नियमित के लिए कार्यभार नहीं जबकि अतिथि विद्वान के लिए कार्यभार की बाध्यता

प्राचार्य की इच्छा पर खुल रहें हैं रिक्त पद ” लॉ में एक भी एडमिशन नहीं फिर भी नवीन पदस्थापना ‘प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग के दोहरे रवैये से शासकीय अतिथि विद्वान फॉलेन आउट की पीड़ा से उभर नहीं पा रहें हैं। जबकि सहायक प्राध्यापक पद के समस्त दायित्वों का निर्वहन अतिथि विद्वान बखूबी निभाते आए हैं। 21 नवंबर को सहायक प्राध्यापक भर्ती 2022 से चयनित 28 उम्मीदवारों को लॉ विषय में पदस्थापना दी गई है। जिसमें पीएम कॉलेज झाबुआ सहित अन्य कॉलेजों में वहां भी नवीन नियुक्तियां दी गई है, जहां पर एक भी बच्चे का एडमिशन वर्तमान शैक्षणिक सत्र में नहीं हुआ है। इससे पूर्व हुए ट्रांसफर में भी ऐसा ही हुआ था। परंतु अतिथि विद्वान के मामले में शासकीय आदर्श महाविद्यालय झाबुआ में इतिहास विषय में 629 बच्चें अध्ययनरत होने पर भी प्राचार्य ने एक रिक्त पद को कार्यभार की आड़ में नहीं खोला है। जबकि कार्यभार का नियम यूजीसी नियमानुसार अतिथि विद्वान और नियमित के लिए एक समान है। अतिथि विद्वान को एक दिन के दो हजार व माह में अधिकतम 50 हजार रुपए से अधिक मानदेय की पात्रता नहीं है। जबकि रिक्त पद पर बगैर कार्यभार होने पर नियमित पदस्थापना वाले इनसे दुगुना वेतन लेते हैं।अनेकों कॉलेजों में प्राचार्य की इच्छा पर फॉलेन आउट अतिथि विद्वानों की च्वाइस फिलिंग में पद खोलें जा रहें हैं। जिलें के नजदीकि कॉलेजों में पद नहीं खोलने से 200 से 350 किमी दूर जाना पड़ रहा है।

पिछले 25 वर्षों में अनेकों बार सरकार ने इनको नियमितीकरण के झूठें आश्वासन दिए हैं। इतना ही नहीं 11 सितंबर 2023 को इनकी मुख्यमंत्री निवास भोपाल में महापंचायत तक पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और तत्कालीन उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. मोहन यादव की मौजूदगी में हो चुकी है। फिर भी इनके भविष्य में कोई परिवर्तन नहीं आया है। नियमित भर्ती में भी 25 प्रतिशत आरक्षण का लाभ एक वर्ष अनुभवी व 20 वर्ष अनुभवी को एक समान दिया गया है। अधेड़ उम्र होने से इनका भविष्य अंधकारमय है। अगर सरकार लगातार इन्हें फॉलेन आउट करती रही तो यह आर्थिक व मानसिक तनाव झेलने के लिए मजबूर हो जाएंगे।मध्य प्रदेश अतिथि विद्वान नियमितीकरण संघर्ष मोर्चा के प्रदेश मीडिया प्रभारी शंकरलाल खरवाडिया ने इस संबंध में बताया है कि अतिथि विद्वानों के संदर्भ में उच्च शिक्षा विभाग के अफसर प्राचार्य के माध्यम से कार्यभार देखते हैं। जबकि नियमित की नियुक्ति व ट्रांसफर विद्याथिर्यों की संख्या नगण्य होने पर भी कर देते हैं। यह न्यायसंगत नहीं है।