महामृत्युंजय मंत्र 3 स्तरों पर कार्य करने वाला समग्र ब्रह्मांडीय सूत्र।

जहाँ सृष्टि चेतना और मोक्ष इन तीनों को 3 स्तरों पर अर्थात् आधिदैविक आदिभौतिक और आध्यात्मिक रूप से अभिव्यक्त करता है…* पिछले लेख में हमने इसके केवल *आधिदैविक स्तर का ही विश्लेषण किया था।* आज *आदि भौतिक और आध्यात्मिक रूप से विश्लेषण करेंगे….**महामृत्युंजय मंत्र:-**ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।**उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥**शब्दशः अर्थ (Literal Meaning)*• *ॐ* : प्रणव ध्वनि, ब्रह्मांड की मूल प्रतिध्वनि।• *त्र्यम्बकम्:* त्रि (तीन) + अम्बकम् (आंखें/शक्ति)। तीन नेत्रों वाले (परम शिव)। *यजामहे:* हम श्रद्धापूर्वक पूजन/ध्यान करते हैं।*सुगन्धिम्:* दिव्य गंध से युक्त (अदृश्य उपस्थिति)।*पुष्टिवर्धनम्:* जो पोषण करता है और शक्ति बढ़ाता है।*उर्वारुकमिव:* उर्वारुक (खरबूजा) + इव (की तरह)।*बन्धनान्:* बंधनों से (बेल से)।*मृत्योः* मृत्यु से।*मुक्षीय:* हमें मुक्त करें।*मा + अमृतात्:* अमृत से नहीं (बल्कि अमृत की ओर)।*आदिभौतिक स्तर पर महामृत्युंजय मंत्र का विश्लेषण:-* यथा पिंडे तथा ब्रह्माण्डे अर्थात् जो ब्रह्माण्ड में है वही शरीर में भी है चिकित्सा विज्ञान विशेषकर आयुर्वेद में। *त्र्यंबकम:-* यहां त्र्यंबकम का अर्थ *शरीर के 3 दोष जिन्हें वात पित्त और कफ कहते हैं।* *वात शरीर को गति देता है।* *पित्त ऊर्जा का रूपान्तरण करता है और कफ स्थिरता और पोषण देता है।* *यजामहे:-* इन तीनों का *योग आहार और जीवनशैली से साम्यावस्था में बनाए रखता है। जब यह संतुलित होते हैं। तब शरीर स्वस्थ रहता है। रोग मुक्त होता।* यही *सुगंधिम* है।*पुष्टिवर्धनम्:-* जब *शरीर स्वस्थ होता है रोगमुक्त होता है तब उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी बढ़ती है।* यही *पुष्टिवर्धनम कहलाता है।* *उर्वारुकमिव:-* शरीर में करोड़ों कोशिकाएँ होती हैं जो एक निश्चित अंतराल के बाद नष्ट होती हैं और उनके स्थान पर नई कोशिकाएँ आ जाती हैं। पुरानी कोशिकाओं के मरने की इस प्रक्रिया को *एपोपासिस या प्रोग्राम सेल डेथ कहते हैं।* यह शरीर का अपना *सेल्फ़ डिस्ट्रक्ट बटन है।* यह ठीक उसी पके हुए खरबूजे के समान हैं जो आसानी से डाली से अलग हो जाता है। यही है *उर्वारुकमिव…**शरीर में कैंसर कब होता है..? जब कुछ कोशिकाएँ इस प्रोग्राम को भूल जाती हैं। वे पकने के बाद भी शरीर से अलग नहीं होती और अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती है।* तो यह मंत्र शरीर की सहज और प्राकृतिक सफाई की क्रिया के लिए एक प्रार्थना है ताकि शरीर रूपी अमृत बना रहे… *“मृत्योर्मुक्षीय”* — असमय विनाश से मुक्ति यह “मृत्यु से नहीं, असमय मृत्यु से मुक्ति” है।*आदिभौतिक स्तर पर दुर्घटना, रोगजन्य क्षय, विषाक्तता ऊर्जा-तंत्र का ध्वंस होना। मंत्र इन सबको ऊर्जा-असंतुलन (Entropy spike) मानता है और प्रार्थना करता है सिस्टम को स्थिर रखो, अचानक विघटन न होने दो।* *“मामृतात्”* — जीवन-चक्र की निरंतरता “अमृत” यहाँ स्वर्गीय अमरता नहीं, बल्कि—*जीवन-निरंतरता (Biological Continuity) होमियोस्टैसिस (Homeostasis) अर्थात् जब तक शरीर-प्रणाली संतुलित है, जीवन बना रहे।* मंत्र का संदेश रोग को ज़ोर से दबाओ नहीं, शरीर को ऐसा संतुलित करो कि वह स्वयं छोड़ दे। यही *आयुर्वेद का सिद्धांत है।* *आध्यात्मिक स्तर पर महामृत्युंजय मंत्र का विश्लेषण:-* आध्यात्मिक स्तर पर *’त्र्यम्बक’* का अर्थ शरीर की *दो आँखों से परे तीसरी आँख (आज्ञा चक्र) का जागृत होना है।* यह मंत्र प्रार्थना करता है कि हमारी विवेक शक्ति इतनी प्रबल हो जाए कि हम नश्वर शरीर के पीछे छिपी शाश्वत आत्मा को देख सकें।*यजामहे:-* आध्यात्मिक दृष्टि में यह *बाह्य कर्म नहीं, बल्कि अंतर-यज्ञ है।* अहंकार की आहुति, इच्छाओं की आहुति, भय की आहुति, देह-बोध की आहुति यही अंतर्यज्ञ है।इसका आशय है “मैं स्वयं को अर्पित करता हूँ।” यह “मैं कुछ चढ़ा रहा हूँ” नहीं, बल्कि “मैं ही चढ़ रहा हूँ” की अवस्था है। “मैं करता हूँ” से “हो रहा है” तक। साधारण भक्ति कहती है “मैं पूजा करता हूँ।” पर “यजामहे” की साधना कहती है “कर्ता मैं नहीं हूँ समर्पण स्वयं घट रहा है।” *कर्तृत्व से अकर्तृत्व, अहं से शिवत्व आध्यात्मिक रूप से “यजामहे” का अर्थ है अहं का गलना।* *पुष्टिवर्धनम्:-* यहाँ ‘पुष्टि’ का अर्थ केवल धन या शारीरिक स्वास्थ्य नहीं है, बल्कि *’आत्म-पुष्टि’ है।* जब साधक का आध्यात्मिक पोषण होता है, तो वह मानसिक रूप से इतना सबल हो जाता है कि *जीवन के दुख उसे विचलित नहीं कर पाते।* *’उर्वारुकमिव:-* यह इस मंत्र का सबसे सुंदर हिस्सा है। जैसे एक खरबूजा जब पूरी तरह पक जाता है, तो वह बिना किसी संघर्ष के अपनी बेल से अलग हो जाता है। ठीक उसी तरह *अध्यात्म हमें संसार छोड़ने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि खुद को इतना ‘पका’ लेना है (ज्ञान प्राप्त करना है) कि मोह-माया हमें अपने आप छोड़ दे। यह मृत्यु से डरना नहीं, बल्कि उसे एक सहज बदलाव के रूप में स्वीकार करना हैं।* *“मृत्योर्मुक्षीय”:-*अमृतत्व की प्राप्तिमंत्र ‘मृत्यु’ से बचने की बात नहीं करता, बल्कि ‘मृत्यु के बंधन’ से मुक्त होने की बात करता है। आध्यात्मिक रूप से इसका अर्थ है—यह जान लेना कि ‘मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ’। जब यह बोध होता है, तो साधक अमरता (Amritattva) को प्राप्त कर लेता है, क्योंकि आत्मा कभी मरती नहीं।इस मंत्र का साधक पर प्रभाव यह होता है कि *यह मंत्र उसके भय का नाश करता है। अवचेतन मन से मृत्यु और अनिश्चितता के डर को निकालता है।* • *आध्यात्मिक स्तर पर यह मंत्र मृत्यु पर आध्यात्मिक विजय, आत्मा की अमरता का बोध, संसार चक्र (जन्म-मृत्यु) से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति का प्रतीक है। यह अज्ञान (अविद्या) रूपी मृत्यु से मुक्ति और शिव (परमात्मा) से एकत्व की प्रार्थना है।* इस प्रकार हमने इस मंत्र के *3 स्तरों पर अर्थात् आधिदैविक और आदि भौतिक व आध्यात्मिक स्तर पर विश्लेषण करके देखा तो महामृत्युंजय मंत्र मोक्ष का संरक्षक है।* यह साधक को संसार के मायाजाल से मुक्त कर परम शिव में लीन करता है। नियमित जप (विशेषकर ध्यानावस्था में या गुरु मंत्र के रूप में) से ये लाभ प्राप्त होते हैं। यह मंत्र तीनों स्तरों का समन्वय है, किंतु आध्यात्मिक रूप से सर्वोच्च मोक्ष प्रदान करता है। *मरीजों पर महामृत्युंजय मंत्र का प्रभाव जानने के लिये राम मनोहर लोहिया अस्पताल में सरकारी संस्था आई सी एम आर (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च -ICMR) के द्वारा वर्ष 2016 से 2019 में वैज्ञानिक शोध करवाया गया। अस्पताल के न्यूरोसर्जन डॉक्टर अजय चौधरी और उनकी टीम ने इस पर स्टडी की। 20-20 लोगों के दो ग्रुप बनाकर 3 वर्ष तक अध्ययन किया गया। लगभग डेढ़ वर्षों में यह पाया गया कि जिन 20 मरीजों के लिये मंत्र जप किए गए उनमें से 18 ठीक हो गए जबकि वही डॉक्टर शेष 20 में से एक भी मरीज को ठीक नहीं कर पाये हैं।* नोट:- *ज़ी टीवी पर सुधीर चौधरी के शो DNA में इसकी विस्तृत व्याख्या की गई थी।* *शो की लिंक नीचे है।*👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻https://youtu.be/YqUjMH4hyrc?si=ifmHc_r0ySNnrFJX [ *अगर यह लिंक नहीं खुले तो इस पूरे मैसेज को कॉपी करके किसी दूसरे ग्रुप में पेस्ट करें और तब इस लिंक पर जाकर क्लिक करें तो आपको वीडियो दिखेगा। या आप स्वयं यूट्यूब पर जाकर कर* *महामृत्युंजय जप का ज़ी टीवी के शो डीएनए का विश्लेषण* लिखें तो आपको यूट्यूब पर यह दिखेगा।]वस्तुतः अपने देश में ऐसा बहुत कुछ है जिस पर हमें गर्व होना चाहिए। *समय-समय पर उपवास (पीरियॉडिक फास्टिंग) का चलन अपने देश में हजारों सालों से है। श्रद्धालु संकष्टी-चतुर्थी, एकादशी, प्रदोष जैसे व्रत रखते हैं, लेकिन अपने देश में इस पर कोई स्टडी नहीं हुई है।* *2016 में मेडिसिन का नोबेल प्राइज जापानी शोधकर्ता प्रो. योशिनोरी ओहसूमी को मिला। उनके शोध का विषय था। Autophagy (ऑटोफैगी)।* *प्रो. योशिनोरी ने अपनी स्टडी में बताया कि पीरियॉडिक फास्ट अर्थात साप्ताहिक या पाक्षिक उपवास करने वालों के अंदर बीमारी वाले सेल्स नष्ट हो जाते हैं। विशेषकर कैंसर जैसी बीमारी के सेल्स मर जाते हैं। उपवास (Fasting) और ऑटोफैगी का सीधा संबंध हैं।* *ओहसूमी के शोध का मूल निष्कर्ष यह था कि जब भोजन उपलब्ध नहीं होता (उपवास), तब शरीर “बाहरी ईंधन” की जगह “आंतरिक कचरे” को जलाना शुरू करता है। यहाँ आंतरिक कचरा विभिन्न प्रकार की कोशिकाएँ जो किसी कारणवश विलीन या नष्ट नहीं हो पाई और शरीर के अंदर रह गई हैं। यही मृत कोशिकाएँ आगे जाकर के कैंसर का रूप धारण करती हैं। इसी शोध पर उनको नोबल पुरस्कार मिला था।* *महामृत्युंजय मंत्र यह सनातन भारतीय वेदों का अनुपम ज्ञान है। इन वेदों में जो ज्ञान का अथाह भंडार है। वह आज के विज्ञान को भी समझने में हजारों वर्ष लग जाएंगे। दुर्भाग्य से हम न वेदों को जानते हैं न वेदों की भाषा संस्कृत को समझते हैं। आज आवश्यकता है इस ज्ञान के भंडार को खोजने की इस पर आस्था रखने की और इसे जन सामान्य तक पहुंचाने की। आधुनिक विज्ञान अभी जिन क्षेत्रों में पहुँचा है कॉस्मोलॉजी, न्यूरोसाइंस, क्वांटम फील्ड, सिस्टम थ्योरी उनके बीज वेदों में सांकेतिक रूप में मौजूद हैं। अंतर केवल भाषा और प्रतीकों का है।* *संस्कृत केवल भाषा नहीं, वैचारिक संरचना है। उसके बिना वेदों को पढ़ना ऐसे है जैसे गणित को केवल शब्दों में समझना। आज आवश्यकता है वेदों को प्रवचन नहीं, संवाद में लाने की। प्रतीकों को वैज्ञानिक उपमा में समझाने की और मंत्रों को मानव जीवन के नियमों के रूप में प्रस्तुत करने की ताकि सामान्य व्यक्ति यह कह सके “यह मेरी संस्कृति है, पर यह मेरी बुद्धि के विरुद्ध नहीं है।”

* अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

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