मध्य प्रदेश में सरकारी स्कूल बंद होने के पीछे कारण एवं निदान
डॉ बालाराम परमार ‘हॅंसमुख’
वर्ष 2014-15 से 2023-24 तक के बीते एक दशक में सरकारी स्कूलों की संख्या में 8% की कमी हुई है। जुलाई 2025 का महीना खत्म होते होते मध्य प्रदेश में सेंकड़ों सरकारी विद्यालय बंद हो गए हैं।विद्यालय बंद होने के पक्ष और विरोध में राजनीतिक दोषारोपण अपनी जगह है, लेकिन वर्षों से चलते आ रहे विद्यालय का बंद होना सरासर संविधान में वर्णित अधिकारों और राज्य नीति निर्देशक तत्वों के अनदेखी है।
मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को बद से बद्तर करने में दोषी कौन है ? यह सिद्ध करना थोड़ा कठिन है क्योंकि शिक्षा व्यवस्था की अनदेखी पिछले तीन दशकों से होती आ रही है। इसके लिए मध्य प्रदेश में शासन करने वाले दोनों ही दल कांग्रेस और भाजपा बराबर के दोषी है?कारण खोजने पर ज्ञात होता है कि
1. मध्य प्रदेश में पिछले एक दशक में 23 लाख से अधिक छात्रों ने स्कूल छोड़ दिया है, जिससे सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या में काफी कमी आई है।
2. वर्ष 2023-24 और 2024-25 में 5500 से अधिक सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां पहली कक्षा में एक भी प्रवेश नहीं हुआ है।
3. सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, जिससे छात्रों को उचित शिक्षा नहीं मिल पा रही है। लगभग 80 हजार अतिथि शिक्षकों को पढ़ाने के लिए लगाया गया है, लेकिन उनके पास पर्याप्त अनुभव और प्रशिक्षण नहीं है।
4. शैक्षिक असुविधा के चलते अभिभावक अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना पसंद करते हैं, जहां उन्हें बेहतर शिक्षा और सुविधाएं मिलती हैं। सरकारी स्कूलों में इंग्लिश विषय और मीडियम के शिक्षकों की कमी है और अधिकांश शिक्षक मध्यान्ह भोजन जैसी सुविधाओं में जुटे रहने के कारण पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाते हैं।
5. मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं , यथा बिजली, पानी, पुस्तकालय और शौचालय का अभाव है। इन असुविधाओं के चलते छात्रों को पढ़ाई करने दौरान अनेक शारीरिक एवं मानसिक परेशानी होती है। फलत: अभिभावकों का विश्वास सरकारी स्कूलों पर से उठ गया है।
6. मध्य प्रदेश सरकार की गलत नीतियों और निर्णयों का सरकारी स्कूलों के बंद होने पर प्रभाव पड़ा है, जिसमें स्कूलों के मर्जर और बंद करने के निर्णय सबसे बड़ा कारण है।
7. विद्यालय बंद होने में पुराने शिक्षकों का हाथ होने के कारण को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। पुराने शिक्षकों की शिक्षण पद्धति समय के साथ तालमेल नहीं रख पा रही है, जिससे कक्षा शिक्षण की ओर छात्रों को आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं।
8. पुराने शिक्षकों को नई तकनीकों और शिक्षण विधियों के बारे में जानकारी नहीं है और वे अधतन होना भी नहीं चाहते हैं? जिससे वे छात्रों को आधुनिक तरीके से शिक्षा देने में पूर्णतया असमर्थ हैं।
9. सेवाकालीन शिक्षकों को प्रशिक्षण देने का ढर्रा बहुत पुराना है। पुराने शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप नियमित प्रशिक्षण और विकास के अवसर नहीं मिल पा रहे हैं? जिससे वे अपने शिक्षण कौशल में सुधार नहीं कर पा रहे हैं।
10. मेरे व्यक्तिगत शोध में पाया गया है कि 30% पुराने शिक्षकों का वर्तमान सरकार के निर्णय के प्रति दृष्टिकोण नकारात्मक है, जिससे वे छात्रों और अभिभावकों के साथ प्रभावी ढंग से संवाद नहीं कर पा रहे हैं।
11. प्रदेश में घटिया राजनीति शासकीय शिक्षा प्रणाली में सुधार की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है। घटिया राजनीति के कारण, शिक्षकों की नियुक्ति और पदोन्नति योग्यता के बजाय राजनीतिक संबंधों और पैरवी के आधार पर हो रही है।
12. घटिया राजनीति के कारण, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में बदलाव राजनीतिक लाभ के लिए किया जा है, न कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए। शिक्षा बजट का दुरुपयोग हो रहा है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। घटिया राजनीति के कारण, पुराने शिक्षक पुरानी कांग्रेस सरकार तथा नवीन शिक्षक नयी भाजपा नीत सरकार की राजनीतिक गतिविधियों में संलिप्त होने के लिए प्रोत्साहित हो रहे हैं, जिससे उनकी प्राथमिकता शिक्षा से हटकर बिचौलियों और नेताओं के आगे पीछे घुमने होती है। फलत: शिक्षा प्रणाली में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
रोना रोते रहने से प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार होने वाला नहीं है। राजनीति से परे समाधान निकलने पर व्यापक विचार विमर्श भी जरूरी है।
1. शिक्षा नीतियों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करने से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है। शिक्षकों की नियुक्ति और पदोन्नति में पारदर्शिता लाना चाहिए।
2. शिक्षा बजट का उचित उपयोग से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है।
3. शिक्षकों को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखने से उनकी प्राथमिकता शिक्षा पर केंद्रित हो सकती है।
4. शिक्षाविदों एवं आलोचकों का मानना है कि आज की शिक्षा व्यवस्था में बदहाली के बीज दिग्विजय सिंह सरकार ने ही बो दिए गए थे! उनके कार्यकाल के दौरान संविदा आधार पर शिक्षा कर्मियों नियुक्ति प्रथा ने ही शिक्षा प्रणाली और समग्र विकास पर नकारात्मक प्रभाव डाला है। शिक्षा के क्षेत्र में बदहाली और विद्यालयों का बंद होना तो बदस्तूर जारी रहेगा। प्रदेश की जनता को सोचना है कि शिक्षा के क्षेत्र में उन्हें किस स्तर पर पहुंचना है? बच्चों का भविष्य सरकारी विद्यालय में सुरक्षित है अथवा प्राइवेट स्कूलों में? सरकारी विद्यालय 8% की दर से बंद हो रहे हैं और प्राइवेट स्कूल 15% की दर से खुल रहे हैं?
अतः पंचायत, नगर निगम, नगर पालिका, विधानसभा और लोकसभा के चुनाव के समय जनता को तय करना है कि उनके नव निहाल का भविष्य किसके हाथों में है, क्योंकि प्रदेश में जो कुछ भी हो रहा है, वह जनता के द्वारा चुनी गई सरकार के द्वारा ही हो रहा है! आगे प्रदेश के लिए जो कुछ होगा वह भी जनता के प्रतिनिधियों द्वारा ही होगा। इसलिए जनता अपने सरोकार से मुकर नहीं सकती है?