” कांग्रेस नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल से लेकर राहुल गांधी की बल्लेबाजी तक”
डॉ. बालाराम परमार ‘हॅंसमुख’
बिहार राज्य विधानसभा परिणामों के बाद, लोगों के मन में यह सवाल है कि कांग्रेस की विरासत को लगातार राहुल गांधी के नेतृत्व कैसे परखें हैं? जवाहरलाल नेहरू ने 1947 में भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली, तो उन्होंने एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक राष्ट्र की नींव रखी, जो तीन दशकों तक राजनीतिक परिदृश्य पर हावी रहा। उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने पहले तीन आम चुनाव (1951‑57‑62) में जीत हासिल की और अधिकांश राज्यों में शासन किया और संस्थानों और विदेश नीति को आकार दिया।
दशकों बाद वह पार्टी जो कभी अजेय लगती थी, अब एक टूटे‑फूटे दल में बदल गई है। 2024 के आम चुनाव में कांग्रेस ने केवल 99 सीटें जीतीं, जो आधिकारिक विपक्ष की भूमिका के लिये भी मुश्किल से पर्याप्त थीं। राज्य विधानसभाओं में उसकी उपस्थिति अब कुछ ही विधायकों तक सीमित हो गई है। पंजाब में एक भी कांग्रेस विधायक नहीं बचा, बिहार में छह और उत्तर प्रदेश में केवल दो।यह गिरावट हाल की नहीं है; यह एक दीर्घकालिक क्षरण को दर्शाती है जो आपातकाल के बाद शुरू हुआ। नब्बे के दशक में संख्या बल कम होने से केन्द्र और राज्य में गठबंधन युग में तेज़ी आई और 2014, 2019 और 2024 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय पटल पर कब्ज़ा करने से और तीव्र हो गया। कांग्रेस के नेतृत्व में महागठबंधन में अंधे- बहरे, कांणे- गुंगे, लगंडे – लुले सभी क्षेत्रीय दल केन्द्र और राज्यों में सरकार बनाने की गर्जन से एक होने का दिखावा करने लगे हैं।इस तिकड़मी राजनीतिक बिसात में नेहरू-गांधी परिवार के राजकुमार -राजकुमारी बल्लेबाजी चुनाव दर चुनाव एनडीए गठबंधन द्वारा रन आउट होती जा रही है!
राहुल गांधी, नेहरू‑गांधी वंश के उत्तराधिकारी, ने कांग्रेस के भाग्य को पुनर्जीवित करने के लिये भारत जोड़ो यात्रा और भारत जोड़ो न्याय यात्रा जैसे उच्च‑प्रोफ़ाइल अभियानों की कोशिश की। जबकि ये यात्राएँ पार्टी को ग्रासरूट मतदाताओं से जोड़ने और एकता का संदेश देने के लिये थीं,श। लेकिन अक्सर दोहराव वाले स्लोगनों – “चौकीदार चोर है”, “संविधान खतरे में है”, “वोट चोरी हो रही है” ने यात्रा के महत्व को घटा दिया , क्योंकि तीन दशकों में मतदाताओं ने पाया कि ताज़ा विचारों की कमी है। वही रटे‑रटाए भाषण बिना संगठनात्मक नवीनीकरण की ठोस योजना के दोहराए जाते हैं। राहुल गांधी की शीर्ष संस्थानों – चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट पर लगातार हमले, शासन के जरूरी मुद्दों से ध्यान हटाते हैं। वह वरिष्ठ पार्टी कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया को शायद ही अपनाते हैं, जिससे यह धारणा बनती है कि वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व भारत भाग्य विधाता की सोच से कौसौ दूर है। लंबे समय से कांग्रेस के अनुभवी कार्यकर्ता अक्सर खुद को हाशिए पर महसूस करते हैं, उन्हें उनके दशकों के योगदान के लिये बहुत कम सम्मान मिलता है। यही कारण है कि शरद पवार, पी संगमा, ममता बनर्जी, हिमंत बिश्व शर्मा और ग़ुलाम नबी आजाद जैसे पुराने सिपाहसालार पार्टी छोड़ते चले गए।जिसकी तब और अब के नेतृत्व ने तनिक भी परवाह नहीं की।
इस बेपरवाह लापरवाही ने कांग्रेस को “स्विंग” खोजने के कागार पर ला खड़ा कर दिया।संघर्ष करने पर मजबूर कर दिया है। बिहार में कांग्रेस की महागठबंधन में एक कनिष्ठ भागीदार बन गई है। जनता इसे सोनिया राहुल और प्रियंका गांधी की नासमझी और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार करने का प्रतिफल मानतीं है। राष्ट्रीय जनता दल द्वारा हाशिए पर ला खड़ी कर दी है। उत्तर प्रदेश में दो विधायकों की संख्या गांधी परिवार की सोच की स्वीकार्यता को हाशिए की स्थिति का स्पष्ट संकेत है।भले ही पार्टी संघर्ष कर रही हो, नेहरू, इंदिरा और राजीव की विरासत सार्वजनिक विमर्श में फिर से प्रश्न चिन्ह लगाती है। हाल ही में राहुल गांधी द्वारा शुरू किए गए जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की राजनीतिक अदूरदर्शिता ने राष्ट्र को याद दिलाया कि नेहरू गांधी परिवार का वर्तमान नेतृत्व “भारत की लोकतांत्रिक यात्रा को समझने की एक के बाद एक गलतियां कर रहा है। जो कभी निरपेक्षता और धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर थे, अब चुनावी प्रक्रिया SIR में कार्यरत कर्मचारियों पर “थोपे गए अत्याचार” के आरोप लगाकर तृणमूल , समाजवादी डीएमके , गुपकार गठबंधन जैसे क्षेत्रीय दलों के साथ कानूनी मामले के लिए दलीलों की सूची का बचाव करते हुए दिखते हैं । यह प्रवृत्ति और तीन दशक के आँकड़े गांधी परिवार की एक व्यापक आत्मघाती प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। कांग्रेस अब हिन्दी‑ हृदयस्थल राज्यों के साथ साथ पंजाब उत्तर‑पूर्व और दक्षिण में वह प्रमुख शक्ति नहीं रही, जहाँ वह कभी अनचैलेंज्ड शासन करती थी।
आगे की ओर देखनाकांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व “INDIA गठबंधन” को पुनर्निर्माण करने की कोशिश कर रहा है। आगामी संसद के शीतकालीन सत्र से पहले यह दिखावा किया जाएगा कि यह India गठबंधन चुनावी झटकों के बावजूद एकजुट रहेगा। महागठबंधन गठबंधन आगामी चुनावों में संख्याबल बढ़ाने के लाभ में बदल पाएगा, यह अभी अनिश्चित है।
राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता – नेहरू, इंदिरा और राजीव के बहुलवादी लोकतंत्र के दृष्टिकोण से लेकर हाल के चुनावों की गलतियों तक – सीखने में निहित है, जो यह निर्धारित करेगा कि बल्लेबाजी फिर से अपनी स्विंग हासिल कर पाएगा या नही?आम जनता यह मानती हैं कि कांग्रेस को अपने भाग्य को पुनर्जीवित करने के लिये इतिहास से सबसे महत्वपूर्ण सबक लेना चाहिए?_क्या गांधी परिवार के पास कोई विशेष विकासात्मक रणनीति है जो पार्टी के लिये लहर बदल सकती है? इसके अभाव में राहुल गांधी की छत्रछाया में महागठबंधन केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों की शक्ति, समय और धन की बरबादी के अलावा कुछ नहीं है।