गाली का वैज्ञानिक एवं तंत्रिका-वैज्ञानिक विश्लेषण – मस्तिष्क की दोहरी प्रणाली।

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त।

आज का विषय थोड़ा संवेदनशील है। आप में से अधिकांश लोगों को संभव है कि यह विषय अच्छा भी ना लगे लेकिन अच्छा लगना या ना लगना किसी विषय की प्रासंगिकता और उसकी विश्वसनीयता से कोई संबंध नहीं रखता है। कई बार हम किसी विषय को जानते नहीं हैं इसीलिए उससे दूर रहने का ही प्रयत्न करते हैं लेकिन एक बार जब हम जान लेते हैं तो हमारा दृष्टिकोण उस बात को देखने का बदल जाता है इसीलिए आज हम समाज में जिस भाषा को अशिष्ट ,असभ्य, गंवार या असामाजिक भाषा के रूप में माना जाता है उस गाली पर चर्चा करेंगे इसके वैज्ञानिक एवं समाजशास्त्रीय विश्लेषण करेंगे।

मेरा निवेदन है कि इस लेख को आप सकारात्मक दृष्टि से पढते हुए इस विषय को गंभीरता से सोचें।* *”गाली-चर्चा”**”गाल्यते (विकृतिं याति मनः श्रवणमात्रेण) इति।**गालिः=अप्रियं वचः शापः वा॥”**संस्कृत की धातु ‘गल्’ से निर्मित ‘गाली’ शब्द का अर्थ है वह वचन जिसे सुनते ही मन विकृत हो जाए। किंतु क्या यह विकृति सदैव नकारात्मक है? यही इस विमर्श का केंद्रीय प्रश्न है।* *गालियों का आरंभ कब हुआ यह कहना दुष्कर है। वैदिक काल में महिलाओं और पुरुषों का स्थान बराबर था। संस्कृत, पाली, प्राकृत में कृपण, मूर्ख, दुष्ट जैसे शब्द ही मिलते हैं। कहा जाता है है कि गालियों का आरंभ ब्रज क्षेत्र में हुआ, कन्हैया गोपिकाओं को चिढ़ाते थे और गोपिकाएं उन्हें गालियां देती थीं। लेकिन इसे गल्प की तरह ही लिया जा सकता है।* *वस्तुत समाज में महिलाओं का स्थान धीरे-धीरे घटता गया। धीरे-धीरे वह प्रतिष्ठा का सवाल बन गई, पुरुषों की संपत्ति बन गईं, घर परिवार की सबसे कमजोर नस, दोयम दर्जे की नागरिक और ऐसे में उन पर प्रहार करना सबसे आसान टारगेट हो गया. दो पुरुष भी आपस में झगड़ा कर रहे हों तो गाली बहन-बेटी और मां की ही दी जाने लगी क्योंकि व्यक्ति के स्वाभिमान पर चोट सबसे ज्यादा यहीं लगती है।*

*ऋग्वेद के ‘संवाद सूक्त’* *(विशेषतः10.10,10.86,10.95) में तीखे वाक्-प्रहार मिलते हैं।* *इन्द्र-वृषाकपि सूक्त (ऋग्वेद 10.86) में इन्द्राणी वृषाकपि की पत्नी को अत्यंत कटु शब्दों में कोसती हैं यह वैदिक काल में भी भाषाई आक्रामकता अर्थात गाली का ही प्रमाण हैं।**”कपिं नु मर्या अपलं श्वपाकम्”* *”क्या तुम उस वानर जैसे (या अशिष्ट) व्यक्ति को, जो अपवित्र और कुत्ते का मांस खाने वाला है, सम्मान देने योग्य समझते हो?”* *(यहाँ ‘श्वपाक’ (कुत्ते का पकाने वाला) अत्यंत अपमानजनक संबोधन है।)*

*अथर्ववेद में शत्रु को नष्ट करने के मंत्र हैं, जिनमें भाषा की आक्रामकता स्पष्ट है। ‘निर्ऋति’ (विनाश की देवी) का आह्वान करते हुए शत्रु को कोसना। यह संगठित शाप-परंपरा का आरंभ था।**”यो नः कश्चिद् अभिदासति… तं जम्भयामि सलिलस्य पृष्ठे”।* *“जो कोई भी हमें हानि पहुँचाने या दबाने का प्रयास करता है, उसे मैं (या हम) जल की सतह के नीचे दबा देता हूँ (अर्थात उसका दमन कर देता हूँ, डुबोकर मार देता हूं)।”**छान्दोग्योपनिषद् में वाणी को ‘मन का फूल’ कहा गया है। वाणी (Speech) मन (Mind) का “पुष्प” है।* *इसका सरल अर्थ: जैसे पेड़ पर फूल खिलता है, वैसे ही मन से वाणी प्रकट होती है। यह केवल दर्शन नहीं, जीवन का नियम है। बोलने से पहले सोचो (मन को देखो) वाणी को संयमित रखो। मन में द्वेष होगा तो वाणी में झलकेगा ही इसलिए परंपरा में कहा गया है कि “वाणी पर नियंत्रण, मन की साधना से ही संभव है।”**किंतु बृहदारण्यकोपनिषद् (3.5.1) में याज्ञवल्क्य और गार्गी के संवाद में जब गार्गी बार-बार प्रश्न करती हैं तो याज्ञवल्क्य कहते हैं।* *”गार्गि! मातिप्राक्षीः, मा ते मूर्धा व्यपपतत्”* *हे गार्गी! अधिक मत पूछो, नहीं तो तुम्हारा सिर गिर जाएगा। यह वाक्-भय एक प्रकार की मानसिक गाली ही है भले ही परिष्कृत भाषा में।*

*महाभारत गालियों का भंडार है। द्रौपदी को दुःशासन द्वारा ‘बांझ’ और ‘दासी’ कहा जाना यह सार्वजनिक गाली थी।* *जिसने युद्ध की नींव रखी। शिशुपाल ने भरी सभा में श्रीकृष्ण को सौ गालियाँ दीं ‘शिशुपालवध’ में महाकवि माघ ने इसे साहित्यिक रूप दिया।* *कृष्ण ने गालियाँ सुनीं, सहीं और फिर सुदर्शन छोड़ा। यह प्रसंग बताता है: गाली सहने की सीमा होती है; वह सीमा टूटने पर ही सच्चा प्रतिकार होता है।**पाणिनि की अष्टाध्यायी में ‘अपशब्द’ की चर्चा है वे शब्द जो व्याकरणसम्मत नहीं, किंतु लोकव्यवहार में प्रचलित हैं। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में ‘ग्राम्यता’ दोष का उल्लेख है, जहाँ अश्लील या अभद्र भाषा को काव्यदोष माना गया अर्थात् गाली की सत्ता तब भी थी, उसे पहचाना जाता था।**गाली के असली मर्म और धर्म को सम्राट अशोक और उसके बौद्ध सलाहकारों ने पहचाना होगा। ब्राह्मणों ने तो उसे ’’देवानाम् प्रिय:’’ (मूर्ख) कहकर गाली ही दी थी किंतु उन्होंने स्वीकार कर ली। आज इतिहासकार ’’देवानाम् प्रिय’’ का अभिधार्थ ’’देवताओं का प्रिय’’ मानकर उसे सम्राट अशोक का विशेषण मानते हैं। गौतम बुद्ध के बुद्ध विशेषण से ‘बुद्धू’ के आविष्कार के पीछे भी गालीकरण की प्रवृत्ति ही है।* *भारत में ‘गाली-गीत’ की समृद्ध परंपरा है जो गाली को कला का दर्जा देती है।विवाह के गाली-गीत वर-पक्ष और वधू-पक्ष एक-दूसरे को गाली देते हैं। यह सामाजिक तनाव का उत्सवीकरण है। सोहर और गारी बिहार-यूपी में जन्म पर भी गाली-गीत गाए जाते हैं। महाराष्ट्र आदि के क्षेत्रों में होली जिसे शिमगा कहा जाता है उस रात्रि में बोम मारने का रिवाज है। यह बोम मारना भी एक तरह की गाली ही है। रात के अंधेरे में लोगों का नाम ले लेकर के उनके बारे में तरह-तरह की गालियां बकना यह एक परंपरा है।*

*आधुनिक हिंदी साहित्य ‘रागदरबारी’ (श्रीलाल शुक्ल), ‘मैला आँचल’ (फणीश्वरनाथ रेणु), ‘काशी का अस्सी’ (काशीनाथ सिंह) इन कृतियों में गालियाँ यथार्थवाद का अनिवार्य अंग हैं।* *काशीनाथ सिंह ने तो अस्सी घाट की गाली-संस्कृति को ही उपन्यास का केंद्र बनाया।आज भी आप जब बनारस के घाटों पर जाएंगे तो वहां के लोगों की सामान्य बोलचाल की भाषा में गाली एक अनिवार्य तत्व के रूप में उपस्थित है।* *मनोवैज्ञानिक रिचर्ड स्टीफेंस ने गालियों पर अच्छा खासा काम किया है। बीबीसी में छपी उनकी रिपोर्ट के मुताबिक, आम बोलचाल के लिए हम दिमाग के एक हिस्से का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन गालियों के लिए दूसरे हिस्से का, दूसरा हिस्सा पुराना है जो विकास के क्रम में पीछे छूट गया। इसलिए गंवार, मंदबुद्धि बोलने में भले ही परेशानी महसूस करे लेकिन गालियां धाराप्रवाह दे लेता है। आगे वो बताते हैं कि यूरोप में पहले गालियां धर्म को लेकर दी जाती थीं लेकिन रेनेसा यानी पुर्नजागरण के बाद के दौर में यह औरतों पर केंद्रित हो गईं, क्योंकि औरत इज्जत की प्रतीक बन गई. जबकि भारत में शुरू से ही औरत और जाति गाली का केंद्र रही।*

*गाली का वैज्ञानिक एवं तंत्रिका-वैज्ञानिक विश्लेषण* *मस्तिष्क की दोहरी प्रणाली*

*रिचर्ड स्टीफेंस ने बताया कि गालियाँ मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम (Limbic System) विशेषतः एमिग्डाला (Amygdala) से उत्पन्न होती हैं। यह वह हिस्सा है जो भावनाओं, भय और आक्रामकता को नियंत्रित करता है। सामान्य भाषा ब्रोका एरिया (Broca’s Area) और वर्निक एरिया से संचालित होती है किंतु गाली इन्हें बायपास कर सीधे भावनात्मक केंद्र से निकलती है। इसी कारण अफेसिया (वाचाघात) के रोगी जो बोल नहीं सकते भी कभी-कभी गाली बोल देते हैं।**टॉरेट सिंड्रोम में व्यक्ति अनियंत्रित रूप से गालियाँ बकता है। यह भी लिम्बिक सिस्टम की अनैच्छिक सक्रियता है।**दर्द-निवारण और एड्रेनालिन**स्टीफेंस के शीतजल प्रयोग की वैज्ञानिक व्याख्या के अनुसार गाली देने से एड्रेनालिन और नॉरएड्रेनालिन का स्राव बढ़ता है, जो हृदय गति बढ़ाता है। एंडॉर्फिन रिलीज करता है।* *(प्राकृतिक दर्द-निवारक) Fight-or-Flight Response सक्रिय करता है इसीलिए चोट लगने पर गाली देने से दर्द कम लगता है।**गाली देने वालों में दर्द सहने की क्षमता ज्यादा* *रिचर्ड स्टीफेंस ने अपनी रिसर्च से एक और आश्चर्यजनक किंतु तथ्यपरक निष्कर्ष निकाला, उन्होंने छात्रों के दो ग्रुप बनाए। एक में उन्हें रखा जो गालियां देते थे और दूसरे में उनको जो इससे दूर रहते थे। दोनों ग्रुप के छात्रों के हाथ उन्होंने ठंडे पानी में रखने को कहा। जिन छात्रों ने गाली गलौज की उन्होंने ज्यादा देर तक ठंडे पानी में हाथ डाले रखा, दूसरा ग्रुप इसे ज्यादा देर तक बर्दाश्त नहीं कर पाया। यह भी तय है कि आप गाली देकर कितनी राहत महसूस करते हैं यह इस पर निर्भर करता है कि आपको गालियां कितनी बुरी लगती हैं।*

*समाज विज्ञानी गाली के शास्त्र को समाज के मनोविज्ञान से भी जोड़ते हैं। यों तो प्रत्येक भाषा में, प्रत्येक समाज में गालियां रही हैं किंतु उनका प्रयोग किन्हीं विशेष परिस्थितियों में, विशेष संबंधों में, विशेष समाज द्वारा ही किया जाता है। पूरी दुनिया की भाषाई संस्कृति की अभिव्यक्ति में गालियों की अपनी जगह होती है। गालियां क्रोध, अपमान और कभी-कभी प्रेम की अभिव्यक्ति भी होती हैं।*

*प्रायः औरत का शरीर ही इन गालियों का केंद्र होता है. युद्ध या सांप्रदायिक दंगों में सबसे पहले महिलाओं को निशाना बनाया जाता है।‌ परिवार के सदस्यों को लेकर बनी गालियों के पीछे धारणा यह थी कि जिन लोगों से आपका गहरा लगाव है उन्हें गाली देने से आपको चोट पहुंचेगी।* *असल में गाली किसी लंबे उबाऊ वार्तालाप को एक झटके में खत्म करने का गारण्टी शुदा शार्टकट है और आगे संबंध बने रहने या टूट जाने का निर्धारक भी। प्रायः ऐसा भी होता है कि धुआंधार गालियां धुआंधार झगड़े और मारपीट से बचा लेती है। गालियां अपने मन की भड़ास निकालने का मुक्त किंतु गारण्टी शुदा इलाज हैं।

**भारत के सभी देहात अर्थात ग्रामीण क्षेत्र में गाली आम बात है। नाटक संवाद,साहित्य में गालियों की भरमार है। वहां सबसे प्रिय व्यक्ति को गाली से सम्बोधित किया जाता है। गालियां हमारे मानसिक तनाव को कुछ हद तक कम कर देती है । गुस्से में मनुष्य आजकल एक दूसरे को खत्म तक कर देते है , मारने की अपेक्षा गाली से काम चलाया जा सकता है। वही जो अपने कहा मन की भड़ास निकालना।

*गालियां मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक है , हां उनकी भी मर्यादा होनी चाहिए।**गालियां बकने से विरेचन की प्रक्रिया होती है* *विरेचन अर्थात आपके मन में आपके विचारों में जो गंदगी इकट्ठा हो गई है वह गालियां बकने से बाहर निकल जाती है।* *एक शांति की अनुभूति होती है जैसे प्रेशर कुकर में प्रेशर इकट्ठा होता है और जब सीटी बजती है तो सारा प्रेशर रिलीज हो जाता है यही काम मनुष्य के साथ गाली करती है।**

शरीर पर छोटी सी फुंसी हो जाए तो उसमें मवाद इकट्ठा हो जाता है उस मवाद को अगर निकाल कर के बाहर फेंक दिया जाए तो वह फोड़ा फुंसी बहुत जल्दी ठीक हो जाता है अगर उसमें से मवाद नहीं निकाला गया तो वह आगे जाकर के नासूर बन जाता है यही प्रक्रिया मनुष्य मन पर भी लागू होती है। व्यावहारिक जीवन में इतने टेंशन हम लोग पाल लेते हैं धीरे-धीरे हमारे मन में एक तरह का प्रेशर बनने लगता है और उसी की परिणिति आप देखते हैं कि वर्तमान समय में लोग आत्महत्या कर रहे हैं आत्महत्या करने के पीछे के का सबसे बड़ा कारण यही वह प्रेशर है जहां पर कोई सेफ्टी वॉल नहीं है। वह अपने प्रेशर को कम या खत्म नहीं कर पा रहे हैं।* *

आप लोगों में से अधिकांश ने करीना कपूर और शाहिद कपूर की एक फिल्म “जब वी मेट” (Jab we met) देखी होगी। इसमें करीना कपूर शाहिद कपूर को गाली देने और अपनी प्रेमिका का फोटो जलाने की सीख देती है जब शाहिद कपूर ऐसा करता है तो उसे अच्छा अनुभव होता है और वह आत्महत्या का विचार त्याग देता है।

**जापान में साइकोथेरेपी में व्यक्ति अपने मन की भड़ास चिकित्सक की उपस्थिति में निकल लेता है। वहां गालियां देने के लिए फीस चुकानी पड़ती है।* *सामान्यतया गाली विशेषकर मित्रों में अपनत्व दिखाने के लिए प्रयोग में लाई जाती है। साधु संतों में भी अखाड़ों के कुछ साधु एक दूसरे को सभ्य गालियों से ही संबोधित करते हैं।*

*वात्स्यायन के कामसूत्र में भी संभोग के दौरान विशेष ध्वनियों और शब्दों का उल्लेख है जो आनंद की अभिव्यक्ति हैं। इसी को पुष्ट करते एक सर्वे में पाया गया है कि सेक्स करते समय लगभग 75% स्त्री या पुरुष चरम अवस्था में आनंद को अभिव्यक्त करने के लिए गालियों का ही प्रयोग करते हैं।*

*इस विमर्श का उद्देश्य गाली का महिमामंडन नहीं, बल्कि उस मानवीय भाषाई घटना को समझना है जो हर समाज में, हर काल में विद्यमान रही है।* *गाली का स्वास्थ्यकारी रूप वह है जो व्यक्तिगत भावावेग की अभिव्यक्ति हो। वह गाली हानिकारक है जो स्त्री-देह, जाति या धर्म को लक्ष्य करे क्योंकि वह एक व्यक्ति की मुक्ति के लिए दूसरे के अस्तित्व को अपमानित करती है।**सामाजिकों के शिक्षा-सभ्यता के अनुसार एक आदर्श समाज में गाली के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, पर हम जानते हैं ऐसा सिर्फ कल्पनाओं में होता है। लोग एक-दूसरे को अपमानित करने के तरीके खोज ही लेते हैं और हमेशा करते ही रहेंगे इसलिए गालियों पर इतना बुरा मानने की आवश्यकता नहीं है गाली को समझ लेंगे तो गाली देने की प्रक्रिया और गाली देने के प्रकार में सुधार कर लेंगे इतना ही निवेदन।

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

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