संत मूलक दास जी का प्रेरक प्रसंग।

*विक्रम संवत 2083,* *शालिवाहन शक 1948**’पराभव’ नाम संवत्सरारम्भ**चैत्र मास, शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा तिथि,* *गुढ़ी पाडवा**दिनांक 19, मार्च, 2026, गुरुवार,* *सनातन हिन्दू नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं….

**बांगरू-बाण* श्रीपाद अवधूत की कलम से

*”अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।**दास मलूका कहि गए, सब के दाता राम॥”* *यह दोहा आपने पहले कई बार पढ़ा होगा। इसका अर्थ भी आप सबको विदित है। ईश्वर की सर्वोच्च सत्ता के विषय में गहरी आस्था को पुष्टकर्ता यह दोहा हमने जीवन में कई बार उद्धरणों के माध्यम से प्रयोग भी किया होगा। आज इस दोहे के उत्पत्ति के संदर्भ में एक घटनाक्रम जो संत मलूकदास जी के जीवन में घटा उसे समझने का प्रयत्न करेंगे।* *महान संत मलूक दास जी के मन में एक बार एक ‘हठ’ पैदा हुआ। उन्होंने सोचा “अगर ईश्वर कण-कण में है, तो क्या वह मुझे इस निर्जन जंगल में भी ढूंढ लेगा? क्या वह मुझे बिना मांगे खिलाएगा?”

**वे एक वीरान जंगल में गए और एक ऊँचे बरगद के पेड़ पर जाकर छिप गए। शर्त ये थी “न मैं हाथ हिलाऊंगा, न मुँह खोलूंगा। देखूं तू खिलाता कैसे है…??”**संध्या हुई… भूख से शरीर टूटने लगा, पर मलूक दास जी अडिग थे। तभी अचानक कुछ ऐसा हुआ जिसने प्रकृति के पहिये घुमा दिए…! उस घने जंगल में राजा का काफिला आया, छप्पन भोग सजे, पर नियति देखिए…!!! डाकुओं के डर से वे सब खाना छोड़कर भाग निकले।

**अब नीचे भगवान का प्रसाद सजा था, पर मलूक दास जी की जिद अब भी जस की तस थी। तभी वहां ‘काल’ का दूसरा नाम यानी दुर्दांत डाकू आ धमके..!!!**मलूक दास जी बरगद की ऊँची डाल पर दुबके बैठे थे, और नीचे छप्पन भोग की महक हवाओं में तैर रही थी।**तभी झाड़ियों के पीछे से डाकुओं का एक गिरोह निकला। उनकी तलवारें चमक रही थीं। जब उन्होंने निर्जन जंगल में सोने-चाँदी के बर्तनों में सजा 56 भोग से परिपूर्ण राजसी भोजन देखा, तो वे ठिठक गए।डाकुओं के सरदार ने गरजकर कहा, “रुको! यह कोई चाल लगती है। इस वीरान जंगल में इतना राजसी भोजन और कोई इंसान नहीं? पक्का इसमें जहर मिलाया गया है ताकि हमें मारकर हमारा माल लूटा जा सके।” तभी एक डाकू की नजर ऊपर बरगद के घने पत्तों पर पड़ी। उसने चिल्लाकर कहा, “सरदार! ऊपर देखो, कोई छिपा है! जरूर इसी ने यह जाल बिछाया है।”**डाकुओं ने मलूक दास जी को नीचे उतारा। वे भूख से निढाल थे, चेहरा पीला पड़ चुका था, लेकिन आँखों में वही ‘हठ’ और ईश्वर को आजमाने की चमक थी।

**सरदार ने मलूक दास की गर्दन पर नंगी तलवार रख दी और दहाड़कर बोला। “ए ढोंगी! सच बता, इस खाने में जहर है न? तू चाहता है कि हम इसे खाएं और मर जाएं? अब देख, तू ही इस खाने को पहले खाएगा। अगर तूने मना किया, तो इसी पल तेरा सिर धड़ से अलग कर दूँगा!”**मलूक दास जी मन ही मन मुस्कुराए। उनकी शर्त थी “न हाथ हिलाऊंगा, न मुँह खोलूंगा।”**उन्होंने अपना मुँह बंद कर लिया और गर्दन झुका ली। यह देख डाकू और भड़क गए। उन्हें लगा कि मलूक दास मरने से डर रहा है क्योंकि खाने में वाकई जहर है। सरदार ने अपने दो गुर्गों को हुक्म दिया, “इसका मुँह जबरदस्ती खोलो और इसके गले के नीचे यह खाना उतारो!” अगले ही पल, दो बलवान डाकुओं ने मलूक दास जी के हाथ पकड़े, एक ने उनका जबड़ा जबरदस्ती खोला और तीसरा डाकू बड़े-बड़े ग्रास उनके मुँह में ठूंसने लगा। मलूक दास जी हिल भी नहीं रहे थे, और डाकू उन्हें ‘सजा’ देने के लिए जबरन खिला रहे थे।

**जब मलूक दास जी का पेट भर गया, तब उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े। उन्होंने ऊपर आसमान की ओर देखा और मन ही मन में कहा “वाह रे मेरे मालिक..!!! क्या गजब का इंतजाम है…??? मैं हाथ नहीं उठाना चाहता था, तो तूने डाकुओं को मेरा हाथ पकड़ने पर मजबूर कर दिया। मैं मुँह नहीं खोलना चाहता था, तो तूने मौत का डर दिखाकर मेरा मुँह खुलवा दिया। तू खिलाता भी है, और खिलाने के लिए ‘नौकर’ भी भेजता है!”**मलूक दास जी की यह हालत देखकर डाकू सहम गए। उन्हें समझ आ गया कि यह कोई अपराधी नहीं, बल्कि कोई सिद्ध महात्मा है। वे उनके चरणों में गिर पड़े।

**मलूक दास जी इसी घटना के बाद नीचे उतरे और उन्होंने वह प्रसिद्ध दोहा रचा जो आज भी अमर है।

**”अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।**दास मलूका कहि गए, सब के दाता राम॥”**

इसका अर्थ यह नहीं कि हम कर्म न करें, बल्कि यह है कि जब इंसान अपना अहंकार त्याग कर पूरी तरह उस परमात्मा पर निर्भर हो जाता है, तो पूरी सृष्टि उसे सँभालने में लग जाती है। हम अपनी मेहनत के भरोसे जरूर हैं, लेकिन वह मेहनत करने की शक्ति भी उसी ‘ऊर्जा’ से आती है। ऐतिहासिक और आध्यात्मिक शोध के आधार पर यह सिद्ध होता है कि मलूक दास जी ने यह दोहा उन लोगों के लिए कहा था जो अत्यधिक लोभ और चिंता में डूबे रहते थे।*• ​

*अजगर और पंछी का उदाहरण: अजगर भारी शरीर के कारण शिकार के पीछे भाग नहीं सकता और पंछी कल के लिए अनाज जमा नहीं करता (संचय नहीं करता)। फिर भी प्रकृति उनका पेट भरती है।*• ​

*संदेश: यहाँ संदेश “काम न करना” नहीं, बल्कि “अनावश्यक चिंता और संचय न करना” है।**उपरोक्त घटनाक्रम के बारे में इतिहासकारों में मत भिन्नता है… कुछ इतिहासकार से काल्पनिक मानते हैं, तो कुछ इतिहासकार इसके घटनाक्रम को थोड़ा अलग ढंग से प्रस्तुत करते हैं…* *ऐतिहासिक विश्लेषण:–* *कथा कितनी सच…!!!* *कितनी काल्पनिक..???* *जो बातें ऐतिहासिक रूप से सत्य हैं:–*1. *संत मलूक दास का अस्तित्व पूर्णतः सत्य संत मलूक दास का जन्म 1574 में कड़ा (प्रयागराज के निकट) में हुआ था। वे भक्ति आंदोलन के एक प्रमुख संत-कवि थे। वे मुगल काल के अत्यंत प्रसिद्ध संत थे जिन्होंने अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ जैसे मुगल शासकों का काल देखा।* 2. *दोहे की प्रामाणिकता पूर्णतः सत्य**”अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए, सब के दाता राम” यह दोहा मलूक दास जी की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना है, जो उनकी इस गहरी आस्था से उपजी थी कि राम ही सबके दाता हैं।*

*जो कथा में जो अतिरंजना है:-* 1. *”जंगल में जाकर परीक्षा लेना” मूल भाव सत्य, पर विवरण भिन्न-भिन्न यह घटना परंपरा में वर्णित है, लेकिन अलग-अलग स्रोतों में इसका रूप अलग है। एक प्रचलित कथा के अनुसार, युवावस्था में मलूक दास एक जागरण कार्यक्रम से क्रोधित हुए और उन्होंने पुजारी से कहा कि वे जंगल में जाएंगे और यदि भगवान ने उन्हें भोजन नहीं दिया तो पुजारी को मानना होगा कि वह गलत है। वे जंगल गए, पेड़ पर बैठ गए, और केवल तीन घंटे बाद एक यात्री वहाँ आया जिसने भोजन का थैला वहीं छोड़ दिया।* *इस संस्करण में न राजा का काफिला है, न छप्पन भोग, न “हाथ न हिलाने की शर्त”।

*2. *”राजा का काफिला और छप्पन भोग” संभवतः बाद में जोड़ी गई कल्पना हो सकती है। एक अन्य प्रचलित संस्करण में कहा गया है कि एक ग्रामीण जंगल से गुजर रहा था और उसने भोजन का बोझ वहीं छोड़ दिया क्योंकि उसका गाँव पास था। इसके बाद डाकुओं का गिरोह आया।* *”राजा का काफिला” और “छप्पन भोग” वाला विवरण बाद के लेखकों द्वारा कथा को और रोचक बनाने के लिए जोड़ा गया प्रतीत होता है।*

3. *”डाकुओं का जबरन खिलाना” रूपक के रूप में सत्य, घटनात्मक रूप से संदिग्ध डाकुओं का आना और मलूक दास को जबरन खिलाना यह भाग कई स्रोतों में है, परंतु “गर्दन पर तलवार रखना” और “जबड़ा जबरदस्ती खोलना” जैसे नाटकीय विवरण मौखिक परंपरा में बढ़ते-बढ़ते जुड़ते गए हैं।*

4. *कथाओं की यह प्रकृति क्यों होती है?संत-साहित्य में यह बहुत सामान्य है।* *कबीर, तुलसीदास, मीराबाई सभी के जीवन से जुड़ी अनेक कथाएं हैं जिनका मूल भाव सत्य होता है, पर विवरण कालांतर में लोककथा के रूप में विकसित होते हैं। इन्हें “hagiography” (संत-जीवनी की परंपरा) कहते हैं जो इतिहास और आस्था का अतिरंजित मिश्रण होती है।*• *भावनात्मक रूप से: यह कहानी 100% सच है क्योंकि यह ईश्वर पर अडिग विश्वास के उस स्तर को दर्शाती है जहाँ भक्त और भगवान एक हो जाते हैं।*• *यह कहानी प्रतीकात्मक है डाकू यहाँ ‘काल’ या ‘परिस्थिति’ के प्रतीक हैं जो ईश्वर की इच्छा के आगे विवश हो जाते हैं।**यह कहानी मलूक दास जी के दर्शन का सरलीकरण है, उनका वास्तविक इतिहास नहीं। लेकिन आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वालों के लिए यह ‘भरोसे’ की एक महान सीख है।*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

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