल्टी दिशा में बह गई।”*विज्ञान में इसे कहते हैं। *“भू-उत्थान के कारण नदी के प्रवाह की दिशा का उलट जाना” (drainage reversal due to tectonic uplift)* जब भूपर्पटी के उठने (tectonic uplift) से भूमि का ढाल बदल जाए और नदी का पुराना रास्ता अवरुद्ध हो जाए, तब नदी अपनी प्रवाह दिशा बदल ले इसे drainage reversal कहते हैं इसलिए *पुराण की भाषा में नर्मदा का “स्वभाव” भौगोलिक विज्ञान की भाषा में धरती की संरचना कारण है।**

“नर्मदा–सोन विवाह” का वैज्ञानिक अर्थ** पुराण कहता है: नर्मदा का विवाह सोन से होना था।**भूगोल कहता है: नर्मदा और सोन दोनों एक ही भूगर्भीय रेखा (lineament) से निकली हैं। एक ही भ्रंश से उत्पन्न दो नदियाँ अलग-अलग दिशाओं में बँट गईं।* इसे ही *पुराण ने कहा: “विवाह टूट गया।” सहस्रार्जुन ने अपने 1000 हाथों से नर्मदा को रोकने का प्रयास किया। इसका वैज्ञानिक अर्थ सतपुड़ा–विंध्य के बीच के अनेक पर्वत-खंड, चट्टानें, बेसाल्ट प्लेट्स जो जल के प्रवाह को अवरुद्ध करने का काम करते हैं लेकिन नदी फिर भी बह गई क्योंकि जल की दिशा मनुष्य नहीं, गुरुत्व और ढाल तय करते हैं।**नर्मदा का सोन से विवाह प्रस्ताव को ठुकराना। नर्मदा का “स्त्री-स्वतंत्रता का निर्णय” है। यह कथा सिर्फ भूगोल नहीं, सामाजिक दर्शन भी है।* जहाँ *गंगा–यमुना → पितृसत्तात्मक सत्ता का प्रतिनिधित्व करती है।**नर्मदा → स्वयं निर्णय लेने वाली स्वयं प्रेरित नदी है।**वह: विवाह से मुड़ती है। समाज की अपेक्षा तोड़ती है। अपनी राह खुद चुनती है। इसलिए: नर्मदा को केवल कन्या। नहीं,“स्वतंत्र योगिनी” कहा गया।**गंगा → सत्ता का केन्द्र रही।**नर्मदा → साधना की तपस्थली रही इसलिए नर्मदा पश्चिम की ओर बह गई क्योंकि वह “बाहर नहीं, भीतर की यात्रा” की नदी है। भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में नर्मदा से अधिक तपस्वी किसी एक नदी पर नहीं रहे।**गंगा = सबसे पूज्य मानी गई इसीलिए पूजी गई।**सरस्वती = सबसे विद्वान मनीषियों की कार्यस्थली रही इसीलिए सभ्यता की प्रेरक रही।**नर्मदा = सबसे वैरागी योगियों की तपस्थली रही इसलिए शास्त्र में कहा गया कि “गंगा मोक्ष देती है, नर्मदा मोक्ष की इच्छा ही जला देती है।” यानी नर्मदा मुक्ति नहीं देती मुक्ति का संस्कार पैदा करती है।

**विश्व की सबसे प्राचीन जैविक सभ्यता**नर्मदा घाटी में मिला नर्मदा मानव (Homo erectus) अर्थात वह मानव प्रजाति जिसने पहली बार दो पैरों पर स्थायी रूप से चलना शुरू किया। यह 3 से 5 लाख वर्ष पुराना माना गया है। यह एशिया का सबसे पुराना मानव अवशेष है। सिंधु नदी से भी पहले भारत की मानव संस्कृति नर्मदा नदी पर थी।**नर्मदा नदी साम्राज्य नहीं बनाती अपितु जीवन-पद्धति बनाती है।* नर्मदा का जल हिमनदी नहीं, अपितु भूगर्भीय जल है इसलिए उसमें सिलिका, कैल्शियम, मैग्नीशियम जैसे तत्व अधिक हैं। *जो इसे स्वयं शुद्ध करने वाली अर्थात self-purifying बनाती हैं इसीलिए आज भी नर्मदा नदी के जल का टीडीएस भारत की अन्य सभी नदियों से सबसे कम है पीने योग्य हैं।* *नर्मदा घाटी तीन जैव-क्षेत्रों का संगम है विंध्य, सतपुड़ा और दक्खन इसलिए इतनी छोटी नदी होकर भी नर्मदा में विश्वस्तर की per square km biodiversity अर्थात जैव विविधता मिलती है।* *ऋषियों की नदी**नर्मदा किनारे नगरों से अधिक आश्रम बसे है। इनमें प्रमुख रूप से वैदिक–पौराणिक काल (सबसे प्राचीन) ये वे ऋषि हैं जिनका उल्लेख वेद, ब्राह्मण, पुराण और उपनिषदों में मिलता है:-**ऋषि – नर्मदा से संबंध*कपिल मुनि-अमरकंटक क्षेत्रमार्कण्डेय ऋषि-मंडला–डिंडोरीदत्तात्रेय-महिष्मती (महेश्वर)पाराशर ऋषि-ओंकारेश्वरवशिष्ठ ऋषि-भेड़ाघाटअगस्त्य ऋषि-सतपुड़ा नारद ऋषि-नर्मदा परिक्रमा मार्गभृगु ऋषि-नर्मदा–ताप्ती क्षेत्रअत्रि ऋषि-मध्य नर्मदा घाटीजमदग्नि ऋषि-रेवा क्षेत्र शुकदेव-नर्मदा वन क्षेत्रव्यास-नर्मदा पर तपस्थली*शैव अवधूत नाथ परंपरा (मध्यकाल)**यह वह काल है जब नर्मदा विशुद्ध संन्यास की नदी बनती है।**संत/योगी-परंपरा*मत्स्येन्द्रनाथ-नाथ योगगोरखनाथ-हठयोगजालंधरनाथ-नाथ योग कान्हप्पा योगी-नाथ योग भर्तृहरि-वैराग्य योगीबाबा केनाराम-अघोरी संतभैरवानंद योगी-शैव उपासक महेश्वरानंद-अवधूत योगीराघवानंद’-वैराग्य*दत्त संप्रदाय और अवधूत परंपरा नर्मदा का सबसे विशुद्ध प्रवाह:-**संत-परंपरा*श्रीपाद श्रीवल्लभ-दत्त संप्रदाय नृसिंह सरस्वती- दत्त संप्रदाय स्वामी समर्थ-दत्त संप्रदाय वासुदेवानंद सरस्वती( टेम्बे स्वामी महाराज)-दत्त संप्रदाय श्री रंगावधूत दत्त-संप्रदाय श्रीपाद बाबा (नर्मदा बाबा)-परिक्रमा परंपरा*भारत के अन्य प्रमुख संतों का भी आश्रय किसी न किसी रूप में नर्मदा का तट रहा है*स्वामी विवेकानंद-नर्मदा यात्राश्री अरविंद-मौन साधनास्वामी ब्रह्मानंद-ओंकारेश्वरमहर्षि रमण-नर्मदा तट मौनस्वामी शिवानंद’-योगश्री बाबा कुटी’-अघोरीमाँ आनंदमयी-नर्मदा आश्रमश्री जयदेव भारती-शैव*गंगा भक्ति की नदी मानी गई है जबकि नर्मदा वैराग्य की नदी कहलाती हैं। यही कारण है कि पूरी दुनिया में किसी एक नदी पर इतने वर्षों तक इतने संन्यासी नहीं रहे जितने नर्मदा मैया के तट पर।* *नर्मदा परिक्रमा :-* परिक्रमा का मूल सिद्धांत है *बाहर घूमते हुए भीतर का केंद्र ढूँढना।* नर्मदा परिक्रमा का उद्देश्य “पुण्य” कमाना नहीं है। वह तो द्वितीयक परिणाम है।

*वास्तविक उद्देश्य मानव चेतना का पुनर्गठन कार्यक्रम है।* 3500–3600 किमी पैदल परिक्रमा करने पर *व्यक्ति का अहंकार टूटता है।**समय-बोध समाप्त होता है।**सामाजिक पहचान गिरती है।**परिक्रमा में दिन का हिसाब नहीं।**तारीख़ का महत्व नहीं।**भविष्य की चिंता नहीं।**मन काल-चक्र से बाहर आता है।**यह आधुनिक मनुष्य के लिए सबसे कठिन और सबसे उपचारक अवस्था है। मन primitive अवस्था में लौटता है। आधुनिक मनोविज्ञान में यह sensory detox**dopamine reset**ego dissolution कहलाता है।**भारतीय परंपरा में इसे “अहं का विसर्जन।” कहा गया है।* *सामाजिक समानता की दृष्टि से देखने पर नर्मदा परिक्रमा मार्ग पर राजा और भिखारी एक समान है। यहां जाति, भाषा, पद समाप्त हो जाते हैं। हर गाँव जल देता है, हर आश्रम भोजन देता है। यह दुनिया की एकमात्र जीवित समाजवादी व्यवस्था है। जो बिना सरकार, बिना कानून, केवल संस्कृति से संचालित होती है। वह भी बिना किसी भेदभाव के बिना किसी जाति प्रपंच के।*

*नर्मदा एक नदी नहीं अपितु एक जीवित दर्शन है।* *नर्मदा मैया के संदर्भ में अगर संक्षेप में कहें तो।* *भूगोल की दृष्टि से → पृथ्वी की दरार हैं।**विज्ञान की दृष्टि में → spring-fed rift river है।**जैव विज्ञान की दृष्टि में → biodiversity corridor**इतिहास की दृष्टि में → मानव विकास की धुरी हैं।* *संस्कृति की दृष्टि में → वैराग्य की प्रयोगशाला है।**मनोविज्ञान की दृष्टि में → चेतना का रीबूट सिस्टम है।**अध्यात्म की दृष्टि में → शिव का मौन विस्तार है।*और परिक्रमा करने वाला अंत में यही समझता है *“मैं नदी नहीं घूम रहा था, नदी मुझे घुमा रही थी।” इसलिए नर्मदा नदी को भारतीय परंपरा ने केवल “पवित्र” ही नहीं कहा बल्कि “अमर” भी कहा है क्योंकि पवित्र वस्तु पूजी जाती है जबकि अमर वस्तु मनुष्य को बदल देती है।* *नर्मदा परिक्रमा धार्मिक कर्म नहीं है, न ही सामाजिक प्रयोग, न हीं पर्यटन, न हीं व्रत वैकल्य बल्कि मानव चेतना का प्राचीनतम वैज्ञानिक प्रशिक्षण कार्यक्रम है। जहाँ व्यक्ति भीड़ से अलग प्रकृति के साथ स्वयं के सामने खड़ा हो जाता है और यही कारण है कि परिक्रमा के बाद कोई व्यक्ति पहले जैसा कभी नहीं रह पाता।* *आप भी इसका अनुभव लीजिए। संभव हो तो जीवन में एक बार नर्मदा परिक्रमा अवश्य करें।* *नर्मदा परिक्रमा**पुराने संस्कारों को धीरे-धीरे पिघलाती है जैसे हिम धूप में गलता है। मन का बोझ हल्का होता है। व्यक्ति “खाली” होने लगता है। नर्मदा परिक्रमा से आपका जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलता है।*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदत्तश्रीपाद कुलकर्णी (बांगर)

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