काली कमाई’ का ही काला ‘कमाल’ है
*लोकायुक्ताधिकारी पुराण*।
मनोज चतुर्वेदी।
*कभी साइकिल पर चलने वाला भदौरिया आज चमचमाती गाड़ियों में गनमैन लेकर घूमता है..!*
यह ‘काली कमाई’ का ही ‘कमाल’ है कि जो इंसान कभी साइकिल से शहरों की सड़कें नापा करता हो वह कुछ ही सालों में चमचमाती महंगी गाड़ियों में एक नहीं, बल्कि चार-चार गनमैन लेकर घूमे… आबकारी विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी धर्मेंद्रसिंह भदौरिया भी लोकायुक्त छापे में ‘काली कमाई का कुबेर’ निकला… और खबर है कि शुरुआती दिनों में तो भदौरिया के पास सिर्फ एक साइकिल थी, लेकिन अब छापे में 4/5 किलो सोना, 6 किलो से अधिक चांदी सहित करोड़ों में नकदी तो मिले… अब लोकायुक्त बैंक लॉकर खुलवाने जा रही है, जहां से भी कई बेशकीमती वस्तुएं मिलने की उम्मीद है और मिले दस्तावेजों की जांच भी चल ही है…
*जो इलाके आर्थिक रूप से कमजोर… उन्होंने भदौरिया को बना दिया ‘अकूत सम्पत्ति का आसामी’…*धार, झाबुआ, आलीराजपुर जैसे आदिवासी जिले वैसे तो आर्थिक रूप से कमजोर हैं, लेकिन ये गुजरात बॉर्डर से लगे हैं और इन्हीं इलाकों में मौजूद जंगलों के जरिए ही गुजरात में अवैध शराब सप्लाय की जाती है… यही कारण है कि भदौरिया की अधिकांश पोस्टिंग इंदौर के अलावा इन्हीं जिलों में रही… मजे की बात यह है कि अन्य आबकारी अधिकारी भी इन आर्थिक रूप से कमजोर जिलों में पोस्टिंग को आतूर रहते हैं और धर्मेंद्र सिंह भदौरिया भी जब तक ‘सेवा’ में रहे वे इन्हीं जिलों से ‘मेवा’ बटोरते गए..!
*फिल्म बने तो ‘पुष्पा’ भी फैल..!*
वैसे तो गुजरात में शराब पर घोषित प्रतिबंध है, लेकिन वहां अब भी अघोषित रूप से ‘जाम छलकते’ हैं… अधिकांश शराब मध्यप्रदेश से ही गुजरात चोरी-छुपे पहुंचाई जाती है, क्योंकि इसकी बॉर्डर करीब है… जानकार तो यहां तक दबी जुबान से कहते हैं कि अगर कोई फिल्म निर्देशक ‘पुष्पा-रईस टाइप’ फिल्म बनाने के लिए कहानी ढूंढ रहा हो तो उसे इस ओर ध्यान देना चाहिए कि मध्यप्रदेश से गुजरात जंगल के ‘चोरनुमा रास्तों’ के जरिए किस तरह और क्या-क्या हथकंडे अपनाते हुए शराब सप्लाय की जाती है… इन जंगलों में एक नहीं कई खूफिया रास्ते ‘शराब सप्लायरों/माफियाओं’ ने तैयार करवा रखे हैं… खबर तो यहां तक है कि ये माफिया आबकारी विभाग के अफसरों से भी सेटिंग कर रखते हैं और उनमें से कुछ जिम्मेदारों को भी इन रास्तों की भनक है… भदौरिया भी अवैध शराब के सिंडिकेट से जुड़ा रहा और सूत्रात्मक खबर यह भी है कि इसी ‘सिंडिकेटबाजी’ के चलते भी वह ‘छापामारी की जद’ में आया… उक्त सेवानिवृत्त अधिकारी ने तनख्वाह भले ही 2 करोड़ तक पाई हो, लेकिन इसी सिंडिकेट की बदौलत ही उसने 18 करोड़ की चल-अचल सम्पत्ति जुगाड़ी, जो कि लोकायुक्त छापे में सामने आई..!