श्रावण मास का आध्यात्मिक, सामाजिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से महत्व

बांगरू-बाण श्रीपाद अवधूत की कलम से!

सनातन हिंदू धर्म अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वविख्यात है। भारत में मनाए जाने वाले प्रत्येक त्यौहार ब्रह्मांडीय सम्बन्धों और वैज्ञानिक तथ्यों का एक अनूठा समन्वय स्थापित करते हैं। इसी कड़ी में श्रावण मास भी गहन आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व को समेटे हुए है।यह सम्बन्ध केवल प्रतीकात्मक नहीं बल्कि ब्रह्मांड के विशाल विस्तार के साथ हमारे संबंधों की गहन अन्तर्दृष्टि को प्रदान करता है। हमारे प्राचीन ज्ञान में सूर्य चंद्रमा बुध बृहस्पति आदि ग्रहों को इस सम्पूर्ण सृष्टि पर अपना प्रभाव व सम्बन्ध को परिभाषित करते है।

श्रावण मास के दौरान किए जाने वाले अनुष्ठान केवल परंपरा के पालन नहीं बल्कि ब्रह्मांडी शक्ति के साथ सामंजस्य स्थापित करने का माध्यम हैं।

श्रावण मास जिसे सावन का महीना भी कहा जाता है। यह हिन्दू कैलेंडर का पाँचवा महीना होता है। सृष्टि का प्रारंभ जल से हुआ है और सावन मास जल के लिए जाना जाता है। अतः यह सृष्टि का पहला महीना है

*वेद कहते हैं-* *‘अप एव ससर्जादौ’ अर्थात विधाता ने सर्वप्रथम जल का निर्माण किया।**महाकवि कालिदास जी कहते हैं*- *’या सृष्टिः स्रष्टुराद्या’ अर्थात ब्रह्मा की पहली सृष्टि जल ही है। सावन मास में सूर्य दक्षिणायन हो जाते हैं। कर्क राशि का सूर्य ही सावन मास है। इस महीने भगवान विष्णु जल का आश्रय लेकर क्षीरसागर में शयन करने चले जाते हैं। जल वृष्टि अधिक होने से पृथ्वी में कणों के गर्भांकुर फूट पड़ते हैं।* *श्रावण मास में अनेक प्रकार के व्रत, वैकल्य, पर्व, त्यौहार तथा अन्यान्य अनुष्ठान एवं महोत्सव संपन्न होते हैं। कजली गीत, नाग पंचमी, झूला गीत, हरियाली अमावस्या, हरित माधव तृतीया, पवित्रा एवं कामदा एकादशी, रक्षा बंधन, व श्रावणी उपाकर्म ये सभी श्रावण मास में धार्मिक कार्य किए जाते हैं।* *पौराणिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि सावन मास में समुद्र मन्थन किया गया था। समुद्र मथने के बाद जो हलाहल विष निकला, उसे भगवान शंकर ने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की; लेकिन विषपान से महादेव का कंठ नीलवर्ण हो गया। इसी से उनका नाम ‘नीलकंठ’ पड़ गया। विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन्हें जल से अभिषेक कर विष के दाह को कम करने का प्रयास किया इसलिए जल चढ़ाने का विशेष महत्व है।**श्रावण मास में शिवलिंग पर जल अर्पित करने के पीछे धार्मिक ही नहीं अपितु वैज्ञानिक कारण भी है। हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है। जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है, वो तो चिर सनातन है। विज्ञान को परम्पराओं का रूप इसलिए दिया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें। शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्यूक्लियर रिएक्टर्स ही थे, तभी शिवलिंग पर दूध, जल एवं तरल पदार्थ अर्पित किए जाते थे।* *जिससे कि रेडियो एक्टिव रिएक्टर्स को समाप्त किया जा सके और वह शांत रहें। महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे कि बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले पदार्थ है। शिवलिंग पर चढ़ा जल भी रिएक्टिव हो जाता है इसीलिए जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता अर्थात शिव की पिंडी की पूरी परिक्रमा नहीं की जाती।* *भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिवलिंग की तरह ही है। शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है। तभी हमारे पूर्वज हम लोगों से कहते थे कि महादेव शिवशंकर अगर नाराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी।* *श्रावण मास में दूध से शिव का अभिषेक किया जाता है व दूध, दही का सेवन न करने की सलाह दी जाती है। जिससे कि मौसमानुसार शरीर में वात और कफ न बढे जिससे हम निरोगी रहे ऐसा आयुर्वेद विज्ञान में कहा गया है।* *श्रावण में वर्षा के कारण कीट, पतंगे से लेकर वायरस, बैक्टीरिया सभी का प्रकोप होता हैं। इससे अनेक बीमारियां फैलती है। प्राचीन काल से अग्निहोत्र के माध्यम से बीमारियों को रोका जाता था। श्रावण मास में वेदों के स्वाध्याय के साथ साथ दैनिक अग्निहोत्र का विशेष प्रावधान किया जाता है। इसीलिए वेद परायण यज्ञ को इसमें सम्मिलित किया गया था। इससे न केवल श्रुति परम्परा को जीवित रखते वाले वेद-पाठी ब्राह्मणों का संरक्षण होता है।* *श्रावण मास में नक्त, या जिसे एकासना कहते हैं उसका भी प्रचलन है। लगातार वर्षा के कारण वातावरण बहुत ही भारी हो जाता है। इसके कारण हमारी जठराग्नि अर्थात पाचन शक्ति कमजोर पड़ जाती है। घर से बाहर निकलना एवं परिश्रम के कार्य भी पूरी तरह बंद हो जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में एक समय भोजन करने से हमारा पाचन तंत्र अच्छा बना रहता है। इस माह में शाक अर्थात पत्ते वाली सब्जियां खाने की मनाही है। इसका भी कारण यही है कि इन पत्तों पर बैक्टीरियल इन्फेक्शन ज्यादा होता है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।* *श्रावण मास में वर्षा के कारण संन्यासी, वानप्रस्थी आदि वन त्यागकर नगर के समीप स्थानों पर आकर वास करते है। इसे ही चातुर्मास कहा गया है। इन चार महीनों में गृहस्थ आश्रम का पालन करने वाले लोग अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए महात्माओं का सत्संग करने के लिए उनके पास जाते है। महात्माओं के धर्मानुसार जीवन यापन, वैदिक ज्ञान, योग उन्नति एवं अनुभव गृहस्थियों को जीवन में मार्गदर्शन एवं प्रबंध में लाभदायक होता हैं। श्रवण पर्व का सामाजिक पक्ष ज्ञानी मनुष्यों द्वारा समाज को दिशा-निर्देशन एवं धर्म भावना को समृद्ध करना है। वेदों के प्रति जनमानस की रूचि में वृद्धि भी होती है। श्रावणी पर्व का वैज्ञानिक पक्ष पर्यावरण रक्षा के रूप में प्रचलित है।* *लिखने के लिए बहुत कुछ है। लेकिन यह आलेख बहुत बड़ा हो जाएगा इसलिए आने वाले दिनों में हम श्रावण मास में मनाए जाने वाले विभिन्न पर्व जैसे दक्षिण भारत में मनाया जाने वाला जीवंतिका पूजन उसी तरह निमाड़ में मनाया जाने वाला जिरौती पूजन, मंगलागौरी नाग पंचमी, हरियाली अमावस्या हरियाली तीज आदि उत्सवों पर चर्चा करेंगे।

अवधूत चिंतन श्री गुरदेव दत्त

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