महाभारत के द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का चिरंजीवी अवतार

बांगरू-बाण श्रीपाद अवधूत की कलम से

पिछले सप्ताह ब्रह्मपुर( बुरहानपुर) जाते समय असीरगढ़ किले के ठीक सामने अशिरेश्वर महादेव के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मान्यता है कि असीरगढ़ किले के आस-पास के क्षेत्रों में महाभारत के द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का वास्तव है क्योंकि सनातन हिन्दू धर्मशास्त्रों में उन्हें चिरंजीवी अवतार माना गया है। अभी 2 दिन पूर्व ही अमिताभ बच्चन को 70वें Filmfare Awards South (Telugu) में Best Supporting Actor – Telugu का पुरस्कार मिला है। यह पुरस्कार उन्होंने ‘Kalki 2898 AD’ में अपने अभिनय के लिए जीता है, जिसमें उन्होंने अश्वत्थामा का रोल निभाया था। सोशल मीडिया पर अभी अमिताभ बच्चन से ज्यादा चर्चा अश्वत्थामा की हो रही है। इसीलिए इस बार के ‘बांगरू-बाण’ में ”अश्वत्थामा’ और हमारे यहां की ‘चिरंजीवी अवतार परंपरा’ का विश्लेषण” इस विषय पर करेंगे।

चिरंजीवी अवतार किसे कहते हैं…??? कितने चिरंजीवी अवतार माने गए हैं और इन चिरंजीवी अवतारों/व्यक्तित्वों में से ‘हनुमानजी’ और ‘अश्वत्थामा’ का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे। चिरंजीवी शब्द का शाब्दिक अर्थ है: चिरं = दीर्घ काल तकजीवी = जीवित रहने वाला अर्थात जिसकी कभी मृत्यु न हो जो अमर हो उसे चिरंजीवी कहा जाता है। जो एक युग से दूसरे युग तक अपनी “भूमिका” के कारण लोक-स्मृति में सतत उपस्थित रहता है। अर्थात चिरंजीवी = कार्य-आधारित दीर्घकालीन उपस्थिति जो सामाजिक जीवन-मूल्यों के वाहक होतें हैं। अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीविनः॥इस श्लोक का अर्थ है कि

अश्वत्थामा, राजा बलि, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और परशुराम ये सात महापुरुष चिरंजीवी अवतार हैं। इसका गहरा भाव यह है कि ये सातों पात्र भारतीय संस्कृति और इतिहास के अलग-अलग गुणों व मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो युगों-युगों तक जीवित रहेंगे। कुछ स्थानों पर आठवें अवतार के रूप में मार्कण्डेय भी जोड़े जाते हैं। सनातन वैदिक परंपराओं में चिरंजीवी अवतारों की संख्या 7 , 8 या 9 मिलती है।सबसे स्वीकृत सूची यह मानी जाती है।

1. हनुमान – सेवा और भक्ति 2. अश्वत्थामा – अपराध-बोध और चेतावनी 3. विभीषण – नैतिक विवेक 4. परशुराम – शक्ति-संतुलन 5. कृपाचार्य – गुरु-परंपरा 6. बलि – अहंकार-त्याग 7. व्यास – स्मृति और ज्ञान 8. मार्कण्डेय – मृत्यु-बोध

कुछ परम्पराएँ भगवान दत्तात्रेय को भी चिरंजीवी अवतार में गिनती करती हैं, लेकिन दत्तात्रेय को सामान्य चिरंजीवी-सूची (हनुमान, अश्वत्थामा आदि) में नहीं गिना जाता क्योंकि वे चिरंजीवी नहीं, “नित्य-अवतार / तत्त्व-अवतार” हैं। चिरंजीवी वे होते हैं जो एक ऐतिहासिक/कथात्मक भूमिका निभाकर दीर्घकाल तक स्मृति में बने रहते हैं (आदर्श या चेतावनी के रूप में) दत्तात्रेय इसके विपरीत, व्यक्ति नहीं है अपितु सिद्धांत हैं। काल-सीमा नहीं, बल्कि चैतन्य-स्थिति हैं इसलिए उन्हें “जीवित रहने” की श्रेणी में रखना उपयुक्त नहीं। दत्तात्रेय का यह गुण चिरंजीवी से आगे का है क्योंकि चिरंजीवी काल में चलते हैं, दत्तात्रेय कालातीत है, काल के पार हैं। उपरोक्त सभी को चिरंजीवी अवतार क्यों कहा गया..?? क्योंकि इनका कार्य किसी एक समय में किसी एक युग में पूरा नहीं हुआ अपितु प्रत्येक युग में यह प्रासंगिक रहा है। लोक परम्परा ने सामाजिक मूल्यों ने इन्हें “मरने नहीं दिया”, क्योंकि इनके प्रश्न समाप्त नहीं हुए। चिरंजीवी अवतार ईश्वरीय अवतार से किस प्रकार भिन्न है.?? राम, कृष्ण, परशुराम इत्यादि दशावतार हैं। अवतार के अवतरित होने का उद्देश्य भगवान कृष्ण ने गीता में बतलाया है।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ 4.7॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ 4.8॥

हिंदी अर्थ: हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं (साकार रूप में) प्रकट होता हूँ। सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की फिर से स्थापना के लिए, मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ। जिस उद्देश्य के लिए ईश्वर अवतार लेते हैं, जब वह उद्देश्य पूर्ण हो जाता है, तो अवतार की समाप्ति हो जाती है। जबकि चिरंजीवी अवतार इनका कार्य किसी एक युग में पूर्ण नहीं होता। ईश्वरीय अवतार के समान कोई निश्चित उद्देश्य नहीं होता। लोक परम्परा में ये आदर्श के रूप में चेतावनी के रूप में सेवा, भक्ति आदि के रूप में सदैव प्रासंगिक होते हैं। सरल शब्दों में कहें तो ईश्वरीय अवतार धर्म को बनाते हैं, चिरंजीवी अवतार धर्म को बचाते हैं। चिरंजीवी अवतार अमर शरीर नहीं, अमर प्रश्न हैं। ईश्वरीय अवतार समस्या का समाधान हैं, चिरंजीवी अवतार सामाजिक मूल्यों का निष्ठा का स्मरण हैं। सनातन संस्कृति ने दोनों को रखा, क्योंकि समाधान के बिना समाज भटकता है, और स्मरण के बिना समाज गिरता है। ईश्वरीय अवतार युग सुधारते हैं, जबकि चिरंजीवी अवतार मनुष्य को सुधारते हैं। ईश्वरीय अवतारों का उद्देश्य जब धर्म असंतुलित हो जाए, तो ईश्वर स्वयं उतरकर धर्म की पुनर्स्थापना करते है। जब कार्य पूरा हो जाता है तब अवतार समाप्त होता है। जबकि चिरंजीवी अवतार युगो युगों तक धर्म की निगरानी करते हैं। समाज में ईश्वरीय सत्ता को दृढ़ करते रहते हैं ना कि स्थापना करते हैं। सरल शब्दों में कहें तो ईश्वरीय अवतार धर्म को बनाते हैं, जबकि चिरंजीवी अवतार धर्म को बचाते हैं। ईश्वरीय अवतार समाधान हैं, चिरंजीवी अवतार स्मरण हैं। और सनातन वैदिक संस्कृति ने दोनों को रखा, क्योंकि समाधान के बिना समाज भटकता है, और स्मरण के बिना समाज गिरता है। अब हम अश्वत्थामा और हनुमान जी के अवतार/व्यक्तित्व का सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों व लोक परम्पराओं मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर तुलनात्मक अध्ययन करेंगे। मूल अंतर — एक पंक्ति में हनुमान = शक्ति+भक्ति+विवेक अर्थात हनुमान जी में शक्ति है, भक्ति है और विवेक भी है। अश्वत्थामा = शक्ति−विवेक+पश्चाताप जबकि अश्वत्थामा में शक्ति तो है लेकिन विवेक नहीं है, इस कारण पश्चाताप है। भारतीय संस्कृति ने जानबूझकर दोनों को साथ रखा, ताकि शक्ति का पूरा गणित समझाया जा सके। हनुमान जी रामायण काल (त्रेता युग) के प्रमुख पात्र। वानर जाति के योद्धा, पवनपुत्र, केसरी-नंदन, अंजनिपुत्र। शिव के 11वें रुद्र अवतार माने जाते हैं। उनका जन्म स्वाभाविक रूप से दिव्य शक्तियों से युक्त था। अश्वत्थामा महाभारत काल (द्वापर युग) के पात्र। आचार्य द्रोण के पुत्र। जन्म से ही शिव के अंश (रुद्रांश) माने जाते हैं। माथे पर मणि (जन्मजात अमरता और रक्षा प्रदान करने वाली) थी।तुलना: दोनों शिवांश से जुड़े हैं, पर हनुमान का शिव-अंश सकारात्मक, भक्ति-प्रधान है, जबकि अश्वत्थामा का क्रोध-प्रधान और विनाशकारी रहा।

चिरंजीवी होने का कारण (Reason for Immortality) हनुमान जी वरदान/आशीर्वाद से चिरंजीवी। राम ने स्वयं वर दिया कि “जब तक मेरी कथा चलेगी, तब तक तुम्हारी पूजा होगी”। साथ ही स्वयंभू अमरत्व (शिव भक्ति से)।

अश्वत्थामा मुख्यतः श्राप से चिरंजीवी। महाभारत युद्ध के बाद पांडव शिविर में रात्रि हमला, द्रौपदी के पांच पुत्रों की जघन्य हत्या, और ब्रह्मास्त्र प्रयोग के पाप के कारण श्रीकृष्ण ने श्राप दिया “तू कलियुग के अंत तक पृथ्वी पर भटकेगा, तेरे घाव कभी न भरेंगे, उसमें से मवाद रिसता रहेगा। समाज से अलग-थलग रहेगा, रोगी रहेगा” तड़पता रहेगा।

नोट:- आज भी हमारे यहां यह मान्यता है कि रात्रि के समय सफेद वस्तुएँ जैसे चूना मक्खन घी आदि किसी को भी दिया नहीं जाता है। क्योंकि लोगों को लगता है कि अश्वत्थामा रूप बदलकर, अपने घाव पर लगाने के लिए इस तरह की वस्तुएं मांगने आ सकता है।]

तुलना: हनुमान के लिए अमरत्व वरदान और सम्मान है, जबकि अश्वत्थामा के लिए सजा और अभिशाप। सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण ​हनुमान जी और अश्वत्थामा समाज के दो भिन्न छोरों को दर्शाते हैं। हनुमान (एकता के सूत्रधार): हनुमान ने ‘वानर’ (वनवासी/पिछड़े वर्ग) और ‘नर’ (राम) के बीच सेतु का कार्य किया। सांस्कृतिक रूप से वे निस्वार्थ सेवा के प्रतीक हैं। वे आज भी भारतीय जनमानस में ‘रक्षक’ के रूप में पूजे जाते हैं, जो संकट में समाज को संबल देते हैं। आदर्श भक्त, सेवक, मित्र, और रक्षक। समाज में संकटमोचन, बल और भक्ति का प्रतीक। आज भी मंदिरों, हनुमान चालीसा, मंगलवार/शनिवार को लाखों लोग पूजते हैं। सामाजिक एकता, समर्पण और सेवा का प्रतीक।

अश्वत्थामा (मर्यादा का उल्लंघन): अश्वत्थामा ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी क्षत्रिय धर्म के नकारात्मक पक्ष (क्रोध और प्रतिशोध) में बह गए। उनका सांस्कृतिक चित्रण एक सावधान करने वाली कथा के रूप में है कि विद्या और शक्ति यदि नैतिकता विहीन हो, तो वह विनाशकारी बन जाती है। समाज से बहिष्कृत, अकेला भटकने वाला। उसका नाम अधर्म, क्रोध और पाप से जोड़ा जाता है। लोग उससे डरते हैं, उसकी पूजा नहीं करते।* *तुलना: हनुमान समाज को जोड़ते हैं, अश्वत्थामा समाज से काट दिए गए। हनुमान सकारात्मक सांस्कृतिक के प्रतीक हैं, अश्वत्थामा चेतावनी और नैतिक पतन का प्रतीक।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि (Psychological Perspective) हनुमानजी सकारात्मक मनोविज्ञान का प्रतीक असीमित आत्मविश्वास, समर्पण, भक्ति, क्रोध पर विजय (जब राम के लिए क्रोध आया तो भी नियंत्रित), सेवा-भाव, भय का अभाव। आधुनिक संदर्भ में resilience, loyalty, self-control का आदर्श।

अश्वत्थामा नकारात्मक मनोविज्ञान अत्यधिक क्रोध (rage), बदला (revenge), ईर्ष्या, अहंकार, अपराधबोध (guilt), सामाजिक बहिष्कार का दर्द। उसका जीवन eternal punishment, isolation, regret का प्रतीक है।

तुलना: हनुमान मानसिक स्वास्थ्य और सकारात्मकता सिखाते हैं, अश्वत्थामा क्रोध और अधर्म के विनाशकारी परिणाम दिखाते हैं। हनुमान जीवन का उत्सव हैं भक्ति, शक्ति और सेवा का जीवंत प्रतीक हैं। अश्वत्थामा पाप का परिणाम हैं क्रोध और अधर्म का चिरकालिक दंड हैं। दोनों चिरंजीवी अवतार हैं, पर एक वरदान से जीवन जीते हैं, दूसरा श्राप से मृत्यु-सा जीवन जी रहा हैं। हनुमान जहाँ प्रेरणा और सकारात्मक ऊर्जा के स्रोत हैं, वहीं अश्वत्थामा एक त्रासदी हैं। सामाजिक दृष्टि से हनुमान ‘लोक-मंगल’ के नायक हैं और अश्वत्थामा ‘व्यक्तिगत कुंठा’ के शिकार पात्र हैं। हनुमान जी हमें सिखाते है कि शक्ति का सदुपयोग कैसे करें, और अश्वत्थामा हमें सिखाता है कि शक्ति का दुरुपयोग व्यक्ति को इतिहास के किस अंधेरे कोने में धकेल देता है। यह द्वंद्व भारतीय दर्शन का गहरा संदेश देता है कि अमरत्व अपने आप में सुख नहीं, बल्कि कर्म और भावना पर निर्भर करता है।

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

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