सोशल मीडिया पर वायरल कहानी की सत्यता के कोई प्रमाण नहीं।

*बांगरू-बाण* श्रीपाद अवधूत की कलम से*

सोशल मीडिया पर एक कहानी बहुत वायरल हो रही है। इस कहानी की सत्यता के कोई प्रमाण तो नहीं हैं, लेकिन यह कहानी जिस विषय को लेकर के वायरल है। वह आज के चिकित्सा विज्ञान के लिए एक पहेली के रूप में देखा जा रहा है। मनुष्य का मस्तिष्क केवल एक जैविक मशीन नहीं है। वह एक संबंध-आधारित चेतना प्रणाली है और इस प्रकार की घटना का हमारे वेदों में और पौराणिक कहानियों में उल्लेख मिलता है। आज हम इस कहानी के माध्यम से मानवीय चेतना का आज के आधुनिक चिकित्सा विज्ञान एवं भारतीय दर्शन के वेद और पुराणों में वर्णित कहानियों के आधार पर विश्लेषण करेंगे।**वायरल कहानी 👇👇*चीन में एक आठ साल का बच्चा, चुक्सी, 55 दिनों से कोमा में पड़ा था। डॉक्टरों ने लगभग उम्मीद छोड़ दी थी। आधुनिक चिकित्सा, मशीनें, दवाइयाँ सब कुछ चल रहा था, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं। स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं लेकिन मां के मन ने हार न मानी।डॉक्टरों की सलाह पर उसने एक मानवीय प्रयोग करना आरम्भ किया। उसने चुक्सी को वही आवाज़ें सुनानी शुरू कीं जिन्हें वह पहचानता था। स्कूल की सुबह की धुन, क्लास का रूटीन, दोस्तों की आवाज़ें। फिर उसके दोस्तों ने वीडियो रिकॉर्ड किए। कोई कह रहा था, “चुक्सी उठ जा”, कोई कह रहा था, “हम तुम्हें मिस करते हैं।” और वहीं से चुक्सी की वापसी आरम्भ हुई। पहले पलक हिली। फिर हल्की सी मुस्कान आई। और जिस दिन दोस्त मिलने आए, उसी दिन एक दोस्त ने मज़ाक में कह दिया ऐसे ही लेटे रहो होमवर्क से बच जाओगे। उसी पल चुक्सी हँस पड़ा। वही बच्चा, *जो आधुनिक चिकित्सा उपचार पद्धति करने पर भी अचेत पड़ा था चुप था, दोस्तों की आवाज़ पर लौट आया।*इसे चमत्कार कहा जाएगा, और शायद सही भी है लेकिन इससे बड़ा सच यह है कि *यह कहानी माँ के साहस और दोस्ती की ताक़त की है।* माँ का साहस तो हम समझते हैं, उसे सलाम भी करते हैं। लेकिन *दोस्ती की ताक़त को हम कितनी बार गंभीरता से याद करते हैं? ज़िंदगी में आगे बढ़ते-बढ़ते हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि दोस्त पीछे छूटते जाते हैं। हमें लगता है समय नहीं है, बात करने का मौका नहीं है।**लेकिन सच्चाई यह है कि बरसों बाद भी अगर उन दोस्तों में से किसी एक की आवाज़ आ जाए, तो पूरा दिन अच्छा बन जाता है। जैसे भीतर कहीं कुछ जाग जाता है। यह पोस्ट उन सभी दोस्तों के नाम, जिन्हें हम मिस करते हैं, जिन्हें हम वापस अपनी ज़िंदगी में चाहते हैं, और जिनकी एक आवाज़ हमें अपने अतीत अपने आप से जोड़ती है।**आइए सर्वप्रथम इस कहानी के पीछे का विज्ञान समझते हैं।* *आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इसे* *“Auditory-Evoked Arousal in Disorders of Consciousness”**अर्थात कोमा या न्यून चेतना अवस्था में रोगी में परिचित आवाज़ों से प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है।* *इसे ही रेटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम* *(RAS) = जालिकीय जागरण तंत्र कहा गया है।**सरल हिन्दी में समझे तो मस्तिष्क की वह प्रणाली जो हमें “जाग्रत”, “सचेत” और “सावधान” बनाए रखती है।**RAS मुख्यत ब्रेनस्टेम अर्थात मस्तिष्क का एक हिस्सा है। जो मेडुला, पोंस और मिडब्रेन में फैला होता है। यह कोई एक बिंदु नहीं, बल्कि तंत्रिका-जाल (reticular network) है।* *इसका मुख्य कार्य है।जागना अर्थात नींद से बाहर लाना, चेतना बनाए रखना, बेहोशी से रोकना सतर्कता बनाए रखना व बाहरी संकेतों पर प्रतिक्रिया देना होता है।* *अगर RAS काम न करे तो व्यक्ति कोमा में चला जाता है।* *उपरोक्त कहानी में, डॉक्टरों ने उसकी मां और उसके साथ पढ़ने वाले बच्चों की आवाजों को और उसके परिवेश के आसपास की आवाजों को उसे सुनाया, तब उसके मस्तिष्क में स्थित RAS सक्रिय हुआ और वह चीनी बच्चा जिसका नाम चुस्की है, कोमा से बाहर आ गया।* *इसी प्रकार की एक घटना आपके संज्ञान में होगी जो आपने संजय दत्त की फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस में भी देखी होगी, जिसमें मुन्नाभाई एक आनंद नाम के व्यक्ति को कोमा से बाहर लाता है।* *आइए अब चर्चा, वेदों और पुराणों की करते हैं। इनमें इस प्रकार की घटनाओं का वर्णन एवं उनकी चेतन शक्ति को पुनः लौटाने की बात रूपकों के माध्यम से कहानियों के माध्यम से की है।**वेद यह बताते हैं कि चेतना (चैतन्य) कब, कैसे और किन संकेतों से लौटती है।* *बृहदारण्यक उपनिषद यह स्पष्ट कहता है कि “आत्मा श्रवणेन बोध्यते।” अर्थात आत्मा श्रवण से जागृत होती है।* *इसका सीधा अर्थ यह है कि सुनने की शक्ति अंतिम रूप से नष्ट नहीं होती बल्कि चेतना का द्वार श्रवण है। यही कारण है कि मंत्रोच्चार, नाम-स्मरण व परिचित वाणी कोमा जैसी अवस्थाओं में भी प्रयुक्त होती रही हैं और उसमें सुधार भी होता है। और यह बात हमने जब “महामृत्युंजय मंत्र का विश्लेषण” किया था, तब स्पष्ट रूप से जानी थी कि दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में 20 मरीजों पर महामृत्युंजय जप को सुनाकर उनके स्वास्थ्य की कामना की गई थी और आश्चर्यजनक रूप से उसमें से 18 मरीज स्वस्थ हो गए थे।**छान्दोग्य उपनिषद यह कहता है कि**“वाक् प्राणस्य अधिष्ठानम्।” अर्थात वाणी, प्राण का आधार है। वाणी (आवाज़), प्राण (जीवन-शक्ति) चेतना तीनों परस्पर जुड़े हैं।**यह वही सिद्धांत है जो आधुनिक न्यूरोसाइंस Auditory Stimulation में कहता है।* *सावित्री–सत्यवान की यह कथा महाभारत (वनपर्व) में आती है।**सावित्री एक अत्यंत बुद्धिमान, विवेकशील और तपस्विनी स्त्री थीं। उन्होंने स्वयं सत्यवान को पति चुना था।**नारद ने पहले ही बता दिया था कि सत्यवान एक वर्ष में मृत्यु को प्राप्त होगा। नियत दिन सत्यवान वन में मूर्छित होकर गिर पड़े। यम उनका प्राण लेकर जाने लगते हैं। तब सावित्री उनका पीछा करती है।* *यमराज बार बार कहते हैं कि अब लौट जाओ यही तुम्हारा धर्म है। यही नियम है किन्तु सावित्री, धर्म, करुणा और सत्य की बातें करती हुई साथ चलती है। यमराज से संवाद करती है। यह संवाद अत्यन्त दार्शनिक है। सावित्री सीधे सीधे तो यमराज से प्राण लौटाओ नहीं कहती, किन्तु बहुत ही बुद्धिमानी से तीन वरदान के रूप में अपने पति सत्यवान की जिन्दगी मांग लेती है।* *यह केवल एक पौराणिक चमत्कारी कथा नहीं है, बल्कि सावित्री के धैर्य, बुद्धि और आध्यात्मिक शक्ति के संतुलन का प्रतीक है। सावित्री के संवाद के तर्कों से प्रसन्न होकर यमराज सत्यवान के प्राण लौटा देते हैं। यहाँ सत्यवान की प्राण की वापसी का आध्यात्मिक अर्थ यह दर्शाता है कि सावित्री अपनी वाणी की शक्ति से यमराज को भी प्रभावित कर लेती है।* *सावित्री की अटूट निष्ठा मृत्यु से भी प्राण लौटा के ले आती है। यहाँ सावित्री सजग चेतना का प्रतीक है। सत्यवान जीवन के सत्य का प्रतीक और यमराज प्रकृति के नियम का प्रतीक है। हम सरल अर्थ में अगर कहें तो “जब चेतना पूर्ण रूप से जागरूक होती है, तब जीवन का संतुलन पुनः स्थापित हो जाता है। जहाँ स्पर्श, वाणी और स्मृति साथ हों वहाँ प्राण लौटने का मार्ग खुला रहता है।”* *ऋग्वेद का 10.58 “मनः–प्राण–आह्वान सूक्त” कहा जाता है।**यह सूक्त अचेतन, भय, शोक, मूर्छा या मृत्यु-समीप अवस्था से मन और प्राण को वापस बुलाने का वैदिक मंत्र है।* *इसमें प्राण के लौटने का वर्णन है। इस सूक्त में प्राण की उस अवस्था का चित्रण किया गया है। जब मनुष्य मूर्छित होता है, मृत्यु के सन्निकट दशा में होता है। तब ऋषि प्रार्थना करते हैं कि उसका प्राण पुनः शरीर में लौट आए। यह सूक्त केवल शारीरिक जीवन की बात नहीं करता, बल्कि प्राण मन और चेतना के गहरे संबंध को भी प्रकट करता है।* *यत्ते मनो यदभिधावि दूरं**यद्वा भया᳚दभितो यत्तमसः ।**सर्वं तदत्रैव वयम् नि यामि**आ नो मनः पुनरायुषे वद ॥* (ऋग्वेद 10. 58.1) *हे मन! यदि तू भय के कारण, या अज्ञान-अंधकार में पड़कर, या दूर कहीं भाग गया हो तो हम तुझे वहीं से यहीं वापस बुलाते हैं। हे मन! तू फिर से जीवन के लिए हमारे पास लौट आ।**यत्ते मनः परि यातं पृथिव्या**अन्तरिक्षाद् दिव उत वा यदुत ।**सर्वं तदत्रैव वयम् नि यामि**आ नो मनः पुनरायुषे वद ॥* (ऋग्वेद 10.58.2।)*हे मन! यदि तू पृथ्वी पर, अंतरिक्ष में, या किसी भी लोक में भटक गया हो* *तो हम तुझे वहाँ से यहीं वापस बुलाते हैं। हे मन!* *तू फिर से जीवन के लिए हमारे पास लौट आ।**यत् ते मनः ततः …* *तत्त आ वर्तयामसी…**अर्थात तुम्हारा जो मन प्राण कहीं चला गया है उसे हम वापस बुलाते हैं।* *ऋग्वेद 10.58.2 सूक्त यह घोषित करता है कि मन भटक सकता है, पर खोता नहीं और यही वैदिक दृष्टि चीनी बालक चुस्की सावित्री और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान तीनों को एक सूत्र में जोड़ती है। यहाँ मन और प्राण का प्रयोग कई जगह पर एक दूसरे के निकट अर्थ में हुआ है।* *वैदिक दृष्टि में मन, प्राण और आत्मा जीवन से परस्पर जुड़े हुए तत्व हैं।* *प्राण के लौटने का वर्तमान चिकित्सीय अर्थ जब कोई व्यक्ति बेहोश या कोमा में मृत्यु के निकट होता है, तो वैदिक ऋषि मंत्रों के द्वारा उसकी चेतना को वापस बुलाने का प्रयास करते हैं। यह एक प्रकार की मंत्र चिकित्सा है। जो शब्द भावना और विश्वास के द्वारा जीवन शक्ति को जागृत करते हैं। यहां सावित्री की भूमिका को ऐसे समझा जा सकता है। वह रोगी के पास बैठी आशा और प्रेम की शक्ति है। यमराज, निराशा और मृत्यु की संभावना का प्रतीक है और उनसे संवाद जीवन के लिए मानसिक संघर्ष है।* *सामान्य जीवन में हम देखते हैं कि जब कोई व्यक्ति बीमार होता है, अस्पताल में भर्ती होता है। तो उसके परिचित रिश्तेदार उससे मिलने जाते हैं और उसके स्वस्थ होने की मंगलकामना करते हैं। इस प्रकार, सकारात्मक संवाद से उस रोगी की मानसिक दृढ़ता बढ़ती है और उसकी स्थिति में धीरे-धीरे सुधार होता है। वह स्वस्थ होता जाता है।* *पुराण की यह कथा हमें सिखाती है कि प्रेम बुद्धि और धैर्य जीवन में पुनर्स्थापना करते हैं। मृत्यु के सामने भी आपकी चेतना हार नहीं मानती।* *इसीलिए जो काम चिकित्सा विज्ञान नहीं कर सकता वह काम मानव की आशा और उसका विश्वास शाश्वत रूप में कर देता है।* *यही बात उस चीनी बालक के संदर्भ में भी सिद्ध होती है। मनुष्य का मस्तिष्क केवल एक जैविक मशीन नहीं है।**वह एक अंत:संबंध-आधारित चेतना प्रणाली है। जब तक “मैं किसी का हूँ” यह भाव सक्रिय न हो तब तक मस्तिष्क लौटने में हिचकता है।**कहानी यह नहीं सिखाती कि “चमत्कार हो गया” यह सिखाती है कि**स्मृति + भाव + संबंध = चेतना की वापसी का समन्वित रूप है और यही मनुष्य होने का वैज्ञानिक सत्य है।* *वेद + विज्ञान का समन्वित रूप इस प्रकार है। वेद कहते हैं कि “जहाँ प्राण को पुकार मिलती है, वहाँ चेतना लौट सकती है।” विज्ञान कहता है कि “जहाँ भाव-स्मृति सक्रिय होती है, वहाँ न्यूरल नेटवर्क पुनः जुड़ सकता है।” भाषा अलग है, सत्य वही है। और इसी सत्य को जानने की इच्छा हमें जिज्ञासु बनाती है। वेदों की तरफ मोड़ती है।

* अवधूत चिंतन श्रीगुरुदेव दत्त

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *