दत्त जन्मोत्सव का सप्ताह आरंभ हुआ- 4 दिसंबर गुरुवार के दिन दत्त जन्मोत्सव होगा।
*बांगरू-बाण”* श्रीपाद अवधूत की कलम से*
इसी परिप्रेक्ष्य में आज *”दत्तात्रय” “अत्रि”* और *”अनसूया”* इन तीनों शब्दों का *तात्विक मनोवैज्ञानिक एवं वैज्ञानिक विश्लेषण करेंगे।* हमारा सनातन हिंदू धर्म कितना प्रगल्भ प्रगाढ़ कितना तत्त्वनिष्ठ और अभिज्ञान से परिपूर्ण है? यहाँ नाम में भी पूरा उनका जीवन चरित्र उनकी विशेषताएँ एवं विज्ञान समाहित रहता है। दत्तात्रेय अत्रि एवं अनसूया इन नामों का जब हम विशद विश्लेषण करेंगे तो हमें पता चलेगा कि इनके नाम में ही इनका पूरा जन्म इतिहास विशेषताएँ समाहित हैं। भगवान दत्तात्रय अत्रि एवं अनसूया की अवधारणा मात्र एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि एक गहरा दार्शनिक सूत्र है। यह सूत्र मानव चेतना के उच्चतम लक्ष्य त्रिगुणों से पार जाकर (अत्रि), शुद्ध मन (अनसूया) से जुड़कर, परम ज्ञान (दत्त) को स्वयं में प्रकट करने को वैज्ञानिक और प्रतीकात्मक रूप से सिद्ध करता है। हमने जब गणपति के स्वरूप का तात्विक विवेचन किया था। तब उसमें यह बात लिखी थी कि हम जिस देवता की उपासना करते हैं तो उस उपास्य देवता के समन्वित गुण अनायास ही हमारे अन्दर भी प्रविष्ट हो जाते हैं। जो हमारे जीवन को सुखकर एवं आनंद प्रदान करते हैं। हमारे चिंतन की दिशा भी उसी प्रकार की हो जाती है। जो हमें हमारे दैनन्दिन जीवन में सहायता करती है।*दत्तात्रय नाम का भाषा वैज्ञानिक और तात्विक विश्लेषण*शब्द-संरचना दत्तात्रेय = *दत्त+आत्रेय*दत्त = √दा (दान करना) + क्त (भूतकाल प्रत्यय) → “जो पूर्णतः दिया गया हो”‘दत्त’ का शाब्दिक अर्थ है ‘दिया गया’ या ‘प्रदान किया गया’। आध्यात्मिक दृष्टि से, यह उस परम ज्ञान, आत्म-जागृति, या ब्रह्मीय(तूरिय) चेतना (ब्रह्म, विष्णु, महेश) के पूर्ण सार को दर्शाता है, जो स्वयं ही, बिना किसी शर्त के, अत्रि और अनसूया को ‘प्रदान’ हो गया। यह ज्ञान बाह्य साधना या प्रयास से प्राप्त नहीं होता, बल्कि आंतरिक पात्रता (शुद्ध मन) के कारण स्वतः प्रकट हो जाता है।
• *आत्रेय* “अत्रि + अय” (वंशसूचक प्रत्यय)।अत्रि ऋषि के वंश में उत्पन्न यह इसका सीधा भाषा वैज्ञानिक अर्थ है।”अत्रि” शब्द में “त्रि” ध्वनि बहुत अर्थपूर्ण है। त्रिमात्रा, त्रिगुण, त्रिकाल यह सब संयोग से नहीं है। ध्वन्यात्मक संस्कृत में ऐसे साम्य अक्सर जानबूझकर रखे जाते थे।’आत्रेय’ का अर्थ है ‘अत्रि के पुत्र’। यह दत्तात्रय के भौतिक वंश के स्थान पर। उनके वैचारिक और तात्विक वंश को दर्शाता है।सत्य की अभिव्यक्ति दत्त: परम सत्य या ब्रह्म ज्ञान (दत्त) की अभिव्यक्ति तभी संभव है। जब मन (अनसूया) पूरी तरह से शुद्ध हो और जिज्ञासा (अत्रि) उच्चतम बिंदु पर पहुँच चुकी हो (तीनों गुणों/कालों/अवस्था) से परे हो।
• वैज्ञानिक प्रमाण: यह ठीक उसी तरह है। जैसे किसी वैज्ञानिक आविष्कार के लिए एक शुद्ध और नियंत्रित प्रयोगशाला (अनसूया) और एक केंद्रित, समर्पित अन्वेषक (अत्रि) की आवश्यकता होती है। जब अन्वेषक पूरी तरह से समर्पित होता है और मन पूर्वाग्रहों से मुक्त होता है, तो सत्य (दत्तात्रेय) स्वतः प्रकट होता है। दत्तात्रेय नाम स्वयं में एकीकृत चेतना-मॉडल की ओर इशारा करता है।
• दत्तात्रेय = Unified Field / Singularity Concept एकीकृत क्षेत्र/समस्त-समन्वित चेतना-क्षेत्र। यह वह स्थिति है जहाँ भिन्नता समाप्त होकर सभी शक्तियाँ, सभी स्तर और सभी चेतनाएँ एक मूल तत्त्व में विलीन मानी जाती हैं।Singularity Concept:- एकत्व-बिंदु की धारणा/परम-एक बिंदु का सिद्धांत। अर्थात वह मूल केंद्र जहाँ से सृष्टि, चेतना और ज्ञान का विस्तार हुआ और जहाँ अंततः सबका लौटना है। भौतिक विज्ञान में यह “Unified Field Theory” और “Singularity” (ब्लैक होल का केंद्र / सृष्टि का आरंभिक बिंदु) के रूप में आता है। जहाँ स्थान, समय, ऊर्जा और पदार्थ एक हो जाते हैं। *[यही बात हमने जब नासदीय सूक्त का विश्लेषण किया था तब देखी थी या समझी थी]*सनातनी तात्त्विक दृष्टि में यही विचार हमारे यहाँ पहले से था । “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति” (सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक रूपों में कहते हैं)ब्रह्म — एकमेवाद्वितीयम्। (परम तत्त्व एक है, दूसरा नहीं) अर्थात Unified Field = ब्रह्म-चेतना औरSingularity = परम बिंदु / बिंदु-ब्रह्म / शून्य-बिंदु“वह अवस्था जहाँ सारी विविधता समाप्त होकर केवल एक परम, अविभाज्य और सर्वव्यापी तत्त्व रह जाता है और वही तत्त्व दत्तात्रेय है।”प्रकृति में तीन मूल शक्तियाँ (Creation, Preservation, Transformation) एकीकृत रूप में एक ही फील्ड की तरह काम करती हैं।इन्हें आधुनिक भौतिकी में Unified Field या “emergent properties” कहा जाता है।दत्तात्रेय = इन तीनों शक्तियों का एकीकृत परिणाम हैं।*”अत्रि”* और *”अनसूया”* — *भाषा विज्ञान की दृष्टि से तात्त्विक विवेचन**(क) अत्रि*• “अ-त्रि”—परंपरागत व्युत्पत्ति: त्रि = तीन गुण तीन दोष या तीन ताप तीन अवस्था।• अ-त्रि = जो त्रिदोषों, त्रितापों से रहित, जिसका चित्त शुद्ध। तात्विक अर्थ: यह अवस्था त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) से परे है, त्रि-दोषों (वात, पित्त, कफ) से परे है, और चेतना की तीन अवस्थाओं (जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति) से भी परे है।अत्रि उस वैज्ञानिक मन का प्रतीक हैं जो द्वैत (Duality) या त्रैत (Triplicity) के भ्रम को पार करके एकात्मक सत्य की खोज करता है। वह सत्य को जानने की तीव्र जिज्ञासा (तपस्या) का प्रतीक हैं। “अत्रि” में अ और त्रि का मेल चेतना की व्यापकता व त्रिगुणीय संतुलन को दर्शाता है।वैज्ञानिक दृष्टिअत्रि का मनोवैज्ञानिक रूप Equanimity Model।“समत्व (भावनात्मक-मानसिक संतुलन) का प्रतिमान/मॉडल” “और sensory-emotional fluctuations …” का अर्थ होगा। “जो व्यक्ति इंद्रियजन्य (sensory) और भावनात्मक (emotional) उतार-चढ़ावों से विचलित न हो।” इसे सरल, पारंपरिक भाषा में कहें तो जो व्यक्ति “सुख-दुःख, प्रशंसा-निंदा, लाभ-हानि और प्रिय-अप्रिय अनुभवों में भी समान भाव (समत्व) बनाए रखे।” वही व्यक्ति Equanimity Model का वास्तविक उदाहरण है। भारतीय दर्शन में यह स्थिति कहलाती है। “समदुःख-सुखं धीरं…” (गीता)अर्थात “जो व्यक्ति हर परिस्थिति में स्थिर रहता है, वही स्थितप्रज्ञ है” और वही “अत्रि-मन” को धारण करता है।*(ख) अनसूया*मूल शब्द “अन् + असूया (सूय् धातु)”—ईर्ष्या, द्वेष।इसलिए अनसूया = जिसमें ईर्ष्या का लेश नहीं। अनसूया उस शुद्ध, निर्मल मन (Pure Consciousness) का प्रतीक हैं। जो सभी विकारों और नकारात्मक भावनाओं से मुक्त है।अनसूया का अर्थ है अहंकार-मुक्त चेतना (Ego-less Consciousness)। वैज्ञानिक रूप से, किसी भी उच्च ज्ञान या खोज के लिए, मन का पूर्वाग्रह-मुक्त, ईर्ष्या-मुक्त और स्थिर होना अनिवार्य है।*मनोवैज्ञानिक महत्व* अनसूया Non-Reactive, Non-Envious Mindset” का सीधा, पारंपरिक और व्यावहारिक हिन्दी अर्थ है। “अप्रतिक्रियाशील और निरिहा (अद्वेषी / ईर्ष्या-रहित) मानसिक अवस्था।” ऐसा मन या अवस्था जो बात-बात पर तुरंत प्रतिक्रिया न करे, दूसरों की उन्नति, सुख या सम्मान देखकर जलन न महसूस करे और अपमान, तुलना या प्रतिस्पर्धा में भी संतुलन बनाए रखे।
सनातनी दृष्टि में यह स्थिति कहलाती है । “निर्द्वन्द्वः, निरस्पृहः, अद्वेषी, समबुद्धिः।” अर्थात न द्वेष, न राग, न असंतुलन केवल शांत, स्थिर और स्वाध्यायी चित्त। यह वही मानसिक अवस्था है। जो किसी तपस्वी, योगी या सच्चे साधक की पहचान होती है। जहाँ मन किसी बाहरी घटना के वश में नहीं, बल्कि स्वयं के वश में रहता है। यह वही अवस्था है जिसे आधुनिक मनोविज्ञान में secure attachment, compassion-based cognition, और selfless nurturing कहा गया है। अर्थात “विश्वास पर आधारित, करुणा से संचालित और निस्वार्थ मनोवृत्ति वाली चेतना।” जो किसी स्वस्थ व्यक्ति की नहीं, बल्कि उच्च चेतना-स्तर वाले मानव की पहचान है। दत्तात्रेय = त्रिदेवों का सम्मिश्रण भारतीय प्रतीक-विज्ञान में दत्तात्रेय त्रिदेवों की संपूर्ण ऊर्जा का समन्वय एक रूप या विज्ञान की भाषा में कहे तो मॉडल हैं। Tri-Functional Universal Modelत्रिदेव वास्तव में तीन मूलभूत ब्रह्मांडीय कार्य हैं।
त्रिदेव ऊर्जा वैज्ञानिक तुलनाएँ ब्रह्मा सृजन विष्णु पालन रुद्र/शिव संहार/परिवर्तन दत्तात्रेय = तीनों प्रक्रियाओं का एकीकृत सिस्टमइसे “Complex Adaptive Systems” की भाषा में कहें तोCreation + Preservation + Transformation = Reality’s full operational cycleदत्तात्रेय = इस पूर्ण चक्र का अधिष्ठाता देवता एवं जागरूक स्वरूप है। जो लोक कल्याण की भावना से ओतप्रोत होकर मनुष्य का कल्याण करता है। दत्तात्रेय का त्रिमुख मानव-मन के तीन विभागों का प्रतिनिधित्व करता है।सात्विक माइंड, ब्रह्म तत्व जो सृजनात्मक विचार उत्पन्न करता है।राजसिक माइंड, विष्णु तत्व यह संगठित कर्म एवं व्यवहार को प्रकट करता हैं। तामसिक माइंड शिवतत्व यह पुरानी स्मृतियों को तोड़ने का या विसर्जित करने का कार्य करता है।इस प्रकार दत्तात्रेय = व्यक्ति-मन में इन तीनों कार्यों का समन्वय रूप में Balanced Personality Architecture। अर्थात“संतुलित व्यक्तित्व संरचना”या “संतुलित व्यक्तित्व की रूपरेखा का एक स्वरूप है। यह एक ऐसा विचार है जिसमें मनुष्य के विचार (मन), विवेक (बुद्धि) और आचरण (कर्म) को संतुलन में रखने की व्यवस्था की जाती है। हमारी सनातनी परंपरा में यही विचार समत्व, मध्यम मार्ग और त्रिगुण-संतुलन (सत्व-रज-तम) के सिद्धांत में मिलता है।गीता कहती है: “युक्ताहारविहारस्य…” — यानी जो आहार, विहार, कर्म और विचार में संतुलन रखता है, वही स्थिर व्यक्तित्व का स्वामी होता है। *दत्त-तत्त्व और न्यूरोसाइंस*पुराणों में दत्तात्रेय को तीन सिर, छह हाथ दिए—यह प्रतीक है:• Multi-perspective cognition अर्थात।• बहु-दृष्टिकोणात्मक बोध / बहु-दिशात्मक सोच• अर्थात किसी भी विषय, स्थिति या समस्या को केवल एक कोण से नहीं, बल्कि कई पक्षों—भावनात्मक, तर्कपूर्ण, सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक—से देखने की क्षमता। भारतीय परंपरा में यही “सम्यक दृष्टि” कही गई है — जो ऋषियों की विशेषता मानी जाती थी।• Executive functioning + intuitive reasoning का संयोजन अर्थात नियंत्रित विवेकशील बुद्धि तथा अंतर्ज्ञान का संयुक्त प्रयोग।यहाँ Executive functioning = योजना बनाना, नियंत्रण, निर्णय, अनुशासन (बुद्धि-प्रधान कार्य) है।Intuitive reasoning = भीतर से उपजा त्वरित बोध, अनुभूति-आधारित निर्णय और इन दोनों का संयोजन वही अवस्था है। जिसे शास्त्रों में “बुद्धि + प्रज्ञा” या “तर्क+अंतर्बोध” कहा गया है। यह केवल ज्ञानी नहीं, “ज्ञानी+अनुभवी व्यक्ति” का लक्षण है।• Default Mode Network + Task Positive Network का संतुलन अर्थात अंतर्मुखी चिंतन और कार्योन्मुख जागरूकता का संतुलनDefault Mode Network = मन का भटकना, स्मृति, आत्म-चिंतन, ध्यानावस्थाTask Positive Network = वर्तमान कार्य पर केंद्रित, सक्रिय, सजग मानसिक अवस्था। इनका संतुलन वही स्थिति है जिसे योग में कहते हैं। “अन्तर्मुखता और बहिर्मुखता का समरस योग” न अधिक भटकाव, न अत्यधिक जड़ता बस सचेत, स्थिर और केंद्रित चित्त।ये तीनों पहलू मिलकर बनाते हैं —“संतुलित, जाग्रत और समन्वित चित्त-व्यवस्था”जो किसी भी साधक, विचारक या नेतृत्वकर्ता की वास्तविक शक्ति होती है। अर्थात दत्त-ऊर्जा मस्तिष्क के तीन स्तरों का सामंजस्य है। *सांस्कृतिक महत्व*• दत्त महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र, गुजरात—सभी में स्थानीय लोकदेवता और योगी के रूप में पूजे जाते हैं।• उनका चरित्र “सदा विचरण करने वाले अवधूत ” के रूप में आया है। यह प्राचीन भारतीय यायावरी या घुमक्कड़ी परंपरा का प्रतीक है।• दत्त संप्रदाय ने अद्वैत वेदांत और नाथ-योग—दोनों परंपराओं का सेतु बनाया।• ग्रामीण भारत में दत्त = विपत्ति में मार्गदर्शक गुरु एक सामूहिक सांस्कृतिक सुरक्षा-भाव का प्रतीक है। भगवान दत्तात्रेय को हिंदू धर्म में योग के अधिष्ठाता देव सनातनी परंपरा में जितने भी अखाड़े हैं उन सब अखाड़ों के उपास्य देवता और एक आदर्श संन्यासी (पैराडाइगमेटिक संन्यासी) के रूप में पूजा जाता है । उनका स्वरूप पारंपरिक रूप से त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु, और शिव—के संयुक्त अवतार के रूप में माना जाता है, जिन्हें सामूहिक रूप से त्रिमूर्ति कहा जाता है । तथापि, धार्मिक ग्रंथों, विशेष रूप से भागवत पुराण, मार्कण्डेय पुराण, और ब्रह्माण्ड पुराण में, उन्हें केवल त्रिदेवों का सम्मिश्रण न मानते हुए परब्रह्म या परम सत्ता जो सभी गुणों से परे है की अभिव्यक्ति (Manifestation) के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है । यह वैचारिक उन्नति दत्तात्रेय को किसी एक विशिष्ट कार्य (जैसे संरक्षण या सृजन) से मुक्त करके उन्हें अस्तित्व के शाश्वत, एकीकृत सिद्धांत के रूप में स्थापित करती है। *दत्तात्रेय का तात्विक व वैज्ञानिक विश्लेषण हमें सिखाता है कि परम सत्य बाहर कहीं नहीं है, बल्कि वह चेतना की उस अवस्था में है। जहाँ त्रिगुणात्मक संसार की क्रियाएं पूर्णतया संतुलित हो जाती हैं, और जहां द्वैत की सभी धारणाएं शांत हो जाती हैं। यही गुण-साम्यावस्था है, जो दत्तात्रेय के माध्यम से ‘दी’ गई है।*
अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त