सभी को चाहिए परमानन्द।

संसार में कोई व्यक्ति दुखी नहीं रहना चाहता। सभी की कामना होती है कि उन्हें सुखद पलमिलते रहैं। सौभाग्य से किसी को कोई अत्यधिक खुशी आनंद की सर्वोच्च सीमा की अनभति करा सके तो यह उसके लिए ” आनंदातिरेक ” अर्थातपरमानंद पा लेने की अवस्था होगी। यह वह अवस्था होगी जिसमें व्यक्ति अत्यधिक ‘आनंद, उल्लास और संतूष्टि का अनुभव करेगा। साथ ही यह एक सकारात्मक अवस्था भी होगी जो उसके जीवन को समृद्ध और खुशहाल बनाए जाने मेंसहायक होगी। किसी चुनौतीपूर्ण लक्ष्य को प्राप्तकरने पर किसी प्रियजन के साथ समय व्यतीतकरने पर, संगीत- नृत्यकला-लेखन का आनद लेने पर अथवा ध्यान आर योग के अभ्यास अन्य संयोगों की सुलभता में भी परमानंद प्राप्तकरने की अवस्था को अनुभूत किया जा सकताहै। परमानंद संस्कृत के दो शब्दों की यति का संगम है। परमयानी उत्कृष आनंद अर्थात प्रसन्नता। इस अवस्था को पाने केलिए सबसे पहले मन की चंचलता को नियंत्रितकर आत्मनिग्रही बनना आवश्यक है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है सुख-दुख, हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश केभाव से मुक्त होकर स्वंयं में स्थापित होने की क्रिया ही परमानंददायक होती है। स्वयं में स्थापित होने अर्थात आत्मचिंतन की अवस्थां में ईश्वर की शरणागति, निःस्वार्थ सेवा और परमाथा .भाव में साधनारत मनुष्य को मिलने वाली शांति की अनुभूत ही परमानंद का शाश्वत स्त्रोत है, जो आंतरिक प्रसन्नतादायक होती है। मनुष्य ही इस परमानद ‘का सुखोपभोगी हो सकता है। ऐसा इसीलिए, क्योंकि मेरा-तेरा. मोह-माया ‘से पर अपन को विमुख रखते हुए केवल स्व पर ध्यान केंद्रित करने की अवस्था परमानंद है। यह क्रियामनुष्य के सामर्थ्य की बात होती है। इस आनंद को अपने व्यवहार का अंग बनाकर् हम सदा आनंद में रहते हुए परमानंद में लीन हो सकते हैं।

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